पुस्तक समीक्षा चूं चूं की खोज
विसंगतियों के आइने में समकालीन यथार्थ बनाम चूं चूं की खोज
व्यंग्यकार : विवेक रंजन श्रीवास्तव
प्रकाशक: इंक पब्लिकेशन, प्रयागराज
पृष्ठ : 236
मूल्य : 350 रु
एमेजॉन पर उपलब्ध
वरिष्ठ व्यंग्यकार विवेक रंजन श्रीवास्तव का व्यंग्य लेखन आज के दौर की विसंगतियों, राजनीतिक पाखंड और सामाजिक दोहरेपन पर एक करारी चोट है। उनकी लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे केवल समस्याओं को उजागर नहीं करते, बल्कि मानवीय प्रवृत्तियों का गहराई से विश्लेषण भी करते हैं।
लेखक ने 'आठवीं पीढ़ी की व्यवस्था' जैसे व्यंग्यों के माध्यम से राजनीति में व्याप्त वंशवाद और संचय की प्रवृत्ति पर तीखा प्रहार किया है। वे बताते हैं कि कैसे एक नेता अपनी सात पीढ़ियों का इंतजाम करने के बाद आठवीं पीढ़ी के लिए अपने बेटे को राजनीति में लॉन्च करने की जुगत में रहता है।
'जुगाड़ मतलब टैक्टफुलनेस' और 'सेवा का मेवा' जैसे लेखों में लेखक ने हमारे समाज की 'जुगाड़' संस्कृति और परोपकार के नाम पर चल रहे व्यापार को बड़ी चतुराई से उकेरा है। उदाहरण के लिए, 'सेवा का मेवा' में वे दिखाते हैं कि कैसे पुराने कॉलेज मित्र अब 'प्रभु' बनकर सेवा के नाम पर मेवा खा रहे हैं।
'डीप फेक है यह दुनिया' के जरिए लेखक ने आधुनिक तकनीक के खतरों और हमारी 'डिजिटल दुकानदारी' पर व्यंग्य किया है, जहाँ असल और नकल का भेद करना मुश्किल हो गया है।
विवेक रंजन श्रीवास्तव के व्यंग्य लेखन की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सहजता और समसामयिकता है, जो पाठक को बिना किसी कृत्रिम दबाव के समाज की विसंगतियों से रूबरू कराती है। वे अपनी रचनाओं में भाषा की क्लिष्टता के बजाय बोलचाल के लहजे को प्राथमिकता देते हैं, जिससे उनका व्यंग्य सीधा प्रहार न कर एक मृदु मुस्कान के साथ कड़वा सच परोसता है। उनके लेखन में मध्यमवर्गीय जीवन की विडंबनाएं, दफ्तरी संस्कृति का खोखलापन और मानवीय स्वभाव के विरोधाभास बड़ी बारीकी से उभर कर आते हैं। श्रीवास्तव जी का व्यंग्य केवल उपहास उड़ाने के लिए नहीं, बल्कि विसंगतियों के प्रति एक सजग चेतना पैदा करने के लिए जाना जाता है। वे छोटी-छोटी घटनाओं और रोजमर्रा के पात्रों के माध्यम से व्यवस्था की खामियों पर ऐसी चोट करते हैं कि पाठक स्वयं को उस परिस्थिति का हिस्सा महसूस करने लगता है। उनकी शैली में एक प्रवाही लय है, जहाँ हास्य की चाशनी में डूबे शब्द धीरे-धीरे व्यवस्था की सड़ांध को उजागर करते हैं, जो उन्हें समकालीन हिंदी व्यंग्य की दुनिया में एक विशिष्ट और विश्वसनीय पहचान दिलाती है।
विवेक जी सहज और पठनीय शैली के धनी हैं । उनकी भाषा सरल, बोलचाल की और व्यंग्य की धार से भरपूर होती है। वे 'जुगाड़' जैसे देसी शब्दों को 'टैक्टफुलनेस' जैसे मैनेजमेंट के भारी-भरकम शब्दों से जोड़कर पाठकों को एक साथ सटायर विट और ह्यूमर से हँसने और सोचने पर मजबूर कर देते हैं।
विवेक रंजन के व्यंग्य वैश्विक कैनवास पर सहजता से प्रकट होते हैं। उनका लेखन उन लोगों के लिए एक आईना है जो समाज की विकृतियों को देखना और समझना चाहते हैं। चूं चूं की खोज , 75 मजेदार समकालीन व्यंग्य लेखों का संग्रह है । यह आम आदमी का मनोरंजन तो करता ही है, पाठक को अपने आस-पास की दुनिया के प्रति अधिक जागरूक और संवेदनशील भी बनाता है। किताब पैसा वसूल और संग्रहणीय है।