Digital silence: An untold story!! in Hindi Moral Stories by Anjali kumari Sharma books and stories PDF | डिजिटल सन्नाटा: एक अनकही कहानी !!

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डिजिटल सन्नाटा: एक अनकही कहानी !!


शहर की ऊंची इमारतों के बीच, एक छोटे से कमरे में बैठी मैं अक्सर सोचती हूँ कि हम कितना आगे निकल आए हैं। मेरे सामने रखा लैपटॉप और बगल में रखा फोन—ये दोनों मेरी दुनिया के सबसे बड़े दरवाज़े हैं, लेकिन इन्हीं दरवाज़ों ने मुझे मेरी असली दुनिया से दूर कर दिया है।


ज़रूरत या दिखावा?.....

आजकल की सुबह सूरज की रोशनी से नहीं, बल्कि फोन के 'नोटिफिकेशन' से होती है। हम आँख खोलते ही यह नहीं देखते कि बाहर मौसम कैसा है, बल्कि यह देखते हैं कि दुनिया हमारे बारे में क्या सोच रही है। कल रात जो तस्वीर पोस्ट की थी, उस पर कितने 'लाइक्स' आए? किसने क्या कमेंट किया?

एक वक़्त था जब दुख बांटने से कम होता था, पर आज दुख को 'स्टेटस' पर लगाना पड़ता है ताकि लोग जान सकें कि हम अंदर से टूट रहे हैं। और सितम देखिए, लोग उस दर्द भरी पोस्ट पर भी 'लाइक' दबाकर आगे निकल जाते हैं। क्या हम वाकई एक-दूसरे को सुन रहे हैं, या बस एक-दूसरे को देख रहे हैं?


रिश्तों की नई 'प्राइवेसी'......

मुझे याद है मेरी माँ कहती थीं कि रिश्ते नीम के पेड़ जैसे होते हैं—कड़वे मगर ठंडक देने वाले। आज के रिश्ते 'कांच की स्क्रीन' जैसे हैं। बहुत साफ़ दिखते हैं, पर ज़रा सा सच का बोझ पड़े तो चूर-चूर हो जाते हैं।
अब हम साथ बैठकर बातें नहीं करते, बल्कि एक ही सोफे पर बैठकर एक-दूसरे को 'रील्स' भेजते हैं। एक ही कमरे में रहकर भी हम मीलों दूर होते हैं। वो लंबी चिट्ठियां, वो घंटों तक एक-दूसरे की आँखों में देखकर बात करना, वो सब अब 'इमोजी' के पीछे छुप गया है। हमने जज़्बातों को 'शॉर्टकट' में बदल दिया है।


असली सुकून कहाँ है????

रात के सन्नाटे में जब इंटरनेट की रफ़्तार थोड़ी धीमी होती है, तब असल सवाल सामने आते हैं। क्या यह वही ज़िंदगी है जो हम जीना चाहते थे? क्या एक आलीशान फ्लैट में रहकर और महंगे गैजेट्स रखकर हम वाकई अमीर हैं?
असली अमीरी तो उस दिन थी जब हम बिना किसी डर के किसी के कंधे पर सर रखकर रो सकते थे। जब हमें यह परवाह नहीं थी कि हमारी 'प्रोफ़ाइल' कैसी दिख रही है।


एक कड़वा सच:

हमने लोगों से जुड़ने (Connecting People) के चक्कर में इंसानियत से अपना राब्ता ही तोड़ दिया है। हम सब एक भीड़ का हिस्सा हैं, लेकिन हर शख्स उस भीड़ में अकेला खड़ा है।

एक नई शुरुआत जो जिंदगी के लिए एक महत्वपूर्ण फैसला रहेगा।
मैंने आज फैसला किया कि मैं थोड़ा 'ऑफलाइन' जाऊंगी। मैं उस पुरानी डायरी को निकालूँगी जो शायद कहीं धूल खा रही है। मैं अपने दोस्तों को मैसेज नहीं, सीधा फोन करूँगी। मैं अपनी छत पर जाकर उस चाँद को देखूँगी जो बिना किसी 'फ़िल्टर' के भी उतना ही हसीन लगता है।
क्योंकि अंत में, हमारी ज़िंदगी हमारे 'फॉलोअर्स' की गिनती से नहीं, बल्कि उन 'पलों' से नापी जाएगी जिन्हें हमने सच में जिया है।

हो सकता है मेरी बातों से आप जुड़े होंगे किंतु सिर्फ जुड़ने से नहीं बल्कि कुछ अपनाना भी पड़ता है , जैसे मैने शुरुवात की है। जब तक आप खुद को कंट्रोल नहीं कर सकते है , तब तक अब इस सोशल मीडिया के जाल में फंसे रहेंगे, और अंत में हमे कुछ हासिल नहीं होगा।।

विचार और फैसला आपके हाथों मै हैं ।।