घने जंगल के किनारे फैला एक विशाल हरा भरा मैदान…
सुबह की ओस में चमकती घास…
और उसी मैदान में एक बकरी अपने तीन बच्चों के साथ रहती थी।
दो बच्चे शांत और समझदार थे — छापी और भागी।
पर तीसरा…
रथी!
पूरा का पूरा तूफान।
कभी किसी की पूँछ खींच देता,
कभी पीछे से अचानक टक्कर मार देता,
तो कभी खेल-खेल में पूरे झुंड को गलत दिशा में भटका देता।
उसकी शरारतों से कई बार छोटी बकरियाँ गहरे गड्ढे के किनारे तक पहुँच गई थीं।
धीरे-धीरे पूरा झुंड उससे बचकर रहने लगा।
लेकिन रथी को लगता— सब उससे जलते हैं।
एक सुबह जंगल जाने की तैयारी हो रही थी।
छापी और भागी आगे बढ़े ही थे कि पीछे से रथी उछलता हुआ आ पहुँचा—
“रुको! मैं भी चलूँगा!”
दोनों भाई एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराए।
छापी बोला— “जंगल? तेरे बस की बात नहीं।”
भागी ने ताना मारा— “वहाँ सिर्फ ताकत नहीं… अक्ल भी चाहिए।”
रथी अकड़ गया— “मेरे पास दोनों हैं!”
दोनों हँस पड़े।
भागी जानबूझकर बोला— “कल हम पहाड़ के ऊपर तक गए थे… इतनी मुलायम घास थी कि बस खाते जाओ!”
रथी की आँखें चमक उठीं।
छापी धीरे से बोला— “लेकिन तभी एक खूंखार चीता आ गया…”
“फिर क्या हुआ?” रथी घबरा गया।
दोनों सीना चौड़ा करके बोले— “हाथी मामा आ गए। उनकी सूँड़ देखते ही चीता भाग गया।”
फिर छापी ने उसके सिर पर हल्की चोट मारी—
“जंगल में हर कदम मौत से खेलने जैसा है।”
दोनों हँसते हुए आगे बढ़ गए।
पर पीछे खड़ा रथी भीतर ही भीतर जल उठा।
रोज वही सूखी घास…
और उधर पहाड़ की मुलायम पत्तियाँ!
उस रात वह देर तक सो नहीं पाया।
अगली सुबह…
छापी और भागी जैसे ही निकले,
रथी चुपके से झाड़ियों के पीछे-पीछे चल पड़ा।
जंगल उसके लिए किसी सपने जैसा था।
ऊँचे पेड़…
ठंडी हवा…
दूर बहते झरने की आवाज…
और चारों ओर फैली हरी-हरी घास।
रथी खुशी से उछल पड़ा।
तभी…
झाड़ियों के भीतर दो पीली आँखें चमकीं।
धीरे-धीरे अँधेरे से एक भेड़िया बाहर निकला।
कई दिनों से भूखा।
उसकी पसलियाँ तक दिखाई दे रही थीं।
उसने होंठों पर जीभ फेरी।
“अरे छोटे मेमने… अकेले?”
रथी का गला सूख गया।
उसने धीरे से पीछे हटना चाहा…
तभी उसकी नजर भेड़िये के पंजों के पास पड़ी टूटी हड्डियों पर गई।
उसका दिल काँप उठा।
अब भागना मतलब मौत।
लेकिन उसी क्षण…
रथी के शैतानी दिमाग की बत्ती जल गई ।
उसकी आँखों का डर धीरे-धीरे सोच में बदलने लगा।
वह अचानक मुस्कुराया।
“मामू… आपने पहचाना नहीं?”
भेड़िया चौंका।
“क्या मतलब?”
रथी धीरे से बोला—
“मैं रोज यहाँ आता हूँ।”
भेड़िये की आँखें सिकुड़ गईं।
“फिर तुम डर क्यों नहीं रहे?”
रथी उसके और करीब गया और फुसफुसाया—
“क्योंकि मुझे बचपन में जहरीले साँप ने काट लिया था।”
भेड़िया ठिठक गया।
रथी ने गंभीर चेहरा बनाया—
“तभी से मेरे शरीर में जहर फैल गया है।”
भेड़िये की भूख और डर आपस में लड़ने लगे।
रथी ने आखिरी वार किया—
“कल एक जंगली कुत्ते ने मुझे काट लिया था… बेचारा शाम तक मर गया।”
अब भेड़िये के कान खड़े हो गए।
भूख कह रही थी—
खा जा!
डर कह रहा था—
भाग जा!
तभी रथी मासूम बनकर बोला—
“मामू… माँ कहती है आपकी आवाज पूरे जंगल में सबसे सुरीली है।”
"आप गाते हैं तो पेड़ पत्ते सभी झूमते हैं कितनी मधुर आवाज है आपकी '
बस…
इतनी सी तारीफ सुनते ही भेड़िया फूल गया।
उसने गर्दन उठाई और जोर से हुआँ-हुआँ करने लगा।
पर उसे क्या पता था…
पास की पहाड़ी पर एक खूंखार चीता शिकार खोज रहा था।
भेड़िये की आवाज सुनते ही चीता बिजली की तरह झपटा।
भेड़िया संभल भी नहीं पाया।
एक ही झटके में चीते ने उसकी गर्दन दबोच ली।
पूरा जंगल काँप उठा।
और उसी अफरा-तफरी में…
रथी पूरी ताकत से भाग निकला।
भागते-भागते वह चीखने लगा—
“माँऽऽऽ!”
उधर माँ, छापी और भागी पागलों की तरह उसे खोज रहे थे।
अचानक झाड़ियों से रथी बाहर निकला।
माँ दौड़कर उससे लिपट गई।
भागी की आँखें भर आईं—
“तू ठीक है?”
रथी काँपती आवाज में पूरी घटना सुनाने लगा।
कुछ देर तक जंगल में सन्नाटा छाया रहा।
फिर छापी धीरे से बोला—
“हम समझते थे तू सिर्फ शरारती है…”
भागी ने सिर झुका लिया—
“लेकिन आज तू हम सबसे ज्यादा समझदार निकला।”
माँ मुस्कुराई।
उसने रथी को सीने से लगाया और बोली—
“शरारत बुरी नहीं होती बेटा…
बस बुद्धि और मर्यादा साथ रहनी चाहिए।”
शाम तक पूरे मैदान में सिर्फ रथी की चर्चा होने लगी।
हर बकरी उसी की बात कर रही थी।
कोई कहता—
“रथी ने विपत्ति में भी अपना आपा नहीं खोया।”
दूसरी बकरी बोली—
“अचानक संकट आने पर जो धैर्य से डटा रहे… वही असली बहादुर होता है।”
एक बूढ़ा बकरा धीरे से बोला—
“बहादुरी शरीर से नहीं… मन से होनी चाहिए।”
तभी झुंड की सबसे वृद्ध बकरी टुकनि आगे बढ़ी।
उसकी आवाज धीमी थी…
लेकिन पूरे मैदान में सन्नाटा छा गया।
टुकनि बोली—
“आज से हम सब रथी की बात मानेंगे।”
सभी चौंककर उसकी ओर देखने लगे।
वह आगे बोली—
“कोमल और हरी घास खाने का पहला अधिकार रथी का होगा।”
छापी और भागी हैरान रह गए।
टुकनि ने मुस्कुराकर रथी की ओर देखा—
“भले ही यह सबसे छोटा है…
लेकिन इसकी बुद्धि और विवेक हम सब पर भारी है।”
पूरी झुंड ने सहमति में सिर हिलाया।
रथी पहली बार चुप था।
उसकी आँखों में शरारत नहीं…
एक नई जिम्मेदारी चमक रही थी।
उस दिन के बाद वह पहले जैसा नटखट तो रहा…
लेकिन अब उसकी बुद्धि दूसरों को परेशान करने में नहीं,
सबकी रक्षा करने में लगने लगी।
और धीरे-धीरे…
वही नटखट मेमना पूरे जंगल का सबसे प्रिय बच्चा बन गया। 🌿
Jayguru 🙏 🙏 🙏
वंदे पुरुषोत्तमम