कागज़ के सामने हारता इंसान
गाँव की पगडंडी पर धूल वैसे ही उड़ती है जैसे वर्षों से उड़ती आई है। फर्क इतना भर आया है कि अब आदमी के हाथ में हल कम और कागज़ ज़्यादा दिखते हैं। कागज़-जिन पर नाम लिखा होता है, मुहर लगी होती है, और जिनके बिना आदमी का होना भी अधूरा मान लिया जाता है।
इसी धूल भरी सड़क से एक दिन एक आदमी चला था...सीधा-सादा, अपनी दुनिया में सिमटा हुआ-अपनी बहन के नाम के कुछ रुपये लेने। बहन अब इस दुनिया में नहीं थी, पर बैंक के खाते में उसका नाम अभी भी जीवित था। आदमी ने सोचा, “नाम है तो पैसा भी मिल जाएगा… बहन नहीं रही, तो क्या हुआ, उसका पैसा तो मेरा ही हुआ न?”
ओडिशा के एक दूर बसे गाँव से आया वह आदमी बैंक पहुँचा।.... साफ कपड़े पहने बाबू लोग अपनी कुर्सियों पर जमे थे। उसने हाथ जोड़कर अपनी बात कही। बाबुओं ने कागज़ माँगा-मृत्यु प्रमाण पत्र, वारिस का प्रमाण। आदमी ने कहा, “हम तो भाई हैं…”
बाबू ने बिना उसकी ओर देखे जवाब दिया-“यहाँ भाई होने से काम नहीं चलेगा, कागज़ चाहिए।” या फिर बहन को लेते आव....
वह लौट गया। फिर आया। फिर वही जवाब मिला।
कागज़… कागज़… और कागज़।
उसके पास कागज़ नहीं थे, पर एक सच्चाई थी-एक रिश्ता था। पर उस सच्चाई की कोई कीमत नहीं थी। कई दिनों तक वह बैंक के चक्कर काटता रहा। हर बार वही दरवाज़ा, वही कुर्सियाँ, वही ठंडा जवाब। धीरे-धीरे उसके भीतर कुछ टूटने लगा।
एक दिन वह सीधा श्मशान चला गया-वहीं, जहाँ उसकी बहन को मिट्टी दी गई थी। उसने मिट्टी हटाई, कंकाल निकालीं, उन्हें कपड़े में बाँधा और कंधे पर रख लिया।
फिर वह चल पड़ा-तीन किलोमीटर का रास्ता तय करके-फिर उसी बैंक की ओर।
बैंक में भीड़ थी। उसने कपड़ा हटाया। लोग सिहर उठे। अफरा-तफरी मच गई। बाबू घबरा गए, किसी ने पुलिस बुला ली। बैंक के दरवाज़े कुछ देर के लिए बंद कर दिए गए।
पर वह आदमी शांत था। जैसे उसकी आँखें कह रही हों-“लो, यह रही मेरी बहन। अब तो पहचान लो… अब तो पैसा दे दो।”
यह दृश्य देखने वालों के लिए अजीब था, पर सोचने वालों के लिए यह कोई नई बात नहीं थी। हमारे समाज में अब आदमी की पहचान उसके रिश्तों से नहीं, कागज़ों से होती है। भाई होना काफी नहीं, जब तक कि वह किसी प्रमाण पत्र में दर्ज न हो। मरना भी तब तक सच नहीं माना जाता, जब तक उसका सरकारी कागज़ न बने।
कहते हैं, हम बहुत पढ़-लिख गए हैं। गाँव-गाँव में स्कूल हैं, शहरों में कॉलेज। लड़के-लड़कियाँ डिग्री ले रहे हैं। पर यह पढ़ाई हमें क्या सिखा रही है?
बैंक के बाबू पढ़े-लिखे थे। उन्होंने वही किया, जो नियम कहता था। उनकी अपनी मजबूरी थी—बिना कागज़ के पैसा देना उनके अधिकार में नहीं था। पर क्या शिक्षा का काम केवल नियम निभाना है?
शिक्षा तो आदमी को आदमी बनाती है-उसके भीतर दया, समझ और विवेक जगाती है। पर यहाँ तो पढ़ाई ने आदमी को और कठोर बना दिया है। वह कागज़ देखता है, इंसान नहीं।
जिस आदमी ने अपनी बहन के अवशेष कंधे पर रखे, वह अनपढ़ था। उसे नियम नहीं मालूम थे। पर उसके भीतर एक सच्चाई थी, एक दर्द था।
और उधर, पढ़े-लिखे लोग थे-जिनके पास नियम थे, पर वह दर्द नहीं था।
यही फर्क है साक्षर और शिक्षित होने में।
हम साक्षर तो हो गए हैं, पर शिक्षित नहीं हो पाए।
आज शिक्षा डिग्री बनकर रह गई है। लोग पढ़ते हैं, नौकरी पाते हैं, कुर्सी पर बैठते हैं। पर भीतर का आदमी वही का वही रह जाता है-कभी-कभी उससे भी छोटा।
कहते हैं, शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण है। पर अब लगता है, चरित्र कहीं रास्ते में छूट गया और हाथ में केवल प्रमाण पत्र रह गया।
ओडिशा के उस छोटे से गाँव का यह आदमी कोई बड़ी बात कहने नहीं आया था। वह तो बस अपने हक़ के कुछ रुपये लेने आया था। पर उसने अनजाने में हमारी पूरी व्यवस्था का चेहरा दिखा दिया-
एक ऐसा चेहरा, जिसमें नियम तो हैं, पर इंसानियत नहीं।
और शायद यही हमारे समय की सबसे बड़ी सच्चाई है-
हम कागज़ों से भरी दुनिया में जी रहे हैं, जहाँ आदमी धीरे-धीरे गुम होता जा रहा है।