निगाहें
निगाहों से निगाहें मिलाने निकले हैं l
ये क्या गुनाह करने जाने निकले हैं ll
लगता है समझना ही फुजूल है कि l
बेवफा को अपना बनाने निकले हैं ll
अपनेआप को बूत बना दिया है कि l
पत्थर दिल को पिघलाने निकले हैं ll
बहुत इतजार कर लिया ख़ुद ही से l
रूठा हुआ भाग्य मनाने निकले हैं ll
रेज़ा रेज़ा होकर बिखर गया कबसे l
फ़िज़ाओं में दिल बहलाने निकले हैं ll
गहरे संसार सागर को पार करने l
जिंदगी की नाव लगाने निकले हैं ll
गैरों को समझाने से क्या फायदा?
ख़ुद ही ख़ुद को समझाने निकले हैं ll
हिमाकत तो देखो बेवफाइयों को l
कायनात को बताने निकले हैं ll
सखी आज पतझड़ में महेनत से l
खूबसूरत गुल खिलाने निकले हैं ll
१-५-२०२६
शराफ़त
निगाहो से वार करना छोड़ दो l
हो सके तो रास्ते सभी मोड़ दो ll
सौप दो खुद को खुले आसमान में l
शराफ़त की सारी ज़ंजीरे तोड़ दो ll
आत्मा को मुक्त कर दो सबसे l
बाहिर के शोर को खोड दो ll
भीतर शांति महसूस करके l
अलौकिक शक्ति से जोड़ दो ll
कर्म की हारमाला सर्जन करे l
अपनेआप को पूर्ण होड दो ll
२ -५-२०२६
शराफ़त
क़ायनात तो शराफ़त के दिखावों में मर गई l
भीतर की रोनक बाहर के उजालों में मर गई ll
ज्यादा तकेदार हो या ख़ुद का स्वभाव और l
कैसी हवा चली के कलियां बहारों में मर गई ll
गुलों ने काटों को छेड़ ने जुर्रत से सजा पाई l
कुछ कर गुजरने की चाहत नज़ारों में मर गई ll
हुस्न के साथ शरारत होती रहती है ओ यहां l
इश्क को देख तितलियाँ ही हज़ारों में मर गई ll
वक़्त आगे बढ़ता गया पीछे निशानी छोड़ के l
जिंदगी उलझनों में उलझके सवालों में मर गई ll
३-५-२०२६
बातों ही बातों में
नादान जिगरा को समझा बुझा के देख लिया जाए l
कूछ लम्हों के लिए दिल में बसा के देख लिया
जाए ll
जिंदगी का सफ़र आसानी से काटने के वास्ते
ही सही l
आज हमराही को हमसफर बना के देख लिया
जाए ll
बातों ही बातों में कब नजदीक हो गये पता न
चला l
सुकून की चाहत में गले से लगा के देख लिया
जाए ll
बहुत खेल लिया दिल से ये बचकानी हरकतें
छोड़ l
आँखों से अज्ञानता के पर्दे हटा के देख लिया
जाए ll
दर्दो गम से बहुत रिसता निभा लिया एकबार
सखी l
खुशियो की झोली को भी उठा के देख लिया
जाए ll
४-५-२०२६
बातों ही बातों में
बातों ही बातों में हाल ए दिल बता भी नहीं सकता l
निगाहों से निगाहों के रास्ते तक आ भी नहीं
सकता ll
सारी क़ायनात में घूम के ज़रा देख लेना तुम
जानेजाँ l
थोड़ी देर ही सही हमसा प्यार निभा भी नहीं
सकता ll
तेरी रुस्वाई कतह नहीं चाहते सिर्फ तुम खुश
रहो l
महफिल में खुले आम मोहब्बत जता भी नहीं
सकता ll
जहाँ वालों की नजरों से बचकर आख़री बार
आज l
मुलाकात कर प्यास जिगर की बुझा भी नहीं
सकता ll
ख्वाबों और ख्वाइशों के पीछे दोड़ लगा दी
है सखी l
कोई भी तूफान मेरी जगह से हिला भी नहीं
सकता ll
४-५-२०२६
गर्मी की दुपहरी
गर्मी की दुपहरी का अलग ही अंदाज होता हैं l
छोटा बड़ा हर कोई चैन और सुकून खोता हैं ll
सूर्य की तेज किरनों की बौछार से बचने को l
इंसान और जानवर सभी छाया में सोता हैं ll
हर मौसम का लुफ्त उठाओ औ पेड़ न काटो l
हरियाली और दरख्त ठंडक को बोता हैं ll
अर्ध नंगे बच्चे ठंडे पानी में नहाते तो मजदूर l
तेज गर्मी के कहरके पसीने से तन धोता हैं ll
कोयल की कूंक मंत्रमुग्ध करती है और l
पंखी घौसला बनाने को चीजे संजोता हैं ll
५-५-२०२६
देर हो गई
जिंदगी को समझने में देर हो गई l
इधर उधर भटकने में देर हो गई ll
जहा मान ओ सत्कार ना हो उस l
जगह से निकलने में देर हो गई ll
कहा पर रुकना है ना समझे तो l
वक्त रह्ते अटकने में देर हो गई ll
परिस्थित की नजाकत को जान l
कैसे भी छटकने में देर हो गई ll
आज खूबसूरती का जाम पीकर l
महफिल में बहकने में देर हो गई ll
हसीन हुस्न के हाथों से पिया ओ l
प्यार से छलकने में देर हो गई ll
एक से बढ़कर एक परियां फिर भी l
सुंदरता देख मचलने में देर हो गई ll
६-५-२०२६
जाने क्यूँ
जाने क्यूँ लोग जाम पिया करते हैं?
फक्त जीने के लिए जिया करते हैं?
चार दिन खुश रह दिल बहलाने l
मोहब्बत का दर्द लिया करते हैं?
नज़दीक जाने में रुस्वाई के डर से l
दूर से ही दीदार किया करते हैं?
इश्क़ के शोलों को बुझाने को l
जिगर हसी से सिया करते हैं?
प्यार का इज़हार भी कैसे करे l
बुरा न लग जाए बिया करते हैं?
७-५-२०२६
सुलगते सवाल
तेरे बग़ैर कर लेगे गुज़ारा भी l
फ़िर न कभी मिलेंगे दुबारा भी ll
अब सुलगते सवाल रह गये है l
ना रहा जवाबों का सहारा भी ll
आग दौनी तरफ से लगी है तो l
दिन रात जलते रहे शरारा भी ll
आज जी चाहे खुशियाँ मना लो l
कभी वक्त आएगा हमारा भी ll
उल्फत तो रंग लाकर रहेगी कि l
दिल भी मचलेगा तुम्हारा भी ll
८-५-२०२६
सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह
माँ
नामाबर को आने में देर हो गई l
चैन ओ सुकून की घड़ी खो गई ll
माँ ने चिट्ठी भेजी बेटा कब आएगा l
फ़िर से सुलगते सवाल को बो गई ll
राह तकती हुई दरवाज़े पर खड़ी l
इंतजार करते करते वही सो गई ll
दीदार की तमन्ना औ आशाभरी l
एक और शाम ही यूहीं लो गई ll
मन बना लिया न मिलने का तो l
बुलाने पर न आया माँ रो गई ll
९-५-२०२६
खास
एसा भी कुछ खास नहीं लिखा हैं l
जानेमन को दास नहीं लिखा हैं ll
खुद को और अपनों के लिए किया l
आम नृत्य को रास नहीं लिखा हैं ll
जी में आया वो कविता में लिखा l
शब्द लिखे एहसास नहीं लिखा हैं ll
आगे कुआँ पीछे खाई है इस लिए l
सत्य को आभास नहीं लिखा हैं ll
उजालों को अपनी ओर लाना है तो l
अंधेरे को आसपास नहीं लिखा हैं ll
१०-५-२०२६