mother's mother in Hindi Moral Stories by Anant Dhish Aman books and stories PDF | मांई के मांई

Featured Books
  • ​ഡാർക്ക് നൈറ്റ് - 3

    ​അധ്യായം 3: അദൃശ്യമായ ചക്രവ്യൂഹം​ഇൻസ്പെക്ടർ ഡെറിക്കിന്റെ ലോഡ...

  • ​ഡാർക്ക് നൈറ്റ് - 2

    അധ്യായം 2: മരണപ്പാച്ചിൽ​മൊബൈൽ സ്ക്രീനിൽ ചോരച്ചുവപ്പോടെ തെളിഞ...

  • ​ഡാർക്ക് നൈറ്റ് - ​1

    ​അധ്യായം 1: അർദ്ധരാത്രിയിലെ ഒപ്പുചാർത്തൽ​കൊച്ചി നഗരത്തെ ഒന്ന...

  • HITLER: The Death Note

    (ഈ കഥ തികച്ചും സാങ്കല്പികവും, വായനകാരൻ്റെ വിനോദത്തിനും മാത്ര...

  • ഗൗരി

    നിലാ വെളിച്ചം കെട്ടികിടക്കുന്ന താമര പൂക്കൾ നിറഞ്ഞ ഒരു കുളത്ത...

Categories
Share

मांई के मांई


मनुष्य के जीवन में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिनका महत्व शब्दों में पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता। वे रिश्ते केवल पारिवारिक संबंध नहीं होते, बल्कि जीवन की भावनात्मक जड़ों से जुड़े होते हैं। नानी का रिश्ता भी ऐसा ही एक अनुपम रिश्ता होता है। नानी केवल मां की मां नहीं होतीं, वे पूरे परिवार की संवेदनाओं, परंपराओं, संस्कारों और स्मृतियों की जीवित धरोहर होती हैं। उनके होने से घर में केवल लोगों की उपस्थिति नहीं रहती, बल्कि उसमें आत्मीयता, स्नेह और अपनापन बसता है।

बचपन से लेकर जीवन के हर पड़ाव तक नानी का स्नेह किसी छांव की तरह साथ चलता है। उनके हाथों का स्पर्श, उनकी दुआएँ, उनकी कहानियाँ, उनकी डांट में छिपा प्रेम और उनकी आंखों में दिखाई देने वाला अपनापन—ये सब जीवन की ऐसी अमूल्य निधियां हैं, जिनकी कीमत समय बीतने के साथ और अधिक समझ में आती है। जब तक वे हमारे बीच रहती हैं, तब तक हम उनके प्रेम को जीवन का सामान्य हिस्सा मान लेते हैं; लेकिन उनके जाने के बाद एहसास होता है कि घर का सबसे शांत, सबसे पवित्र और सबसे स्नेहमयी कोना कितना सूना हो गया है।

मेरी नानी भी हमारे परिवार की वही स्नेहिल शक्ति थीं, जिनकी उपस्थिति पूरे ननिहाल को एक सूत्र में बांधे रखती थी। उनका स्वभाव अत्यंत सरल, सहज और प्रेमपूर्ण था। उनके पास बैठते ही मन को एक अजीब-सी शांति मिलती थी। ऐसा लगता था जैसे सारी चिंताएं उनके स्नेह के सामने छोटी पड़ जाती हों। वे केवल अपने बच्चों और नाती-पोतों की चिंता नहीं करती थीं, बल्कि पूरे परिवार की खुशियों और दुखों को अपने हृदय में संजोकर रखती थीं।

उनके जीवन में अनुभवों का विशाल संसार था। वे जो बातें कहती थीं, उनमें जीवन का सार छिपा होता था। कभी वे अपने पुराने दिनों की बातें सुनातीं, कभी परिवार की परंपराओं का महत्व समझातीं और कभी अपने सहज शब्दों में जीवन की गहरी सीख दे जातीं। उनकी बातें केवल सुनने के लिए नहीं होती थीं, वे धीरे-धीरे हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती थीं।

मेरे और नानी के संबंध में सबसे विशेष था मेरा वह संबोधन—“मांई के मांई”। मैं उन्हें इसी नाम से पुकारता था। यह संबोधन मेरे मन से सहज रूप से निकला था, लेकिन धीरे-धीरे यह हमारे पूरे ननिहाल की पहचान बन गया। जब भी मैं उन्हें “मांई के मांई” कहकर बुलाता, उनके चेहरे पर एक अद्भुत मुस्कान खिल उठती थी। उनकी आंखों में जो आनंद दिखाई देता था, वह शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। ऐसा लगता था मानो उस संबोधन में उन्हें केवल प्रेम ही नहीं, बल्कि अपने पूरे अस्तित्व का सम्मान महसूस होता हो।

केवल नानी ही नहीं, बल्कि पूरा ननिहाल इस संबोधन को सुनकर प्रसन्न हो उठता था। परिवार के लोगों के चेहरों पर मुस्कान आ जाती थी। धीरे-धीरे “मांई के मांई” केवल एक शब्द नहीं रहा, बल्कि वह पूरे परिवार के स्नेह और आत्मीयता का प्रतीक बन गया। उस संबोधन में मेरे बचपन की मासूमियत थी, नानी का वात्सल्य था और ननिहाल का अपनापन था।

आज जब मैं पीछे मुड़कर उन दिनों को याद करता हूं, तो लगता है कि जीवन का सबसे सुंदर समय वही था, जब नानी की छाया हमारे ऊपर थी। उनके हाथों से बना भोजन, उनके पास बैठकर बातें करना, त्योहारों के समय घर में उनकी व्यस्तता, परिवार के हर सदस्य की चिंता करना—ये सब स्मृतियां आज भी मन में उसी जीवंतता के साथ उपस्थित हैं।

लेकिन समय का नियम अटल है। एक दिन ऐसा भी आया, जब नानी इस संसार से विदा हो गईं। उनके जाने के बाद पहली बार यह एहसास हुआ कि किसी एक व्यक्ति का अभाव पूरे परिवार को कितना बदल देता है। घर वही रहा, लोग वही रहे, आंगन वही रहा, लेकिन फिर भी सब कुछ अधूरा-सा लगने लगा। ऐसा लगा मानो घर की आत्मा ही शांत हो गई हो।

उनके जाने के बाद सबसे अधिक जो बात मन को व्यथित करती है, वह यही है कि अब मैं उन्हें प्रत्यक्ष रूप से कभी “मांई के मांई” कहकर नहीं पुकार सकूंगा। यह विचार मन को भीतर तक भर देता है। कभी-कभी अनायास ही मन उन्हें उसी नाम से पुकारना चाहता है, लेकिन फिर स्मृतियों की नीरवता सामने आ खड़ी होती है।

फिर भी, यह भी सत्य है कि कुछ लोग कभी पूरी तरह दूर नहीं जाते। वे अपने पीछे इतनी गहरी स्मृतियां छोड़ जाते हैं कि उनका अस्तित्व हमारे जीवन में हमेशा बना रहता है। मेरी नानी भी आज अपनी स्मृतियों, अपने संस्कारों और अपने प्रेम के रूप में हमारे बीच जीवित हैं। उनके दिए हुए संस्कार आज भी जीवन का मार्गदर्शन करते हैं। उनकी दुआओं का एहसास आज भी कठिन समय में साहस देता है।

नानी का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं होता, बल्कि परिवार के उस अध्याय का शांत हो जाना होता है, जिसमें निस्वार्थ प्रेम, धैर्य, त्याग और आत्मीयता का संसार बसता है। बड़े बुजुर्ग परिवार की जड़ होते हैं। वे परिवार को केवल जोड़ते ही नहीं, बल्कि उसे दिशा भी देते हैं। उनके अनुभव आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकाश बनते हैं।
मेरे लिए “मांई के मांई” केवल एक संबोधन नहीं है। यह मेरे जीवन की सबसे सुंदर स्मृतियों का नाम है। यह वह शब्द है, जिसमें मेरा बचपन, मेरा ननिहाल, मेरी भावनाएं और मेरी नानी का असीम स्नेह समाया हुआ है। समय चाहे कितना भी बीत जाए, जीवन कितना भी बदल जाए, लेकिन यह संबोधन मेरे हृदय में सदैव जीवित रहेगा।

जब-जब मैं अपनी स्मृतियों के आंगन में लौटूंगा, वहां मुझे नानी की वही स्नेहमयी मुस्कान दिखाई देगी, और मन अनायास ही पुकार उठेगा—
“मांई के मांई…”