Ishq ka Ittefaq - 5 in Hindi Love Stories by Alok books and stories PDF | Ishq ka Ittefaq - 5

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Ishq ka Ittefaq - 5

सिया की आँखों से निकले वो गर्म आंसू कबीर के हाथ पर गिरे, तो उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने दहकते हुए अंगारे उसकी हथेली पर रख दिए हों. कमरे में पुलिस बुलाने की बात पर सन्नाटा ऐसा पसरा था


कि बाहर चल रही हवा की सरसराहट भी साफ सुनाई दे रही थी. विक्रम अपनी चाल पर मन ही मन इतना खुश था कि उसकी बाछें खिली जा रही थीं, पर वो अपनी इस कमीनी मुस्कान को कबीर के सामने छुपाने की पूरी कोशिश कर रहा था. कबीर भाई, अब सोच क्या रहे हो?


इस चोर लडकी को पुलिस के हवाले करो, वरना ये हमारे दूसरे पेपर्स भी गायब कर देगी, विक्रम ने माहौल को और गरमाते हुए कहा. कबीर ने एक नजर फर्श पर बिखरी हुई फाइलों पर डाली और फिर सिया के उस लाल, गुस्से से तमतमाए चेहरे को देखा. उसका दिमाग कह रहा था कि सबूत सामने है,


लडकी चोर है. पर उसका दिल. उसका दिल चीख- चीख कर कह रहा था कि जो लडकी अपनी स्वाभिमान के लिए भूखी सो सकती है,
वो चंद पैसों के लिए चोरी कभी नहीं करेगी. सब बाहर निकलो यहाँ से! कबीर अचानक दहाडा. उसकी आवाज में एक अजीब सा कंपन था.


पर कबीर बेटा, ये लडकी. काम्या बुआ ने बीच में बोलना चाहा. मैंने कहा सब बाहर निकलो! मुझे सिया से अकेले में बात करनी है,


कबीर ने बिना पीछे मुडे कडक आवाज में कहा. काम्या बुआ ने गुस्से में अपने पैर पटके और विक्रम को इशारा करके कमरे से बाहर ले गईं. नौकर भी दबे पांव खिसक गए. कमरे में अब सिर्फ कबीर और सिया थे.


सिया ने अपनी आस्तीन से आंसू पोंछे और अपनी बिखरी हुई किताबें समेटने लगी. तुम्हें क्या लगता है सिया, मेहरा मेंशन में आकर तुम जो चाहोगी वो कर लोगी? कबीर ने अपनी आवाज को सख्त बनाने की कोशिश की, पर वो खुद अंदर से टूट रहा था. सिया खडी हुई, उसकी आँखों में अब आंसुओं की जगह अंगारे थे.


मिस्टर मेहरा, आपकी दौलत आपके दिमाग पर चढ गई है. मैंने आपके Hospital का डेटा रात भर जागकर इसलिए सही किया क्योंकि मुझे गायत्री दादी की फिक्र थी, आपकी बडी- बडी गाडियों और औकात की नहीं. अगर मुझे चोरी ही करनी होती, तो मैं आपकी तिजोरी साफ करती, इस सडी हुई सरकारी फाइल का मैं क्या करूंगी.


कबीर उसकी बात सुनकर एक पल के लिए ठिठक गया.

बात में दम था. अगर कोई जासूस या चोर होता, तो वो टेंडर फाइल सीधे अपने क्लाइंट को व्हाट्सएप करता या मेल करता, उसे अपने बैग में कपडों के बीच छुपाकर क्यों रखता? ठीक उसी वक्त, कबीर के फोन की घंटी बजी. स्क्रीन पर उसके पर्सनल सिक्योरिटी हेड का नाम था.


हाँ शर्मा, बोलो, कबीर ने फोन कान से लगाया.
सर, आपने जो दोपहर को ऑफिस केबिन के पास का सीसीटीवी फुटेज Check करने को कहा था. वो मैंने देख लिया है. सर, डॉक्टर सिया आज पूरे दिन में एक बार भी आपके केबिन की तरफ नहीं आईं. बल्कि. दोपहर को जब आप Meeting में थे,


तब विक्रम sir आपके केबिन में घुसे थे और उनके हाथ में वही लाल फाइल थी, शर्मा ने दूसरी तरफ से पूरा सच उगल दिया. कबीर के हाथ से फोन छूटते- छूटते बचा. उसके पैरों तले की जमीन सचमुच खिसक चुकी थी.


सामने वो बेकसूर लडकी खडी थी, जिसे उसने सरेआम चोर कह दिया, जिसका बैग उसने सबके सामने उल्टा कर दिया.


और असली सांप तो उसके अपने ही घर में बैठा था, उसका सगा चचेरा भाई विक्रम. कबीर का वो सदियों पुराना मेहरा खानदान का घमंड, उसका वो गुरूर, कांच के महल की तरह एक झटके में चकनाचूर हो गया. उसने धीरे से सिया की तरफ देखा. सिया अपनी डायरी बैग में डाल रही थी,



उसकी उंगलियां गुस्से से कांप रही थीं. सिया. मुझे. कबीर के हलक से शब्द नहीं निकल रहे थे. जिस इंसान ने कभी किसी से माफी नहीं मांगी, आज उसकी जबान लडखडा रही थी. अब कुछ मत कहिए Mister मेहरा. मैं इस घर में अपनी मर्जी से नहीं आई थी,


और अब एक पल भी यहाँ नहीं रुकूंगी, सिया ने अपना बैग उठाया और दरवाजे की तरफ बढी. जैसे ही उसने दरवाजा खोला, सामने व्हीलचेयर पर गायत्री दादी खडी थीं.


उनकी आँखों में गुस्सा और निराशा साफ दिख रही थी. उनके पीछे बलराज दादाजी भी खडे थे. कबीर! गायत्री दादी की कमजोर आवाज में आज गजब की karkhat थी. तूने आज जो किया है, उसके बाद मुझे शर्म आती है कि तू मेरा पोता है. इस बच्ची ने मेरी जान बचाई, रात भर जागकर तेरा काम किया,


और तूने अपने उस निकम्मे भाई की बातों में आकर इस पर इतना बडा लांछन लगा दिया? कबीर ने अपना सिर झुका लिया. बलराज दादाजी आगे बढे, उन्होंने विक्रम का कॉलर पकडा और उसे घसीटते हुए हॉल के बीच में ले आए. बलराज भाई साहब, ये आप क्या कर रहे हैं ? मेरे बेटे को छोडिए! काम्या बुआ चीखीं. चुप रहो काम्या!


बलराज जी ने चिल्लाकर कहा. तुम्हारे और तुम्हारे बेटे के पापों का घडा भर चुका है. कबीर के केबिन का फुटेज मैंने भी देखा है. विक्रम, तूने सिर्फ इस लडकी को नहीं फंसाया, तूने मेहरा खानदान के बिजनेस को दांव पर लगाया है.



बलराज जी ने तुरंत पुलिस को फोन मिलाया. इंस्पेक्टर साहब, मेहरा मेंशन आइए. हमारे घर में एक चोर है. मेरा भतीजा विक्रम. हॉल में हंगामा मच गया. काम्या बुआ रोने लगीं, विक्रम पुलिस के डर से बलराज जी के पैर पकडने लगा. पर कबीर का ध्यान इस ड्रामे पर था ही नहीं.


उसकी नजरें सिर्फ उस गेस्ट- हाउस के रास्ते पर थीं, जहाँ से सिया अपना बैग लेकर मेंशन के मेन गेट की तरफ बढ रही थी. कबीर बिना कुछ सोचे- समझे, अपनी चप्पलें वहीं छोडकर नंगे पैर सीधे बाहर की तरफ भागा.


दिल्ली की वो सडक दोपहर की धूप से तप रही थी, पर कबीर को सिर्फ सिया को रोकना था.
सिया! रुको! कबीर ने पीछे से आवाज दी. उसकी भारी आवाज में आज कोई घमंड नहीं था, पर कडकपन अब भी वही था.


सिया के कदम नहीं रुके. वह बस तेज कदमों से आगे बढती रही. कबीर ने दौडकर उसका रास्ता रोक दिया. वह सीधे सिया के सामने आकर एक चट्टान की तरह खडा हो गया. दोनों की आँखें फिर से टकराईं. सिया ने गुस्से में अपना बैग सीने से सटा लिया. सामने से हटिए Mister मेहरा! अब क्या बाकी रह गया है ?


बेइज्जती करने का कोई नया बहाना ढूंढ लाए हैं क्या? सिया चिल्लाई, उसकी आँखों में अब भी स्वाभिमान का पानी था. कबीर अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हिला. उसका वो छह फीट का कडक जिस्म दोपहर की धूप में तप रहा था. उसने अपने दोनों हाथ अपनी पैंट की जेब में डाले, उसकी आँखें लाल थीं,


पर उन आँखों में आज पहली बार कबीर मेहरा का गुरूर गायब था, वहाँ सिर्फ एक गहरा और सच्चा पछतावा था. सिया ने तंज कसते हुए एक कडवी मुस्कान के साथ कहा,
चूक?
आपने सबके सामने मुझे चोर साबित कर दिया Mister मेहरा! आपकी इस बडी साख के महल में मेरा आत्मसम्मान कोई कचरा नहीं है जिसे आप जब चाहें पैर से कुचल दें.


विक्रम को पुलिस ले जा रही है. सीसीटीवी फुटेज देख लिया है मैंने, कबीर ने सीधे सिया की आँखों में देखते हुए बात काटी. वह आगे बढा, दोनों के बीच अब सिर्फ कुछ इंच का फासला था. कबीर का वो रौबदार चेहरा आज सिया की बेगुनाही के आगे थोडा सा नरम पड चुका था.


मुझे पता है तुम यहाँ से चली जाओगी, तो गायत्री दादी का इलाज रुक जाएगा. और. और मैं नहीं चाहता कि मेरी दादी को कुछ भी हो. मैं हाथ नहीं जोड सकता सिया, वो कबीर मेहरा की फितरत में नहीं है. पर मैं. मैं पहली बार अपनी जबान से कह रहा हूँ कि


आई एम सॉरी,


कबीर ने अपनी आँखें हल्की सी झुकाते हुए कहा. यह उसका अपना तरीका था अपनी हार मानने का. सिया ने कबीर को इस हालत में देखा. जो इंसान कभी किसी की नहीं सुनता था, आज वो धूप में नंगे पैर खडा होकर, अपना भारी एटीट्यूड साइड में रखकर उससे अपनी गलती मान रहा था.


कबीर का यह कडक पर सच्चा रूप सिया के दिल के भीतर जमी नफरत की बर्फ को धीरे- धीरे पिघलाने लगा. उसे समझ आ गया कि कबीर झुका नहीं है, पर उसके भीतर का इंसान जाग चुका है. ये नफरत अब धीरे- धीरे उस मोड पर आ गई थी, जहाँ से सिर्फ प्यार का रास्ता गुजरता था.



सिया ने अपना बैग संभाला. ठीक है Mister मेहरा. मैं वापस सिर्फ और सिर्फ गायत्री दादी के लिए आ रही हूँ, आपके इस' सॉरी' के एहसान के लिए नहीं. पर याद रखिएगा, अब अगर आपने मेरे आत्मसम्मान पर दोबारा चोट की, तो कबीर मेहरा का नाम इस दुनिया से मिटाने में मुझे एक पल भी नहीं लगेगा.


कबीर के चेहरे पर एक हल्की सी, राहत भरी मुस्कान आई. उसने जेब से हाथ निकाला और सिर हिलाया. उसे पता था कि उनके बीच की वो नफरत की दरार अब खत्म हो चुकी है, और अब इस इश्क के इत्तेफाक का एक नया,


खूबसूरत पन्ना शुरू होने वाला है. क्या सिया का वापस मेंशन में आना काम्या बुआ को किसी नए और खतरनाक खेल के लिए उकसाएगा?


क्या पुलिस स्टेशन जाने के बाद विक्रम जेल से छूटकर कबीर और सिया की जिंदगी बर्बाद करने का कोई नया चक्रव्यूह रचेगा?


और क्या कबीर अपने दिल के इस नए एहसास को सिया के सामने कबूल कर पाएगा,


या फिर उनके बीच का यह अनकहा प्यार किसी नए तूफान की भेंट चढ जाएगा ?


क्या मोड लेगी अब कबीर और सिया की यह नई दास्तान?


जानने के लिए देखिए अगला अध्याय !