इधर श्रेया की आँखों से नींद रूठ चुकी थी। करवट बदलते-बदलते उसका मन बार-बार करण की तरफ भाग जाता। उसे अपनी बेचैनी का कारण खुद भी समझ आ रहा था—वह डर और नाराज़गी के बावजूद करण के टूटे हुए हालात की कल्पना से काँप उठती थी। उसके बिना करण कैसा होगा, यह सवाल उसे चैन नहीं लेने दे रहा था।
श्रेया बोली -
वो खुद को कितना दोष दे रहे होंगे… अकेले कैसे संभाल रहे होंगे सब?
उसे याद आया कि कैसे करण हमेशा मजबूत बनने की कोशिश करता था। घर का बड़ा बेटा—जिसे रोने की इजाज़त नहीं थी। वही करण, जो सबको संभालते-संभालते खुद बिखर जाता था। यह सोचते ही श्रेया का दिल भर आया। गुस्सा अब भी था, पर उसके नीचे कहीं दया और चिंता चुपचाप साँस ले रही थी।
श्रेया बोली -
अगर वो रो पड़े होंगे तो… उन्हें संभालने वाला कौन है?
खिड़की से आती हल्की हवा में उसे करण की मौजूदगी का अहसास हुआ—जैसे उसकी खामोशी भी पुकार रही हो। श्रेया ने तकिए को सीने से लगा लिया। उसे लग रहा था, जैसे दो रास्तों के बीच खड़ी हो—एक तरफ अपना डर, दूसरी तरफ किसी टूटे इंसान की जिम्मेदारी।
श्रेया बोली -
मैं माफ़ कर पाऊँगी या नहीं, ये नहीं जानती… पर अगर वो खुद को खत्म कर बैठे तो?
उस रात श्रेया ने पहली बार महसूस किया कि जख़्म भरने में वक्त लगता है, और सच का सामना करने में हिम्मत। उसकी बेचैनी इसी हिम्मत की तलाश थी—अपने लिए भी, और करण के लिए भी।
कुछ दिन और बीत गए। समय जैसे रेत की तरह फिसल रहा था। अब उसके पास करण के पास जाने के लिए सिर्फ़ दस दिन बचे थे। कैलेंडर की तारीख़ें उसे हर सुबह चुपचाप याद दिला देतीं—कि यह साथ भी उधार का है। इन दिनों में श्रेया ने कबीर को बदलते देखा। वह बदलाव अचानक नहीं था, बल्कि रातों-रात पनपता हुआ एक सन्नाटा था, जो उसकी आँखों के नीचे उतर आता था।
श्रेया बोली -
कबीर जी… आप ठीक तो हैं न?
कबीर मुस्कुरा देता, पर उसकी मुस्कान में पहले वाली शरारत नहीं होती। रात होते ही वह श्रेया के सीने से लग जाता—बिल्कुल वैसे ही, जैसे कभी करण लग जाया करता था। फर्क बस इतना था कि कबीर की पकड़ में डर था, और साँसों में टूटन। वह पूरी रात उसके सीने से लगा सिसकियाँ लेता रहता, जैसे नींद में भी किसी खोने का डर उसे जगा देता हो।
कबीर (धीमे स्वर में) बोला -
मत जाओ… अभी मत जाओ।
श्रेया का दिल काँप उठता। उसे समझ नहीं आता कि वह किसे संभाले और कैसे। उसे करण की याद आती—वही बेचैनी, वही खामोशी, वही रातों का रोना। उसे एहसास हुआ कि दर्द का चेहरा बदल सकता है, पर उसकी भाषा एक जैसी ही रहती है। वह कबीर के बालों में उँगलियाँ फेरती रहती, जैसे किसी बच्चे को सुला रही हो।
श्रेया बोली -
मैं यहीं हूँ… डरने की ज़रूरत नहीं।
पर भीतर कहीं उसे डर लग रहा था—कि कहीं यह दर्द भी वही राह न पकड़ ले। दस दिन… बस दस दिन। हर दिन उसके लिए एक इम्तिहान बन गया था। वह कबीर को टूटते देखती, और करण को याद करती। दो दिल—दोनों उसके अपने—और वह खुद बीच में खड़ी, खुद को भी संभालने की कोशिश में।
श्रेयाः (मन ही मन) बोली -
काश… मैं दोनों का दर्द बाँट सकती।
कबीर दिन-ब-दिन टूटता जा रहा था। उसे पता था कि यह साथ हमेशा का नहीं है। बस कुछ ही दिनों बाद श्रेया एक महीने के लिए उससे दूर चली जाएगी। यह सोच उसके भीतर ऐसे चुभती, जैसे कोई न दिखने वाला काँटा हर पल दिल में गहराता जा रहा हो। दिन में वह खुद को संभाल लेता, पर रातें उसके लिए सबसे कठिन हो जातीं।
कबीर (धीरे से) बोला -
श्रेयाः… तुम चली जाओगी न?
श्रेया कुछ नहीं कह पाती। बस उसकी आँखों में देखती रहती। उसे झूठा दिलासा देने का मन नहीं करता था, और सच कहने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाती थी। कबीर उसके पास बैठा रहता, जैसे हर पल को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लेना चाहता हो।
श्रेया बोली -
ये कुछ दिन… शांति से गुज़ार लेते हैं, कबीर जी।
कबीर मुस्कुराने की कोशिश करता, पर उसकी आँखें नम हो जातीं। उसे लगता, जैसे वह फिर उसी मोड़ पर खड़ा है—जहाँ उसे अपने बड़े भाई की जगह दिखाई देने लगी थी। वही बेचैनी, वही असहायपन। उसे डर था कि कहीं वह भी करण की तरह अंदर-ही-अंदर टूट न जाए।
कबीर (भर्राई आवाज़ में) बोला -
अगर मैं रो पड़ा तो… तुम मुझे कमज़ोर समझोगी?
श्रेया ने उसका सिर अपने सीने से लगा लिया।
उसे एहसास हुआ कि यह सिर्फ़ दूरी का डर नहीं था, बल्कि खो देने की आशंका थी—वही आशंका जिसने इस घर के हर रिश्ते को कहीं न कहीं घायल किया था।
श्रेया बोली -
कमज़ोर नहीं… इंसान समझूँगी।
कबीर की सिसकियाँ तेज़ हो गईं। वह पहली बार बिना किसी संकोच के टूट रहा था। श्रेयाः खामोशी से उसे थामे रही, यह जानते हुए कि आने वाला महीना सिर्फ़ दूरी नहीं लाएगा—बल्कि तीनों के दिलों की सबसे बड़ी परीक्षा लेने वाला है।