son of the soil in Hindi Classic Stories by prem chand hembram books and stories PDF | धरतीपुत्र

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धरतीपुत्र

🌿 धरतीपुत्र — एक साहसिक गाथा 🌿
(संवेदनाओं और संघर्ष की विस्तृत कथा )
कोयले की धूल और पत्थरों की चोटों के बीच जीवन बिताने वाले बाबूराम हेंब्रम का चेहरा हमेशा धूप में तपे खेत जैसा दिखता था — कठोर, पर भीतर से जीवनदायी।
उनकी अपनी कोई संतान नहीं थी, पर भाई का बेटा अनिल ही उनका सब कुछ था।
उनके भाई फागू हेंब्रम की मृत्यु ज़हरीले सांप के काटने से हो गई थी। समय पर अस्पताल पहुंचने का रास्ता भी गांव में ठीक से नहीं था।
अनिल की मां अपने पति की मृत्यु के गहरे सदमे में डूब गई।
एक रात वह बच्चे को दूध पिलाकर सोई…
पर सुबह कभी न उठी।
दूधमुंहे बच्चे के रोने की आवाज़ पूरी रात बाबूराम के कानों में गूंजती रही।
वह भावज के कमरे में जाने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे।
तभी पास में रहने वाली उनकी भाभी दौड़ी हुई आई।
बाबूराम के मुंह से शब्द नहीं निकले।
अनहोनी का अंधेरा उनकी आंखों में उतर चुका था।
उस दिन अनिल के सिर से मां-बाप दोनों का साया उठ गया।
गीली आंखों से बाबूराम ने आकाश की ओर देखा।
भगवान की इस कठोर परीक्षा के सामने वह चट्टान की तरह खड़े रहे।
दोहरे जिम्मेदारियों ने कब उन्हें बूढ़ा कर दिया, उन्हें स्वयं पता न चला।
सुबह होते ही वह पत्थर तोड़ते,
दोपहर खेतों में मजदूरी करते,
और छोटा अनिल स्कूल के बाद गाय-बकरियां चराता।
रात को लालटेन की मद्धिम रोशनी में जब अनिल किताब खोलकर बैठता, तब बाबूराम की थकी आंखों में सुकून उतर आता।
लेकिन कई रात बाबूराम चुपचाप आंगन में बैठ जाते।
बुझती लालटेन के सामने फागू की पुरानी गमछा हाथ में लेकर सोचते—
“फागू… चिंता मत करना…
जब तक सांस है, अनिल को टूटने नहीं दूंगा।”
यही उनका संसार था।
गांव वाले अक्सर कहते—
“ऐसा त्यागी आदमी हमने नहीं देखा।”
वर्षों की तपस्या आखिर रंग लाई।
अनिल हेंब्रम ने पहले ही प्रयास में JPSC उत्तीर्ण कर लिया।
परिणाम आते ही बाबूराम के मिट्टी के घर पर मीडिया का जमावड़ा लग गया।
पूरा मोहल्ला मिठाइयों की खुशबू से भर उठा।
उस दिन बाबूराम की आंखों में आंसू थे।
उन्होंने कांपते हाथों से अनिल के सिर पर हाथ रखा और कहा—
“बेटा… धरती हमें सब कुछ देती है।
पर आज धरती मां रो रही है।
पत्थर की खदानें, गहरे बोरिंग…
इंसान उसकी छाती छलनी कर रहा है।
ध्यान रखना…
तुम्हें मां को बचाना है।”
अनिल ने झुककर उनके पैर छुए।
कुछ समय बाद उसे बोकारो जिले में DMO (District Mining Officer) की जिम्मेदारी मिली।
🌱 धरती की पुकार
बोकारो…
जहां कभी जंगलों की नमी और खेतों की हरियाली थी, वहां अब बड़े-बड़े रियल एस्टेट प्रोजेक्ट उग आए थे।
“नवनिर्माण सिटी होम”, “सुकून होम” और “नारायणी सिटी” जैसी कंपनियां करोड़ों कमा रही थीं।
नियमों को ताक पर रखकर सैकड़ों फ्लैट बनाए जा रहे थे।
हर जगह डीप बोरिंग।
धरती कांपती थी।
पानी नीचे भागता जा रहा था।
सूखे खेत मानो आसमान से पानी नहीं, दया मांग रहे थे।
धरती की फटी छाती हर नए बोरिंग के साथ और गहरी होती जा रही थी।
गांवों के कुएं गर्मी आते ही सूख जाते।
बुजुर्ग दुख से कहते—
“हमारे समय दस फीट खोदो तो सालभर पानी मिलता था…
अब सैकड़ों फीट बोरिंग के बाद भी पानी नहीं।”
लेकिन शिकायत करना आसान नहीं था।
क्योंकि इस पूरे खेल के पीछे था बाहुबली नेता — रामू साव उर्फ़ रामू दा।
उसकी अनुमति के बिना कोई बिल्डर सांस भी नहीं ले सकता था।
⚖️ एक ईमानदार अधिकारी
ड्यूटी संभालते ही अनिल ने पहला आदेश जारी किया—
“बिना अनुमति कोई खनन या डीप बोरिंग नहीं होगी।”
पूरा सिस्टम हिल गया।
दलालों के चेहरे उतर गए।
कंपनियों के करोड़ों अटक गए।
गांव के धनीराम मुंडा को पहली बार उम्मीद जगी।
उसने रजवार टोला, भुइयां टोला, मांझी टोला और दास टोला के लोगों को इकट्ठा किया और लंबा आवेदन लेकर DMO कार्यालय पहुंचा।
अनिल ने सबकी बातें ध्यान से सुनीं।
वह मिट्टी से जुड़ा आदमी था।
उसने हल चलाया था।
बकरियां चराई थीं।
उसे पता था—
“भारत सिर्फ शहरों में नहीं…
गांवों की सांसों में बसता है।”
जल्द ही SP, वन विभाग और प्रशासन के ईमानदार अधिकारियों के साथ बैठक हुई।
अब रियल एस्टेट कंपनियों की नींद उड़ चुकी थी।
🔥 दबाव, राजनीति और हमला
कुछ अधिकारी भीतर ही भीतर हंसते—
“नया खून है…
थोड़े दिन में सब समझ जाएगा।”
पर अनिल झुका नहीं।
उसने सख्त नियम लागू किए—
निश्चित दूरी पर ही बोरिंग
वर्षा जल संरक्षण अनिवार्य
उपयोग किए गए पानी का पुनर्चक्रण
अवैध खनन पर सीधी कार्रवाई
काम रुकने लगे।
कंपनियां घाटे में जाने लगीं।
राजनीति शुरू हो गई।
DMO का तबादला कराने की मुहिम छिड़ गई।
लेकिन मुख्यमंत्री आदिवासी थे।
वे जंगल और मिट्टी का दर्द समझते थे।
भीतर ही भीतर वे अनिल के साथ खड़े थे।
इसी बीच एक रात शादी से लौटते समय अनिल की गाड़ी पर हमला हुआ।
पहली गोली उसके कान को छूती हुई निकल गई।
दूसरी गोली पीछे बैठे सहकर्मी की बांह में लगी।
हमलावर अंधेरे में भाग गए।
अगले दिन अखबारों और चैनलों में खबर छा गई।
💔 पत्नी का भय
अब तक अनिल का एक छोटा बेटा भी हो चुका था।
उसकी पत्नी मालती रोते हुए बोली—
“आपके पहले भी अधिकारी आए…
सबने करोड़ों कमाए… किसी को गोली नहीं लगी।
और यहां लोग आपकी जान लेने पर तुले हैं।
क्या मिलेगा आपको इस ईमानदारी से?”
अनिल कुछ देर शांत रहा।
फिर धीमे स्वर में बोला—
“अगर धरती बची नहीं…
तो आने वाले समय में हजारों बच्चे पानी के लिए तरसेंगे।
नदियां खत्म हो रही हैं…
जंगल खत्म हो रहे हैं…”
मालती की आंखों से आंसू बह निकले।
“कल तुम्हें कुछ हो गया तो हमारा क्या होगा?”
उस रात अनिल सो नहीं सका।
एक तरफ परिवार था।
दूसरी तरफ धरती मां।
अंततः उसने मन ही मन कहा—
“नहीं… मेरा प्रण अटल है।”
🌧️ जल-जंगल बचाओ आंदोलन
अगले दिन मीडिया के सामने अनिल ने कहा—
“मैं गरीब संताल का बेटा हूं।
वीर सिद्धू-कान्हू और तिलका मुर्मू का खून मेरी रगों में दौड़ता है।
अगर अपराधी सोचते हैं कि मैं डर जाऊंगा…
तो यह उनकी भूल है।”
उसने लोगों से अपील की—
वर्षा का पानी रोको
छोटे-छोटे डोभा बनाओ
गांव का पानी गांव में बचाओ
तालाबों को पुनर्जीवित करो
धीरे-धीरे आंदोलन शुरू हो गया।
धनीराम मुंडा, कैलाश रावत, मुंशी डोम, कालू तांती, चंदू मियां, जालसू मियां और रामचंद्र मुर्मू जैसे लोग गांव-गांव घूमने लगे।
कुछ ही महीनों में हजारों छोटे डोभा बन गए।
बारिश का पानी रुकने लगा।
धरती की सूखी छाती फिर से भीगने लगी।
🌳 हरियाली का नया युग
वन मंत्री ने बड़े जलाशयों और डैमों की योजना शुरू की।
सरकार ने घोषणा की—
“जो परिवार दस पौधे लगाएगा और उन्हें जीवित रखेगा, उसे आर्थिक सहायता दी जाएगी।”
मुख्यमंत्री ने स्वयं अनिल से सलाह लेकर पूरी योजना तैयार करवाई।
धीरे-धीरे पूरा जिला बदलने लगा।
जहां कभी धूल उड़ती थी, वहां अब हरियाली लौट आई।
सूखे कुओं में फिर पानी झलकने लगा।
सरकार ने सोलर पंप दिए।
जलस्तर ऊपर उठने लगा।
“अनिल मॉडल” की चर्चा देशभर की पत्रिकाओं में होने लगी।
🏅 अंतिम सम्मान
एक सुबह दिल्ली से संदेश आया—
“माननीय राष्ट्रपति महोदय आपको पर्यावरण संरक्षण और जनभागीदारी हेतु सम्मानित करेंगे।”
यह सुनते ही मालती की आंखें भर आईं।
वह अनिल के चरणों में गिर पड़ी ।
पर उस क्षण अनिल की आंखें कहीं और थीं…
उसे याद आ रहे थे बाबूराम हेंब्रम।
जिसने अपने जीवन में मां-बाप का प्यार खो चुके बच्चे को अपनी छाती से लगाकर बड़ा किया था।
अनिल की आंखें दीवार पर टंगी बाबूराम की पुरानी तस्वीर पर टिक गईं।
उसकी पलकों से खुशी और सम्मान के आंसू छलक पड़े।
उसे याद आया—
वह बूढ़ा आदमी…
जो पत्थर तोड़ते हुए भी सपने देखता था।
सम्मान ग्रहण करते समय अनिल ने महसूस किया—
जैसे पत्थर तोड़ते बाबूराम के कठोर हाथ आज भी उसके सिर पर आशीर्वाद बनकर रखे हों।
आज अगर बाबूराम जीवित होते…
तो शायद गर्व से कहते—
“मैंने सिर्फ एक अधिकारी नहीं…
इस देश को एक सच्चा धरतीपुत्र दिया है।”
जल्द ही सरकार ने “अनिल मॉडल” को पूरे प्रदेश में लागू कर दिया।
“किसान डोभा निर्माण योजना” गांव-गांव पहुंची।
अब चारों ओर हरियाली थी।
चिड़ियां चहचहाती थीं।
महिलाएं खेतों में गीत गाती थीं।
गाय-बकरियां भी मानो खुशी से झूम उठी थीं।
सूखी धरती अब मुस्कुरा रही थी।
धरती मां ने वर्षों बाद सुकून की सांस ली…
क्योंकि उसे अपना सच्चा धरतीपुत्र मिल गया था। 🌿
जयगुरु 🙏 🙏 🙏 
वंदे पुरुषोत्तमम