Ideology burning in the fire of the banyan tree in Hindi Magazine by Anant Dhish Aman books and stories PDF | वटवृक्ष की आग में सुलगती वैचारिकता

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वटवृक्ष की आग में सुलगती वैचारिकता

वटवृक्ष में आग लगने की घटना निस्संदेह अत्यंत दुःखद, चिंताजनक और आत्ममंथन का विषय है। किसी भी धार्मिक आस्था, परंपरा या अनुष्ठान का उद्देश्य कभी भी प्रकृति को हानि पहुँचाना नहीं हो सकता। यदि अनजाने में या असावधानीवश ऐसी घटनाएँ घटती हैं, तो समाज को संवेदनशील होकर उस पर विचार करना चाहिए और भविष्य में सुधार के उपाय खोजने चाहिए। किंतु दुर्भाग्य तब होता है जब किसी एक घटना को आधार बनाकर संपूर्ण सनातन संस्कृति, उसकी परंपराओं और उसके मूल भाव को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है।

सनातन संस्कृति का मूल दर्शन ही प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का रहा है। यह वही संस्कृति है जिसने नदियों को माता कहा, पृथ्वी को धारण करने वाली देवी माना, वृक्षों में देवत्व देखा और पशु-पक्षियों तक को जीवनचक्र का अभिन्न अंग स्वीकार किया। वटवृक्ष, पीपल, तुलसी, आंवला जैसे वृक्षों को केवल वनस्पति नहीं, बल्कि जीवनदायिनी चेतना के रूप में सम्मान दिया गया। आज जब विश्व पर्यावरण संरक्षण की बातें कर रहा है, तब भारतीय संस्कृति हजारों वर्षों पूर्व से “प्रकृति पूजन” की परंपरा को जीवनशैली के रूप में जीती आई है।

विशेष रूप से भारतीय महिलाओं की भूमिका इस सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। आदिकाल से लेकर आधुनिक युग तक महिलाओं ने अपने तप, त्याग, संयम और श्रद्धा के माध्यम से परिवार, समाज और संस्कृति को दिशा दी है। वट सावित्री व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह निष्ठा, समर्पण, धैर्य, परिवार की मंगलकामना और प्रकृति के प्रति आदर का प्रतीक है। सावित्री का चरित्र भारतीय नारी शक्ति, बुद्धिमत्ता और अटूट संकल्प का प्रतीक माना गया है। इस व्रत के माध्यम से महिलाएँ वटवृक्ष के प्रति श्रद्धा प्रकट करती हैं, क्योंकि वह दीर्घायु, स्थायित्व और जीवन संरक्षण का प्रतीक माना जाता है।

यह सत्य है कि समय के साथ हर परंपरा में जागरूकता और सुधार की आवश्यकता होती है। यदि किसी पूजा-पद्धति में ऐसी सामग्री या विधि का प्रयोग हो रहा है जिससे पर्यावरण को हानि पहुँचने की संभावना हो, तो समाज को स्वयं आगे बढ़कर उसका समाधान करना चाहिए। धर्म का वास्तविक स्वरूप जड़ता नहीं, बल्कि सतत परिष्कार है। सनातन का अर्थ ही है — जो समय के साथ स्वयं को शुद्ध और प्रासंगिक बनाए रखे। इसलिए यदि किसी घटना से सीख लेकर अधिक सुरक्षित, पर्यावरण-अनुकूल और जागरूक परंपराओं का निर्माण किया जाए, तो यह संस्कृति की कमजोरी नहीं बल्कि उसकी जीवंतता और आत्मसुधार की क्षमता का प्रमाण होगा।

किन्तु चिंताजनक पक्ष यह है कि कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी और भौतिकवादी विचारधारा के प्रतिनिधि ऐसी घटनाओं को अवसर बनाकर सनातन संस्कृति के प्रति अपनी कुंठा और पूर्वाग्रह प्रकट करने लगते हैं। वे इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं मानो प्रकृति का सबसे बड़ा शोषक केवल भारतीय परंपराएँ ही हों। जबकि यदि निष्पक्ष दृष्टि से देखा जाए तो आधुनिक उपभोगवादी जीवनशैली ने प्रकृति को सबसे अधिक क्षति पहुँचाई है। वातानुकूलित कमरों में बैठकर पर्यावरण संरक्षण की लंबी बातें करने वाले लोग स्वयं कितना ऊर्जा उपभोग करते हैं, कितनी प्लास्टिक और इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का उपयोग करते हैं, कितना जल और संसाधन नष्ट करते हैं — इस पर बहुत कम चर्चा होती है।

आज करोड़ों टन प्लास्टिक समुद्रों में पहुँच रहा है, जंगलों की अंधाधुंध कटाई हो रही है, उद्योगों से नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं, अत्यधिक उपभोक्तावाद पृथ्वी के संसाधनों को समाप्त कर रहा है — लेकिन इन सब पर उतनी तीव्र प्रतिक्रिया दिखाई नहीं देती, जितनी किसी धार्मिक परंपरा से जुड़ी एक घटना पर दिखाई जाती है। यह दोहरा दृष्टिकोण समाज में संतुलित विमर्श को कमजोर करता है।

यह भी स्मरणीय है कि भारतीय संस्कृति ने सदैव “सर्वे भवन्तु सुखिनः” और “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना को अपनाया है। यहाँ प्रकृति को जीतने या उसका शोषण करने की नहीं, बल्कि उसके साथ सामंजस्य स्थापित करने की शिक्षा दी गई है। ऋषि-मुनियों ने वन में रहकर ज्ञान अर्जित किया, आश्रम संस्कृति प्रकृति के मध्य विकसित हुई और जीवन का प्रत्येक संस्कार पंचतत्वों से जुड़ा रहा। इसलिए सनातन संस्कृति को प्रकृति-विरोधी बताना इतिहास और वास्तविकता दोनों के साथ अन्याय है।

समाज को आज आवश्यकता है संतुलित चिंतन की। यदि कहीं भूल हो रही है तो उसे स्वीकार कर सुधार करना चाहिए, लेकिन सुधार के नाम पर अपनी जड़ों, परंपराओं और सांस्कृतिक चेतना को अपमानित करना उचित नहीं। आलोचना तब तक सार्थक है जब तक वह समाधान और सकारात्मक परिवर्तन की दिशा में हो; किंतु जब आलोचना पूर्वाग्रह, वैचारिक कुंठा और सांस्कृतिक द्वेष से प्रेरित हो जाए, तब वह समाज को दिशा देने के बजाय विभाजन और भ्रम उत्पन्न करती है।

अतः इस घटना को सनातन संस्कृति को दोषी ठहराने का माध्यम बनाने के बजाय इसे जागरूकता और सुधार का अवसर माना जाना चाहिए। भारतीय परंपराओं की आत्मा प्रकृति प्रेम, संवेदना और संतुलन में निहित है। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम उसी मूल भावना को समझें, उसे आधुनिक संदर्भों में और अधिक सजगता के साथ आगे बढ़ाएँ तथा आलोचना और प्रतिक्रिया दोनों में संतुलन बनाए रखें।