Do Patiyo ki Ladli Patni - 52 in Hindi Drama by Sonam Brijwasi books and stories PDF | दो पतियों की लाडली पत्नी - 52

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दो पतियों की लाडली पत्नी - 52

एक महीना कब पलक झपकते बीत गया, किसी को पता ही नहीं चला। कैलेंडर की तारीख़ जैसे ही पलटी, वही दिन सामने आ खड़ा हुआ—जब श्रेया को फिर से करण के पास जाना था। सुबह की हवा में अजीब-सी उदासी घुली हुई थी। घर वैसा ही था, पर रिश्तों में पहले जैसी सरलता नहीं रही थी।

श्रेया (मन ही मन) बोली - 
फिर वही मोड़… फिर वही डर।

कबीर चुप था। बहुत ज़्यादा चुप। वह सवाल करना चाहता था, रोकना चाहता था, पर उसे पता था—यह नियम उसने नहीं बनाया था। उसने बस श्रेया का बैग उठाया और दरवाज़े तक छोड़ आया। उसके क़दम भारी थे, जैसे हर क़दम के साथ कुछ टूटता जा रहा हो।

कबीर (आँखें झुकाए) बोला - 
ख़याल रखना… अपना भी, और… उनका भी।

श्रेया ने कुछ पल उसे देखा। कहना बहुत कुछ चाहती थी, पर शब्द साथ नहीं दे रहे थे। उसने बस सिर हिलाया और बाहर निकल आई। गाड़ी चल पड़ी। पीछे छूटता घर, और आगे… अनजाना डर।

श्रेया(धीमी आवाज़ में) बोली - 
कबीर जी… मैं वापस आऊँगी।

दूसरी ओर, करण अपने कमरे में बैठा था। उसे सब पता था—आज श्रेयाः आएगी। खुशी भी थी, और डर भी। वह खुद से नज़रें नहीं मिला पा रहा था। उसके भीतर अपराधबोध अब भी जिंदा था, हर साँस के साथ चुभता हुआ।

करण (खुद से) बोला - 
क्या मैं उसे फिर से सुरक्षित महसूस करा पाऊँगा?

दरवाज़े पर दस्तक हुई। करण का दिल ज़ोर से धड़का। उसने दरवाज़ा खोला। सामने श्रेया खड़ी थी—वही चेहरा, पर आँखों में कुछ टूटा हुआ।

करण (संयत होकर) बोला - 
आ गई हो?

श्रेया ने हाँ में सिर हिलाया। दोनों के बीच कुछ पल की ख़ामोशी पसर गई। न कोई आगे बढ़ा, न कोई पीछे हटा। यह मिलन नहीं था—यह एक नई शुरुआत की कसौटी थी।

श्रेया बोली - 
करण जी… इस महीने… मुझे वक़्त चाहिए।

करण ने गहरी साँस ली और धीरे से सिर झुका दिया। पहली बार उसने ज़िद नहीं की।

करण बोला - 
मैं इंतज़ार करूँगा… जितना कहो।

श्रेया अंदर चली गई। दरवाज़ा बंद हुआ।
इस बार साथ होना आसान नहीं था—पर शायद ज़रूरी था। क्योंकि कुछ रिश्ते दूरी से नहीं, समझ से बचते हैं।

कमरे में एक अजीब-सी ख़ामोशी थी। श्रेया पलंग के एक कोने पर सिमटी बैठी थी। उसकी आँखें बार-बार करण की ओर उठतीं और फिर डर के मारे झुक जातीं। वह अब भी उसी तरह काँप जाती थी, जैसे कोई पुराना ज़ख़्म अचानक हरा हो गया हो। करण यह सब देख रहा था—और हर बार उसका दिल अपने ही बोझ से और भारी हो जाता।

करण चुपचाप उसके पैरों के पास फर्श पर बैठ गया। सिर झुका हुआ। कंधे ढहते हुए। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि इतनी बड़ी गलती के लिए वह किस मुँह से माफ़ी माँगे। शब्द गले में अटक जाते थे, और आँखें शर्म से भर आती थीं।

करण (धीमी, टूटी आवाज़ में) बोला - 
श्रेया… मैं जानता हूँ… मुझे कुछ भी कहने का हक़ नहीं बचा। पर फिर भी… सुन लो।

श्रेया ने कुछ नहीं कहा। उसकी उँगलियाँ आपस में उलझी हुई थीं। साँसें तेज़ थीं। डर अब भी उसके भीतर बैठा हुआ था।

करण बोला - 
मैंने तुम्हारा भरोसा तोड़ा है। तुम्हारी सहमति… तुम्हारा सुकून… सब। मुझे कोई बहाना नहीं चाहिए, न ही मिलना चाहिए।

वह बोलते-बोलते रुक गया। आँखों से आँसू फिसलकर ज़मीन पर गिर पड़े। उसने सिर और नीचे झुका लिया, जैसे खुद से नज़रें चुरा रहा हो।

करण बोला - 
अगर तुम कहो तो मैं इस कमरे से, इस घर से… तुम्हारी ज़िंदगी से भी दूर चला जाऊँगा। मुझे बस इतना कहना था कि… जो हुआ, वह मेरी गलती थी। पूरी तरह मेरी।

श्रेया की आँखों में नमी आ गई। डर के साथ-साथ एक थकी हुई पीड़ा भी थी। वह उसे देखना चाहती थी, पर देख नहीं पा रही थी।

श्रेया (काँपती आवाज़ में) बोली - 
करण जी… मुझे अभी भी डर लगता है। मैं कोशिश कर रही हूँ… पर आसान नहीं है।

करण ने तुरंत सिर हिलाया, जैसे यही सुनने की उम्मीद थी।

करण बोला - 
मैं समझता हूँ। और अगर समझ नहीं भी पाऊँ, तो भी तुम्हारे डर का सम्मान करूँगा। मैं तुम्हारे पास तभी आऊँगा, जब तुम खुद चाहो। नहीं तो… नहीं।

कमरे में फिर ख़ामोशी छा गई। पर इस बार वह पहले जैसी भारी नहीं थी। उसमें एक ईमानदार स्वीकार था—और एक धीमी-सी उम्मीद कि शायद समय, धैर्य और सच्ची माफ़ी से कुछ ज़ख़्म भर भी सकते हैं।

श्रेया ने गहरी साँस ली। उसने न आगे बढ़ने का वादा किया, न पीछे हटने का। बस इतना तय किया कि इस बार—उसकी सीमा, उसकी शर्तों पर ही सब होगा।

करण अब भी श्रेया के साथ उसी घर में रहता था, पर उनके बीच एक अनकही दूरी थी। वह दूरी दीवारों की नहीं थी, दिलों की थी—जिसे लाँघने से दोनों डरते थे। करण ज़रूरत भर की ही बातें करता, उसकी हर हरकत में सावधानी होती। वह चाहता था कि श्रेया को यह महसूस हो—कि अब उसकी सीमा सुरक्षित है।

दिन बीतते गए।
धीरे-धीरे श्रेया को करण की मौजूदगी की आदत पड़ने लगी। सुबह चाय की हल्की-सी आवाज़, रसोई में बिना बोले रखा गया नाश्ता, देर रात तक जली रहने वाली स्टडी-लैम्प की पीली रोशनी इन सब में कहीं न कहीं करण होता।

श्रेया देखती थी, वह बिना पूछे उसके लिए दवा रख देता, बिना टोकें खिड़की बंद कर देता, और बिना पास आए, बस पास होने का भरोसा दे देता।

श्रेया (मन ही मन) बोली - 
ये वही करण जी है… और फिर भी अलग है।
डर अभी भी है… पर अब हर पल नहीं।

एक शाम श्रेया किताब पढ़ते-पढ़ते सो गई। किताब फर्श पर गिर गई। करण कमरे के दरवाज़े पर आकर रुक गया। अंदर नहीं आया। बस झुककर किताब उठाई, मेज़ पर रख दी और वापस मुड़ गया।

करण (धीमे से, खुद से) बोला - 
इतना ही काफ़ी है… आज के लिए।

उस रात श्रेया की नींद गहरी थी। शायद इसलिए कि पहली बार उसे किसी के पास रहते हुए भी खुद को अकेला और असुरक्षित महसूस नहीं हुआ। अगले दिन श्रेया ने खुद ही करण से बात की।

श्रेया बोली - 
आज… अगर आपको वक़्त हो तो… मेरे साथ थोड़ी देर बैठ जाना।

करण चौंका, पर आँखों में चमक नहीं आई—सिर्फ़ सुकून आया।

करण बोला - 
हाँ… पर जैसे तुम चाहो।

वे दोनों एक ही कमरे में, अलग-अलग कुर्सियों पर बैठे।
बीच में कोई स्पर्श नहीं, कोई दबाव नहीं।
बस बातचीत—धीमी, सच्ची, थकी हुई।

श्रेया बोली - 
मुझे डर लगता है… पर मैं भागना नहीं चाहती।
शायद… आदत पड़ रही है।

करण (सर झुकाकर) बोला - 
आदत नहीं… भरोसा।
और वो भी अगर कभी टूटे, तो मेरी वजह से नहीं टूटेगा।

श्रेया ने पहली बार उसे पूरी तरह देखा।
उसके चेहरे पर पछतावे की गहरी लकीरें थीं,
और आँखों में वह जिद नहीं—जो पहले डर बन जाती थी।

उस दिन के बाद से, श्रेया को करण की आदत पड़ने लगी उसकी खामोशी की, उसकी दूरी की,
और उस बदले हुए इंसान की जो अब पास आकर नहीं, पीछे हटकर प्यार जताता था। और शायद…यहीं से किसी टूटे रिश्ते की धीमी, बहुत धीमी मरम्मत शुरू हुई।