Father and other stories, part -2 in Hindi Short Stories by Anil Kundal books and stories PDF | पिता और अन्य कहानियाँ, भाग-2

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पिता और अन्य कहानियाँ, भाग-2

                      { चिखुरी }

                         - १-

वह नन्हीं सी जान सदैव अपनी माँ के आंचल से इस भांति संलग्न रहा करती मानों सकल भुवन से भयाक्रांत रहती हो। गोल मटोल सी देह और चंचल मन! मैं भी उसे बहुधा ' चिखुरी' कहकर चिढ़ाती और वह भी अविलंब एक मुंहजोर तोते के जैसे उलटे उसी नाम से मुझे भी संबोधित कर अनायास ही अपनी ओर आकृष्ट करने की कोशिश करती। उसका तदनंतर मुक्त कंठ से हंसना मेरे मन के सभी प्रेमद्वार इस प्रकार खोल देता यों कभी मीरा के कृष्णा भक्ति में खुले होंगे। छिन्नतार मैं भी उस अलभ्य सुखसागर में अनगिनत बार अनेकानेक डुबकियां लगाती। 

वो वस्तुतः मेरी कुछ भी नहीं लगती थी और फिर भी उस नन्हीं सी जान ने मेरे हृदय में एक बड़ा सा और शाश्वत स्थान अपने लिए बना लिया था। 

उससे परिचय तब मेरा कुछेक दिनों का ही था और इतने अल्प समय में हम दोनों के बीच में मित्रता की बेल के अंकुर अंकुरित होने प्रारंभ हो गए थे। 

" अंकिता, चलो बेटा, चलें! तेरे पापा जी के आने का समय हो गया है। हमें घर पहुँचते पहुँचते कम से कम एक घंटे से क्या कम समय लगेगा। ऑंटी को गुडबाई कह दो! " उसकी माँ एकाएक बुदबुदाई और उस नन्हीं सी बच्ची के मुंह से कुछ भी निकलने के पूर्व ही वो उसे जबरन घसीटते हुए ले गईं। ऐसा असभ्यपूर्ण व्यवहार संभवतः मैंने प्रथमतः अपने जीवन में देखा और सुना था। 

कुछ विलंब के लिए ही सही मन रोष से भर गया था। तदनंतर मैंने अपने जहाँ तहाँ बेवजह बेमतलब भटकते हुए विचारों को ठिकाने लगाने की पुरज़ोर कोशिश की। पर मन मानने को तत्पर नहीं था। 

इस काम को पकड़, उस काम को पकड़ - बस किसी तरह से मन पर आखिरकार काबू पाने में मैंने साफल्य हासिल कर लिया। और उसके सबब अपने आप से यों ही बुदबुदा कर बोली, " किसी का बच्चा! तुझे क्या? वो मारे पीटे कि प्यार करे! परेशान होने की तुझे क्या पड़ी है? नाहक औरों की जिंदगी में दखलअंदाजी ठीक नहीं, लीलामनी! "

उस वक्त रात ने धीरे धीरे से सिमटते हुई शाम को पूरी तरह से भगा दिया था और हर घर आंगन और गली कूचों और सड़कों पर रौशनी जगमगाने लगी थी। कुछ कुछ घरों में नन्हें नन्हें टिमटिमाते बल्ब बड़े ही भले मालूम होते थें। 

कुछ ही समय के व्यतीत होने के साथ ही मेरे पति के घर वापसी का समय होने को था। मैंने बड़े कमरे की बड़ी सी खिड़की खोलकर थोड़ी ग्रीवा बाहर की ओर बढ़ाने के साथ ही ऊपर आकाश की तरफ देखा। अनगिनत तारकों के मध्य चांद दिखाई दिया। मैंने भी नज़र भरकर चांद को देखा और शायद चांद ने भी मेरी तरफ नज़र भरकर देखा और उसकी नज़र अपने गौरवर्ण सुकुमार मुख पर पड़ते ही मैंने शरमा कर अपनी नज़रों को नीचे की तरफ झुका लीं थीं। 

बहुधा चांदनी रातों में जब तब मैं सुदूर ऊपर आकाश में अनिंद्य सुकुमार चंद्र को निहारने में पूर्णतः निरत होतीं, तो सहसा मेरे पति ना जाने कैसे आ धमकते और अनायास ही कह उठते, " देख ले चांद! ये आदत ठीक नहीं है। अच्छे से सुधार लो। यूँ बेशर्मो की तरह औरों की बीबियाँ ताड़ना तुम्हें शोभा नहीं देता। हूँ, ये लास्ट वार्निंग है। "

और जब फिर एकाएक चांद काले काले बादलों के पीछे छिप जाता, तो वो वो भी सुअवसर हाथ से जाने नहीं देते थे और ठहाके की हंसी हंसने के साथ ही बोलते, " लगता है इसकी समझ में अच्छे से आ गया है कि दूसरों की जोरूओं को छेड़ने वाला व्यक्ति एक दिन अच्छे से पिटता है। अब ये तुम्हें कभी छेड़छाड़ करने की हिमाक़त नहीं करेगा। "

तिसपर मैं इतना हंसती कि हंसते हंसते मेरे पेट में दर्द होने लगता। 

                               - २-

वक्त ने अपने पांवों में मानों हवाओं में ऊंचे उड़ते परिंदों के जैसे पंख लगा लिए थें। यकायक आठ वर्ष यूँ बीत गए  जैसे कि वो सब कुछ कल की ही बात हो। 

मेरे घर भी एक नन्हीं सी परी ने जन्म लिया था और कुछ एक महीनों के बाद वो भी रेंगने सरकने के साथ साथ कब चलने लगी थी मुझे भी अच्छे से ज्ञात नहीं रह सका था। 

अंकिता अक्सर अपनी माँ के साथ आया करती थी और जब भी उसे मौका मिलता , चुपचाप मेरे जहाँ खिसक आती थी। वो भी मेरी नन्हीं सी परी को ' चिखुरी ' कहकर चिढ़ाती। और मैं गुस्सा होने की जगह मारे खुशी के उसे भी अपने अंक से लगा लिया करती थी। 

बेटियां ताड़ के पेड़ सी कब बड़ी हो जाती हैं, कुछ पता ही नहीं चलता। 

और इक खास लंबे से वक्त के व्यतीत हो जाने के साथ ही मेरी नन्हीं सी परी भी स्कूल जाने लगी थी। 

अंकिता अब धीरे धीरे कम आने लगी थी और मैं भी अपने घर बाहर के कामों में व्यस्त रहने के सबब उसे भूलती सी जा रही थी। 

और उस आखिरी दिन जब वह आई, तो हम सभी किसी पार्टी में जाने की तैयारी में जुटे हुए थे। स्वभाविक तौर पर मैंने अनायास ही कह डाला कि बेटी हम जल्दी में फिर कभी आना। जरूर वह बुरा मानी होगी। पर वह सब कुछ सोचने विचारने के लिए मेरे पास वक्त ही कहाँ था। 

उस दिन वो नाराज हो कर चली तो गई थी। लेकिन अपने पीछे एक दमघोंटू उदासी छोड़ गई थी। 

मैं कुछ देर परेशान सी हो गई थी। लेकिन पति और अपनी बिटिया के सुख में सब कुछ भूल गई थी। 

कुछ देर बाद हम पार्टी के लिए रवाना हो गए थे। 

और जब हम पुनः घर वापिस आए, तो ना जाने क्यों उसका वो उदास सा चेहरा मेरी आँखों के सामने तिरने लगा। मै बेचैन हो उठी। 

                               - ३-

उस दिन के बाद चिखुरी फिर कभी नहीं आई। कभी कभार उसकी यादें मेरे दिल को ना जाने क्यों कचोटती! 

बारिश के दिन शुरू हो गए थे और हर जगह आसमान से बरसता पानी छोटे छोटे नाले नालियों को लबालब भर देता। 

मैंने अपने छाते को फिर से खोला और बारिश में ही भीगती हुई बाहर बाजार करने निकल आई थी। बहुत से जरूरी समान खरीदने जो थे। 

बाजार करते ही मैं तेज़ तर्रार कदम उठाने के साथ ही अपने घर की तरफ आ ही रही थी कि रास्ते में मुझे वो ही पड़ोसन मिल गई, जिसके घर चिखुरी आया करती थी। 

बातों की बातों में वो बोल उठी, " बहन, तुझे क्या बताऊँ कि जमाना कितना बुरा आ गया है? " 

" क्यों मालती शर्मा, ऐसा भी क्या हो गया है कि आप इतनी परेशान हो उठीं हैं? " मैं कहे बिना नहीं रह सकी। हमारे बीच अक्सर ऐसी ऐसी बातें हुआ करतीं थीं कि मुझे और उसे भी ऐसा जरूर लगता होगा कि पिछले जन्म में हम दोनों सगी बहने रहीं होंगी। 

" तुझे अच्छे से याद होगा! " उसने खामखां अपने छोटे से दिमाग़ पर पूरा जोर देकर कहा था। 

" क्या? " विस्मय से मेरा मुंह खुला का खुला ही रह गया। 

" यही कि हमारे घर में हमारे एक रिश्तेदार आया करतीं थीं पारुल कौशिक? "

" हाँ, हाँ! वही ना, जिसकी लड़की, अंकिता, भी उनके साथ आया करती थी? '

" हाँ, वही वही! "

" हाँ, तो? "

" पति पत्नी दोनों कार एक्सीडेंट में मारे गए, बेचारे! "

" तत् तत् तत्! बड़ा बुरा हुआ। "

" और पीछे रह गई वो मनहूस अकेली! "

" कौन? "

" अंकिता और कौन? "

" बहनजी, आप ऐसा क्यों कहतीं हैं। उसमें उस बेचारी का क्या दोष? "

" बेचारी? उसने सारी बिरादरी में हमारी नाक कटा दी है। "

" वो कैसे? ऐसा क्या कर दिया उसने, बेचारी ने? "

" वो अभी पिछले बरस बमुश्किल अठारह की हुई होगी, एक शराबी कबाबी दुहाजु, जिसकी उम्र पैंतालीस से ऊपर रही होगी। उसके साथ भागकर विवाह कर लिया उसने उस कलमुँहे के साथ। "

" अच्छा! बहन चलती हूँ। मुझे कोई जरूरी काम याद आ गया। "

" अच्छा, ठीक है, बहन! मिलती रहना! "

" जरूर! "

                            - ४-

मैं एक विक्षिप्ता की तरह वहाँ से झटपट निकल पड़ी। मेरे हाथ से छतरी छूट गई और कुछ एक बड़े बड़े कदम उठाने के साथ ही सारा समान भी ना जाने मैं कहाँ गिरा बैठी थी। 

मेरी आँखों के सामने कभी अपनी परी और कभी उस नन्हीं सी जान, अंकिता, के चेहरे घूमने लगें। बारिश के पानी से मेरी सारी काया सराबोर हो चुकी थी। 

मैं बिना रुके बस चली जा रही थी। 

बारिश कुछ देर बाद पूरी तरह से थम गई थी। 

पर मेरी आँखों की बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी।