अगली सुबह सूरज की पहली किरण निकलते ही आर्यन ने माधव और गाँव के कुछ हिम्मत वाले युवाओं को एक पेड़ के नीचे इकट्ठा किया। गाँव वाले आर्यन के अजीब कपड़ों और बैग को देखकर अब भी कानाफूसी कर रहे थे। आर्यन ने सूखी ज़मीन पर एक टहनी से नक्शा खींचते हुए कहा, "सुनो दोस्तों, हमारे पास वक्त बहुत कम है। हमें नदी से लेकर गाँव के खेतों तक बाँस के खोखले तनों को आपस में जोड़कर एक लंबी, ढलानदार नाली (चैनल) तैयार करनी होगी। पानी को नदी से ऊपर खींचने का इंतज़ाम मैं करूँगा।"गाँव के लोग पहले तो उसकी बात सुनकर झिझके और हंसने लगे। एक बूढ़े बुजुर्ग ने अपनी लाठी टेकते हुए कहा, "अरे लड़के, जब हमारे हट्टे-कट्टे बैल और इंसानों की मेहनत हार गई, तो तू इस सूखी लकड़ी और अपने बैग के खिलौनों से नदी का पानी यहाँ कैसे लाएगा? क्यों हमारा वक्त बर्बाद कर रहा है?"लेकिन माधव तुरंत आगे आया और उसने गाँव वालों के सामने हाथ जोड़कर कहा, "काका, वैसे भी कल शाम को ठाकुर हमसे हमारी ज़मीनें छीनने वाला है। हमारे पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा है। इस अजनबी दोस्त की आँखों में मुझे भरोसा दिखता है। एक बार इसकी बात मानकर कोशिश करने में क्या हर्ज है?" माधव की बात सुनकर गाँव वालों में थोड़ी हिम्मत जागी और पूरा गाँव काम में जुट गया। दोपहर होते-होते पुरुषों ने सैकड़ों बाँसों को काटकर उन्हें बीच से खोखला किया और नदी से खेतों तक की एक लंबी पाइपलाइन खड़ी कर दी।अब असली परीक्षा आर्यन की थी। दोपहर के बारह बज रहे थे और सूरज की गर्मी अपने चरम पर थी। आर्यन ने अपने बैग से सिलिकॉन के चमकीले और मोड़ने वाले सोलर पैनल निकाले। उसने उन्हें धूप की सीधी रोशनी में एक ऊँचे पत्थर पर सेट कर दिया। फिर उसने अपने बैग से निकाली हुई छोटी लेकिन बेहद शक्तिशाली डीसी मोटर को उन पैनल्स के तारों से जोड़ा। यह वही मोटर थी जिसे उसने कबाड़ के प्लास्टिक और पंखों को मॉडिफाई करके बनाया था। उसने मोटर के इनटेक पाइप को नदी के गहरे पानी में डाल दिया।गाँव के लोग दूर खड़े होकर यह सब देख रहे थे। तभी ठाकुर भवानी सिंह भी अपने दो लठैतों के साथ अपनी सफेद घोड़ी पर सवार होकर यह 'तमाशा' देखने वहाँ पहुँच गया। ठाकुर ने आर्यन के इस तामझाम को देखा और ठहाका मारकर हँसा, "क्यों रे अजनबी लड़के! सुना है तू खेतों में पानी ला रहा है? अगर तेरे इस काले शीशे (सोलर पैनल) से खेतों तक पानी पहुँच गया, तो मैं इस पूरे गाँव का इस साल का ही नहीं, बल्कि अगले तीन साल का लगान माफ़ कर दूँगा! और अगर नहीं हुआ, तो आज रात ही सब बोरिया-बिस्तर बांध लेना!"आर्यन ने ठाकुर की बात का कोई जवाब नहीं दिया। उसने गहरी सांस ली, भगवान का नाम लिया और सर्किट का स्विच ऑन कर दिया। स्विच ऑन होते ही उस छोटी सी मोटर के भीतर एक हल्की सी थरथराहट हुई। पहले पाँच-दस सेकेंड तक कुछ नहीं हुआ। चारों तरफ सन्नाटा छा गया। ठाकुर दोबारा ज़ोर से हँसा, "देखा, मैंने कहा था न, यह कोई मदारी है जो तुम्हें बेवकूफ बना रहा है!"लेकिन ठाकुर के शब्द अभी पूरे भी नहीं हुए थे कि तभी बाँस के पाइपों के भीतर से एक ज़ोरदार गड़गड़ाहट की आवाज़ सुनाई दी। और अगले ही पल, ठंडे और साफ़ पानी की एक बहुत मोटी और तेज़ धार पूरे प्रेशर के साथ बाँस की नाली से होती हुई खेतों की तरफ दौड़ पड़ी। पानी इतनी तेज़ी से आया कि सूखे खेत पल भर में भीगने लगे।"पानी आ गया! पानी आ गया! जादू हो गया!" पूरा गाँव खुशी से पागल हो उठा। औरतें खुशी के मारे रोने लगीं और ठाकुर के पैरों में गिरने की बजाय पानी को चूमने लगीं। बच्चों ने खेतों में जाकर छपाक-छपाक करना शुरू कर दिया। माधव ने दौड़कर आर्यन को गले लगा लिया और उसे हवा में उठा लिया। ठाकुर भवानी सिंह का चेहरा डर और अचरज से पीला पड़ गया था। अपनी हार साफ देखकर वह बिना एक शब्द बोले चुपचाप अपनी घोड़ी मोड़कर वहाँ से दुम दबाकर भाग गया।उसी शाम, पूरे गाँव को नया जीवन मिल चुका था। हर घर के बाहर मिट्टी के दीये जलाकर जश्न मनाया जा रहा था। लोग आर्यन को अपने कंधों पर उठाकर नाच रहे थे। लेकिन इसी जश्न के बीच, अचानक आर्यन की कलाई पर बंधी वह रहस्यमयी घड़ी ज़ोर-ज़ोर से कांपने लगी। उसका वह लाल पत्थर अब ख़तरे के सिग्नल की तरह तेज़ लाल और पीली रोशनी छोड़ने लगा था। घड़ी के चक्र उल्टी दिशा में घूमने लगे थे। आर्यन का वैज्ञानिक दिमाग समझ गया कि अतीत में उसका समय अब समाप्त हो चुका था और अगर वह अभी नहीं गया, तो शायद कभी वापस अपने परिवार के पास नहीं लौट पाएगा।उसने भीड़ से बचकर अंधेरे में माधव को एक तरफ बुलाया और भारी मन से उसका हाथ पकड़ा, "माधव, मेरा समय पूरा हो गया है। मुझे अब अपने घर वापस जाना होगा। इस तकनीक को और इन बाँस के पाइपों को संभाल कर रखना। यह कोई जादू नहीं है, यह सूरज की शक्ति है जिसे विज्ञान कहते हैं।"माधव की आँखों से आँसू बहने लगे, उसने आर्यन के पैर छूने की कोशिश की, "तुम कौन हो भाई? क्या तुम हमारे गाँव को बचाने के लिए भगवान के भेजे कोई फरिश्ते या सूर्य-पुत्र हो?"आर्यन ने मुस्कुराकर उसे उठाया, "नहीं माधव, मैं बस तुम्हारा एक दोस्त हूँ।" यह कहते ही उसने घड़ी का मुख्य बटन दबा दिया। एक बहुत तेज़ सफ़ेद रोशनी चमकी, और गाँव वालों की आँखों के सामने ही आर्यन हवा में विलीन हो गया।जब आर्यन की आँखें दोबारा खुलीं, तो वह अपने समय के उसी धूल भरे, पुराने कबाड़खाने की ज़मीन पर लेटा हुआ था। धूप वैसी ही थी, पर वह रहस्यमयी घड़ी उसकी कलाई से पूरी तरह गायब हो चुकी थी। आर्यन पागलों की तरह दौड़ता हुआ अपने घर पहुँचा। उसके दादाजी आँगन में आरामकुर्सी पर बैठकर अखबार पढ़ रहे थे। आर्यन ने हांफते हुए पूछा, "दादू! दादू! हमारे गाँव का इतिहास क्या है? क्या यहाँ सौ साल पहले कभी कोई भयंकर सूखा पड़ा था?"दादाजी ने अपना चश्मा नाक पर ठीक करते हुए अचरज से देखा और कहा, "हाँ बेटा, हमारे परदादा बताते थे कि आज से ठीक सौ साल पहले, सन् 1926 में यहाँ ऐसा भयंकर सूखा पड़ा था कि पूरा गाँव बर्बाद होने वाला था। तब अचानक कहीं से एक अजीब, चमकीले कपड़ों वाला लड़का आया था। उसके पास कोई दैवीय शक्ति थी, जिससे उसने बिना बिजली और बिना बैल के, सिर्फ कड़कती धूप की मदद से नदी का पानी पहाड़ों से खींचकर खेतों में पहुँचा दिया था। गाँव वाले उसे 'सूर्य-पुत्र' कहते थे। देख, हमारे गाँव की पुरानी चौपाल पर आज भी उस सूर्य-पुत्र की याद में एक पत्थर लगा है।"आर्यन बिना कुछ सोचे तुरंत दौड़कर गाँव की पुरानी चौपाल पर पहुँचा। वहाँ बरसों पुराना एक काला पत्थर लगा था, जिसे उसने बचपन से देखा था पर कभी ध्यान नहीं दिया था। जब उसने उस पर जमी काई को साफ़ किया, तो उसकी आँखें खुली की खुली रह गईं। उस पत्थर पर एक आकृति खुदी हुई थी—एक लड़का जिसके पीठ पर स्कूल बैग था, पैर में स्पोर्ट्स शूज़ थे और हाथ में एक छोटा सा बॉक्स था। आर्यन के चेहरे पर एक गहरी और सुकून भरी मुस्कान तैर गई। वह समझ गया था कि इतिहास को बदलने वाला वह खुद था, और विज्ञान का असली चमत्कार किसी बंद लैब में नहीं, बल्कि किसी भूखे और लाचार के चेहरे पर मुस्कान लाने में है।भाग 3: सूरज का जादू और इतिहास के पन्नों में अमर नाम