- एक -
मैंने उस गली का फिर से एक और चक्कर लगाया। मुझे कल रात के जैसे कोई भ्रम हुआ था। वो बात संभवतः संभव नहीं हो सकती थी। फिर भी लाख बार चाहने पर भी दिल नहीं मानने को तत्पर नहीं हो रहा था। अतः उस भ्रम को दूर करने के मकसद से मैं फिर से उस गली में उतर आया था।
उस गली में एकदम घटाटोप अंधियारा था और सन्नाटा भी ऐसा कसैला सा था कि रूह तक को भी डरावने ख्वाबों से डराता। सीटी सोटा बजाते हुए मैं उस गली के अंत्य कोर तक चला गया था कि फिर से एकाएक मुझे उसी भ्रम के मायाजाल ने हाथों हाथ जकड़ लिया।
मेरे भीतर एक अजीबोगरीब सी हरकत हुई और मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि वो भयंकर डर मुझे पूरी तरह से निगल लेगा।
लेकिन ऐसा वैसा कुछ हुआ नहीं।
ना जाने कैसे उस विपरीत घड़ी में भी मैं अपने हृद़य को कठेठ कर सकने में साफल्य पा गया। फिर से सीटी मैंने अपने कंपकंपाते हुए होंठों से लगाई और पुरज़ोर सीटी बजाते हुए और लट्ठ बारम्बार धरित्री पर पटकते पटकते मैं उस गली की हद की सीमा लांघ गया और अब मैं फिर से सामने वाली गली के प्रारंभ में प्रवेश करके उस गली के आसपास लगे खंभों के समीप पहुँच गया, जहाँ पर उज्जवल रौशनी अंधेरे को अपने आप से कोसों दूर भगाए हुए थी।
वहाँ से कुछ ही दूर लंबे लंबे डगों को भरते ही कईं बरगद के घने छतनारे पेड़ दिखाई देते। और यह बात भी पूरी तरह से तैय थी कि उस ओर अनायास ही नज़र के जाते ही दिल डर से लबालब सराबोर हो जाता।
उस तरफ देखते ही एकबारगी तो मेरे दिल में यह ख्याल जरूर आया कि इस मौहल्ले में इन घने बरगद के पेड़ों का क्या काम?
- दो -
रात अपने पूरे यौवन पर थी। कुछ एक घंटे व्यतीत होने पर ही रात्रि की समाप्ति होना असंभव ही था। ऐसे वक्त में वक्त भी कच्छप की चाल चलने लगता है।
मैं सीटी और सोटा बजाते हुए उस गली में थोड़ा सा और आगे की तरफ उतर चुका था। और उस गली के भी अंतिम छोर पर घनेरे अंधेरे और संकुलित सन्नाटे के अतिरिक्त कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। एकबारगी तो कुछ दिनों पहले के एक दिन के जैसे ही मन बना बैठा कि उस गली के अंतिम छोर से भी आगे बढ़ने के साथ ही अगली गली में भी एक गश्त और पूरी करना है।
और फिर से उसी रात के जैसे वहाँ पहुँच कर देखा जाता कि वहाँ क्या क्या है। और क्या कुछ नहीं है। मैं धीरे धीरे पग आगे बढ़ाता हुआ आगे बढ़ा जा रहा था कि अचानक से ही मुझे फिर से पहले के जैसा अजीबोगरीब भ्रम हुआ। लगा कि जैसे मानों कोई दबे कदम धीरे धीरे कदम उठाने के साथ ही मेरे पीछे पीछे चला आता है। मैंने अपनी ग्रीवा किसी तरह से तत्क्षण मोड़कर देखा, तो मेरे पीछे पीछे कोई भी नहीं चला आता है। फिर वही बुरा सा भ्रम! लगा कि व्यर्थ ही मति मारी जाती है। यह सब कुछ कोरी कल्पना के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। इंसान इंसान को डराने के वास्ते डरावनी बातें और अजीबोगरीब भ्रम पैदा करने वाली कहानियों को गढ़ने में अपनी निपुणता को चरितार्थ करने का प्रयत्न करता रहता है। और कुछ भी नहीं!
और फिर से मैं उस पथ पर अग्रसित हो गया।
बमुश्किल से पांच दस कदम ही चला था कि मुझे ऐसा लगा कि जैसे कि मेरी दाहिनी ओर से मुझसे कुछ ही दूरी पर से मेरे करीब कोई भूला भटका इंसान चला आता है ।
उसे अपनी ओर आता देखकर मेरी रही सही जान में जैसे फिर जान आई थी। मारे खुशी के मेरी दोनों बांछें खिल उठीं।
और सच कहूँ तो मुझे क्या मालूम था कि वो आदमी इतना खुशदिल इंसान निकलेगा। मेरे नजदीक आते ही वो हंसते हुए बोला, " भाई साहब, आपके करीब आते ही मानों मेरा भय जाता रहा। उसके पूर्व मारे डर से मेरे प्राण सूखे जाते थे और अब मानों फिर से वही पुरानी चेतना वापिस लौटी हो। "
" आपने मेरे मन की बात छीन ली, भाई जी! कुछ देर पूर्व जहाँ भी हाल कोई बेहतर नहीं था। " मैंने भी उसकी हां में हां मिलाई और एक जोरदार ठहाके की हंसी हंसा।
और कुछ विलंब कुछ यूँ ही हंसी ठट्टा करने के उपरांत हम दोनों ही उसी गली के अंतिम सिरे की तरफ बढ़ गए।
कुछ दूर पहुँचते ही वो आदमी फिर से बोला, " ये जो सामने दूर तक फैली हुई जगह आप देख रहे हो ना? इस जगह कभी किसी ज़माने में एक बहुत बड़ा विधालय हुआ करता था। कईं हज़ार बच्चे इस विधालय में पढ़ते थे। एक बहुत बड़ा जमाना बीत गया है उस्ताद, कभी इसी विधालय में मैं भी एक छात्र हुआ करता था। पढ़ाई लिखाई में एक सामान्य विधार्थी था मैं। ना बहुत ही होशियार और ना ही बहुत नालायक। "
" अच्छा। बड़ी खुशी हुई सुनकर। भाई जी, और भी बातें जानने को इच्छुक हूँ मैं। बड़ा रस मिल रहा है आपकी रसभरी बातों से। सब जगहों की जानकारी चाहिए मुझे। " मैं और भी बहुत कुछ सुनने को लालायित हो उठा था।
हम दोनों उस गली के अंतिम कोर से भी काफी आगे निकल आए थे। इतना आगे कि उसके पूर्व कभी वहाँ तक जाना तो दूर की बात थी। मैंने तो वहाँ पर कभी जाने की बात भी कभी सोची समझी भी नहीं थी।
अब हम दोनों उस जगह पर पहुँच चुके थे जहाँ की जमीन काफी उठी हुई लगती थी मानों कोई छोटी छोटी पहाड़ियाँ हों।
उसने हठात अपने हाथ की एक उंगली से उस ओर संकेत करते हुए कहा, " वह जो दूर तक फैली हुई जो जगह आप देखते हो कभी वहाँ पर एक मदिरालय हुआ करता था और अब वो स्थान एक खंडहर की सी ऊंची नीची गरम सांसों की भूली बिसरी कहानी सुनाता है। "
" अच्छा? अच्छा अच्छा! " मैंने अनुमोदन करने के साथ ही हामी भरी।
और फिर हम और भी बहुत सी जगहों पर गए और अंततः घूम फिर कर जब हम उन्हीं बरगद के पेड़ों वाली जगह पर पहुँच गए, तो मैं पूर्णतः आश्चर्य चकित रह गया और अनायास ही बोल पड़ा, " ये हम फिर से जहाँ कैसे पहुँच गए? "
तिसपर वो कुछ बोला नहीं और कुछ विलंब चुप्पी साधे रहा।
और जब वो उन्हीं बरगद के पेड़ों की तरफ जाने लगा, तो मैंने उसे फिर से टोका, " ये किस ओर चले जाते हो, आप? उस जगह उन दस बारह भयावह बरगद के पेड़ों के अतिरिक्त कुछ भी तो नहीं है। फिर उस ओर तुम्हें लेने क्या जाना है? "
" वहीं तो मेरा घर है। " वह अजीबोगरीब हंसी हंसने के बाद बोला।
" वहाँ कहाँ? "
" बरगद के पेड़ों पर। "
" क्या? "
" भाई, इतना हैरान परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है। मैं भूत हूँ और वो बरगद के पेड़ मेरा बसेरा। "
" क्या? "
उसकी बात सुनते ही मेरे हाथ पांव फूलने लगें और मुझे ऐसा लगा जैसे कि मारे डर के मेरी सांसों की डोरी तन गई है।
" और तुम जिन लोगों के लिए चौकीदारी करते हो, वो कोई जिंदा इंसान थोड़ी ही हैं। उन सभी को मरे एक जमाना हो गया है। "
" क्या - क्या - क्या! " कहते ही मैंने एक दीर्घ सी चीत्कार भरी और मेरे दोनों हाथों से सीटी और डंडा, दोनों ही, जमीन पर आन गिरे।