जैसे-जैसे हम उस वीरान और भुतहा गांव 'काला खोह' के अंदर बढ़ रहे थे, रूह कंपा देने वाली ठंडक बढ़ने लगी थी। जून के महीने में भी हमारी सांसों से गर्म भाप निकल रही थी। गांव के सारे मकान खंडहर हो चुके थे, दीवारें टूटी हुई थीं और ऐसा लग रहा था जैसे कोई बड़ी तबाही इस जगह को निगल चुकी हो। हवा में एक अजीब सी भारीपन थी। अचानक नितिन बीच रास्ते में ही ठिठक कर रुक गया। उसके हाथ में पकड़ी टॉर्च कांप रही थी। उसने कांपती हुई उंगली से सामने की तरफ इशारा किया।लगभग पचास मीटर की दूरी पर गांव के चौक के बीचों-बीच एक बहुत बड़ा, पुराना काले पत्थरों से बना कुआँ था। उस कुएं के चारों तरफ लोहे की मोटी-मोटी भारी जंजीरें बंधी हुई थीं, जिन पर सदियों पुराना जंग लग चुका था। उन जंजीरों को देखकर ऐसा लग रहा था मानो किसी को अंदर कैद करके रखने के लिए उन्हें वहां लपेटा गया हो। हम सब दबे पांव, अपनी सांसें रोके उस कुएं के बिल्कुल पास पहुंचे।मैंने अपनी टॉर्च की तेज़ रोशनी कुएं के अंदर डाली, लेकिन वह रोशनी उस घने काले अंधेरे को भेद नहीं पाई। कुएं की गहराई का कोई अंत नहीं लग रहा था। नीचे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, बस एक अजीब सी गड़गड़ाहट की आवाज आ रही थी, जैसे कुएं के गहरे पेट में बहुत सारा पानी उबल रहा हो। अंजलि अचानक रोने लगी और रोहित का हाथ पकड़कर बोली, "प्लीज यार, यहां से चलो। मुझे बहुत अजीब लग रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे कोई मेरे बिल्कुल पीछे खड़ा होकर मेरी गर्दन पर ठंडी सांसें छोड़ रहा है।" मैंने अंजलि को चुप कराने के लिए उसके कंधे पर हाथ रखा, लेकिन तभी कुएं के अंदर से एक आवाज गूंजी।वह आवाज कोई डरावनी चीख नहीं थी, बल्कि एक बहुत ही सुरीली और जानी-पहचानी आवाज थी। वह आवाज बिल्कुल मेरी मां जैसी थी, जो मुझे पुकार रही थी—"बेटा... बहुत रात हो गई है, नीचे आओ... मुझे बहुत प्यास लगी है..." यह सुनते ही मेरे रोंगटे खड़े हो गए और पैरों तले जमीन खिसक गई। मेरी मां तो शहर में अपने घर पर चैन से सो रही थीं, फिर उनकी आवाज यहाँ कुएं के सड़ते हुए पानी से कैसे आ सकती थी? मैं अभी इस सदमे से संभल भी नहीं पाया था कि मैंने देखा कि रोहित की आंखें पूरी तरह से सफेद हो चुकी थीं। उसकी पुतलियां गायब थीं।वह किसी रोबोट की तरह सम्मोहित होकर कुएं की तरफ बढ़ने लगा। उसने कुएं पर बंधी लोहे की भारी जंजीरों को पकड़ लिया और उसके ऊपर चढ़कर अंदर कूदने की कोशिश करने लगा। उसका चेहरा पूरी तरह सपाट था, जैसे उस पर उसका खुद का कोई कंट्रोल न हो। नितिन और मैंने अपनी पूरी ताकत लगाकर रोहित के पैरों को पीछे की तरफ खींचा। वह पागलों की तरह छटपटा रहा था और कुएं के अंदर जाने की जिद कर रहा था। जैसे ही हमने उसे ज़ोर से झटका देकर जमीन पर गिराया, उसकी आंखों का सम्मोहन टूटा। वह बुरी तरह हांफ रहा था और उसका पूरा शरीर पसीने से भीग चुका था। वह कांपते हुए बोला, "यार... अंदर कोई बहुत भयानक चीज है... वह मेरी आत्मा को अपनी तरफ खींच रही थी!"तभी अचानक कुएं के अंदर बंधी जंजीरें ज़ोर-ज़ोर से खड़कने लगीं। ऐसा लगा जैसे नीचे से कोई उन जंजीरों को पकड़कर ऊपर खींच रहा हो। और फिर, उस अंधेरे कुएं में से एक भयानक, गूंजती हुई चीख निकली। वह चीख इतनी तेज और डरावनी थी कि हमारे कानों के पर्दे फटने लगे और कानों से खून की बूंदें टपकने लगीं। ऐसा लगा जैसे पूरी जमीन अभी फट जाएगी। और तभी, उस अंधेरे कुएं के मुहाने पर दो सफेद, लंबे और पूरी तरह से सड़े हुए हाथ ऊपर की तरफ आने लगे, जिनके नाखून काले और बेहद नुकीले थे।