Mahabharat Bhitar ka Yuddh - 1 in Hindi Spiritual Stories by prem chand hembram books and stories PDF | महाभारत भीतर का युद्ध ( तत्व मीमांसा) भाग 1

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महाभारत भीतर का युद्ध ( तत्व मीमांसा) भाग 1

महाभारत भीतर का युद्ध (तत्व मीमांसा) — भाग : ०१ 🌿
मनुष्य सदियों से भगवान को खोज रहा है।
कभी मंदिरों में,
कभी तीर्थों में,
कभी मूर्तियों में,
कभी ग्रंथों में।
पर शायद सबसे कठिन खोज अपने भीतर उतरकर करना है।
मैंने Mahabharata पूरी नहीं पढ़ी।
न ही मुझे शास्त्रों का बड़ा ज्ञान है।
कभी अवसर नहीं मिला।
और सच कहूँ तो इस बात का मलाल भी कभी-कभी मन में उठता है।
परंतु जितना थोड़ा-बहुत सुन पाया, समझ पाया,
उसी में कई बार ऐसा लगा मानो कोई साधारण मनुष्य नहीं,
स्वयं चेतना बोल रही हो।
Bhagavad Gita में श्रीकृष्ण अर्जुन को केवल सुख-दुःख का ज्ञान नहीं देते।
वे उसे जीवंत अनुभव में उतार देते हैं।
पहले अर्जुन को टूटने देते हैं।
उसे उसके मोह, भय, करुणा और भ्रम के सामने खड़ा कर देते हैं।
फिर धीरे-धीरे उसकी दृष्टि बदलते हैं।
वे कहते हैं—
“हे अर्जुन,
मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म हो चुके हैं।
उन्हें मैं जानता हूँ, तुम नहीं जानते।”
यह वाक्य केवल पुनर्जन्म की बात नहीं है।
यह चेतना की अवस्था का संकेत है।
मनुष्य जन्म-जन्मांतर के अनुभव लेकर चलता है,
पर शरीर, मन और मोह के कारण सब भूल जाता है।
उसकी स्मृति बिखर जाती है।
पर कृष्ण कहते हैं—
“मैं विस्मृत नहीं हूँ।”
जब चेतना पूर्ण जाग्रत होती है,
तब समय भी उसके ऊपर पर्दा नहीं डाल पाता।
“स्मृति वाहनी श्री युक्त जीवन”
पाने के लिए युग-युग में आए पुरुषोत्तम की शरण से वैसा जीवन सम्भव है,
अन्यथा मनुष्य नए शरीर के साथ पुरानी स्मृतियों को भूल जाता है।
फिर वे अर्जुन से कहते हैं—
“आत्मा न जन्म लेती है,
न मरती है।”
उसे न अग्नि जला सकती है,
न जल भिगो सकता है,
न वायु सुखा सकती है।
वह प्रत्येक जीव में समान रूप से विद्यमान है।
यदि ऐसा है,
तो फिर ईश्वर केवल मंदिर में कैसे हो सकता है?
वह तो प्रत्येक प्राणी में है।
गरीब में भी,
अमीर में भी,
रोगी में भी,
मजदूर में भी,
रोते हुए बच्चे में भी।
शायद इसी कारण सच्चे संत और महापुरुष
हर जीव में उसी का अंश देखने की बात करते हैं।
हमने कई मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च और तीर्थ बनाए।
पर क्या हम अपने धर्म के पथ पर चले?
यदि प्रत्येक जीव में प्रभु का अंश है,
तो पशु बलि क्यों?
मांस, मछली, मुर्गे-मुर्गियों की हत्या क्यों?
क्या उनमें भगवान विद्यमान नहीं हैं?
मुझे कभी-कभी लगता है—
गाय, बकरी, बैल इत्यादि जानवर कहीं हमसे श्रेष्ठ तो नहीं?
वे अपने धर्म पर अधिक स्थिर हैं।
गाय घास खाती है,
बकरी घास खाती है।
वह भूख से मर जाएगी,
पर सामने रखे मांस को छुएगी तक नहीं।
बाघ, भालू, चीते, सिंह भूख से मर जाएंगे,
पर घास नहीं खाएंगे।
परंतु मनुष्य शाकाहारी है या मांसाहारी—
मुझे आज तक समझ में नहीं आया।
प्रत्येक आत्मा स्वतंत्र है,
पर वह परमात्मा से अलग नहीं।
जैसे समुद्र की लहर समुद्र से अलग दिखती तो है,
पर वास्तव में होती उसी का भाग है।
शायद इसी कारण कृष्ण बार-बार मोह छोड़ने को कहते हैं।
वे यह नहीं कहते कि प्रेम मत करो।
वे कहते हैं—
अज्ञान और आसक्ति में डूब मत जाओ।
शायद Mahabharata केवल कुरुक्षेत्र में नहीं हुआ था।
वह आज भी प्रत्येक मनुष्य के भीतर चल रहा है।
कहीं अर्जुन का मोह है,
कहीं दुर्योधन का अहंकार,
कहीं शकुनि की कुटिलता,
कहीं भीष्म की मौन विवशता,
और कहीं कर्ण का पीड़ित स्वाभिमान।
मनुष्य के भीतर प्रतिदिन धर्म और अधर्म का युद्ध चलता है।
और शायद कृष्ण उसी भीतर खड़े होकर पुकारते हैं—
“उठो, जागो, और अपने सत्य को पहचानो।”
फिर वे कहते हैं—
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥”
जब-जब धर्म गिरता है,
जब मनुष्य सत्य से दूर जाता है,
जब अन्याय बढ़ता है,
तब वह किसी न किसी रूप में प्रकट होता है।
पर यदि भगवान बार-बार अवतार लेते हैं,
तो क्या वर्तमान में पाप और पापियों की संख्या कम है?
नहीं।
आज भी घर-घर में रावण है,
घर-घर में दुर्योधन है।
बात कड़वी अवश्य है,
पर शायद यही सत्य है।
तो क्या हमने उन्हें खोजा?
क्या हमने यह जानने का प्रयास किया कि वे आज किस रूप में विद्यमान हैं?
हम केवल उनका नाम लेते हैं,
उनकी तस्वीरों को प्रणाम करते हैं,
पर क्या हमने कभी उनके संग की खोज की?
जब तक मनुष्य उनके चरणाश्रित नहीं होता,
जब तक वह उनके सान्निध्य में चलना नहीं सीखता,
तब तक वह केवल उन्हें “मान” सकता है,
उन्हें “जान” नहीं सकता।
क्योंकि देश, काल, पात्र, परिवेश,
मनुष्य की आयु, उसकी मानसिक अवस्था
और युग की आवश्यकता के अनुसार
पथ दिखाने वाले वही पुरुषोत्तम होते हैं।
युगानुकूल मार्गदर्शन वही देते हैं।
उस पथ का अवलंबन किए बिना
पूर्ण ज्ञान सम्भव नहीं।
शायद इसी कारण हर युग में भक्तों ने पहले उन्हें खोजा,
फिर स्वयं को बदला।
पहले उन्हें खोजें।
वह आज भी उसी चेतना में विद्यमान हैं।
वही राम हैं,
वही कृष्ण हैं,
वही शिव हैं—
बस रूप बदल जाता है,
पर करुणा और चेतना वही रहती है।
उन्हें केवल तर्क से नहीं,
भक्ति, समर्पण और अंतःकरण की शुद्धता से पहचाना जा सकता है।
भक्त ही उन्हें पहचान पाते हैं।
पर क्या हमने कभी सच में उनकी बातों को समझने का प्रयास किया?
या हम केवल तस्वीरों, मूर्तियों और बाहरी आडंबर में ही उलझे रहे?
यदि कोई मनुष्य घंटों पूजा करे,
पर किसी भूखे को तुच्छ समझे,
गरीब का शोषण करे,
जाति और अहंकार में डूबा रहे,
तो क्या उसने वास्तव में कृष्ण को समझा?
कृष्ण ने अर्जुन को युद्धभूमि में खड़े होकर
समभाव, करुणा, निर्भय कर्म और आत्मजागरण की शिक्षा दी थी।
उन्होंने केवल पूजा-पद्धति नहीं सिखाई।
मुझे कई बार लगता है—
हम भगवान की तस्वीर को तो मानते हैं,
पर उनकी बातों को नहीं।
हम मंदिर बनाते हैं,
पर मन को नहीं बदलते।
हम श्लोक सुनते हैं,
पर किसी पीड़ित की चीख नहीं सुनते।
हम आरती करते हैं,
पर भीतर अंधकार ही रखते हैं।
केवल श्लोक याद कर लेना ज्ञान नहीं।
यदि भीतर करुणा नहीं जगी,
यदि अहंकार कम नहीं हुआ,
यदि दूसरे के दुःख को देखकर हृदय नहीं पिघला,
तो शायद गीता अभी केवल शब्द है,
चेतना नहीं।
मनुष्य पत्थरों से मंदिर बना सकता है,
पर सबसे कठिन कार्य अपने भीतर मंदिर बनाना है।
भीतर का मंदिर तब बनता है,
जब मन शांत हो,
वाणी सत्य हो,
कर्म करुणा से भरे हों,
और श्वास में स्मरण जीवित हो।
आज मनुष्य चाँद तक पहुँच गया,
पर अपने भीतर उतरना अभी भी नहीं सीख पाया।
उसने विज्ञान से संसार बदल दिया,
पर लोभ, क्रोध, हिंसा और अहंकार
अभी भी उसके भीतर वैसे ही बैठे हैं।
और शायद यही सबसे बड़ा दुर्भाग्य है।
आस्तिकता केवल माथे का तिलक नहीं।
आस्तिकता वह है जहाँ मनुष्य प्रत्येक जीव में उसी चेतना का सम्मान करे।
जहाँ करुणा हो।
जहाँ सत्य हो।
जहाँ अन्याय के सामने खड़े होने का साहस हो।
अन्यथा केवल बाहरी प्रदर्शन कभी-कभी धर्म नहीं,
अज्ञान का आवरण बन जाता है।
Bhagavad Gita शायद पढ़ने की चीज कम,
जीने की चीज अधिक है।
और शायद इसी कारण कृष्ण अर्जुन से अंत में कहते हैं—
“इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥”
अर्थात—
“मैंने तुझे यह गूढ़ ज्ञान कह दिया।
अब तू इसे पूर्ण रूप से विचार कर,
फिर जैसा उचित समझे वैसा कर।”
वे अर्जुन पर विचार थोपते नहीं।
वे उसकी चेतना को जाग्रत करते हैं।
क्योंकि सच्चा धर्म भय से नहीं,
जागरण से जन्म लेता है।
शायद भगवान को खोजने की यात्रा
आकाश की ओर देखने से नहीं,
भीतर उतरने से प्रारंभ होती है।
और जिस दिन मनुष्य प्रत्येक जीव में उसी चेतना का दर्शन कर लेता है,
उसी दिन धर्म ग्रंथों से निकलकर जीवन बन जाता है। 🌿
जयगुरु 🙏 🙏 🙏 
वंदे पुरुषोत्तमम