Father and other stories, Part -3 in Hindi Short Stories by Anil Kundal books and stories PDF | पिता और अन्य कहानियाँ, भाग-3

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पिता और अन्य कहानियाँ, भाग-3

                  ¶¶ उसका स्पर्श

                         कहानी 

                           - १-

माँ बहुत दिनों से रुग्ण चल रहीं थीं और बहुधा काम पर से छुट्टी मार लिया करतीं थीं। पर उनका उस प्रकार अनुपस्थित रहना बहुत देर तक चलना मुश्किल ही था। वैसे भी तो बहुत से घर छूट गए थे और अब एक आखिरी सेठ जी का घर ही बचा था। वो भी संभवतः छूट ही जाता, यदि सेठ जी के जैसा दयालु इंसान ना मिला होता। वो गरीब अमीर, ऊंच नीच में फर्क नहीं मानते थे। उन जैसे उनके बाप दादा भी उदार हृदय के व्यक्ति रहे थे। लेकिन आगे उनके साथ ही ये सब चला जाता। क्योंकि उनके तीन बेटों में से केवल मंझला बेटा ही उनके पद चिन्हों पर चल रहा था। बाकी दोनों वक्त के बदलते ही खुद भी पूरी तरह से बदल गए थे। रही बात उनकी दोनों बेटियों की! वो बिलकुल अपनी माँ पर गईं थीं। साक्षात देवियां। छल प्रपंच और प्रलोभनों से कोसों दूर। उनके विवाह हुए एक मुद्दत हो चुकी थी। संभवतः मैं तब केवल चार या पांच वर्ष की रही थी, जब उनके विवाह हुएं। 

और एक दिन जब माँ के मुख से आर्थिक तंगी वाली बात निकल ही गई, तो सेठ जी ने उन्हें अपने ही घर में दो और ज्यादा काम सौंप दिए और वेतन भी पहले से कईं गुना अधिकाधिक बढ़ा चढ़ा कर चौगुना कर दिया गया था। और कामों में मितव्ययिता बरतने की भी बात कह दी थी। सुविधानुसार वो कभी भी किसी भी कार्य को अपनी मंशा के मुताबिक़ टाल सकती थीं। परंतु वह भी पूरे एक महीने में दो या तीन बार। 

पिता जी के देहावसान के उपरांत एकमात्र माँ ही कमाने वालीं थीं और खाने वाली थीं हम दो बहनें। मैं, कृतिका, और मेरी छोटी बहन, संध्या। 

ये नहीं था कि हमारे खर्चे आमदनी की हद से बहुत ही आगे सरक जातें हों। कम खाना पीना और मतलब का ही पहनना औढ़ना। शऊर से रहना और बेमतलब के कामों से बेइंतहा दूरी बनाए रखना। हम दोनों बहनें दो साफ़ सुथरी डायरियों के जैसे थीं जिन पर किसी भी तरह की स्याही से कुछ भी नहीं लिखा गया था और जिन पर इस बेदर्द और बेहुदा जमाने की गंदी और अमर्यादित नज़रें तक नहीं पड़ीं थीं और धूल धूसरित भी नहीं थीं वो अनछुई सुकुमार नाजुक सी कलियों के जैसीं। 

उस संध्या बेला में जब माँ सेठ जी के घर काम करने नहीं जा सकी, तो उनकी जगह मैं काम पर निकल गई। वो अच्छे लोग थे। इसलिए माँ ने भी किसी प्रकार का कोई विरोध नहीं किया और मुझे जाने दिया। 

वो रास्ता मुझे अब भी भले से ज्ञात था। घर से पैदल ही निकल कर बमुश्किल बीस इक्कीस मिनट से ज्यादा नहीं लगते थे। बचपन में अनगिनत बार जो मैं अपनी माँ के संग वहाँ जाया करती थी। 

वो घर अपने ही जैसे और घरों के बीचोबीच खड़ा था और ऐसा लगता था जैसे कि किसी राजा को भव्य महल हो। 

सड़क के बिलकुल नजदीकी थी उस घर की और था भी व तीन मंजिला भव्य भवन! निस्संदेह उसके निर्माण कार्य में बहुत वर्ष लगे होंगे। 

जिस सड़क पर वह शानदार हवेली जैसा घर था, वो सड़क भी और दूसरी सड़कों से बिलकुल अलग थलग थी। उस सड़क के दोनों किनारों पर कईं बड़े बड़े छतनारे पेड़ लगे हुए थे। कीकर, बरगद, पीपल और कुछ एक रात की रानी के भी वृक्ष। बीचोबीच कहीं कहीं पर सुगंधित पुष्पों के पौधे भी थे। लेकिन उनकी संख्या तकरीबन ना के बराबर ही थी। 

उस सड़क पर चलने का मुझे बहुत शौक था। कुछ एक मिनट का वह छोटा सा रास्ता मैं कम से कम आधे घंटे से पहले खत्म नहीं होने देती थी। 

और जब मैं उनके बड़े से बंगले में पहुंची, तो सेठ जी अपने मुंशी जी के साथ जरूरी काम के सिलसिले में  अपनी कार से कहीं दूर दराज़ निकल चुके थे। यों ही मैंने उनके घर की ड्योढ़ी पर कदम रखा ही था, उनकी कार धूल और धुआँ उड़ाती  हुई उससे कोसो दूर जा चुकी थी। 

घर कुछ ज्यादा ही खाली खाली महसूस हो रहा था।  उसके पहले भी कईं बार मैं वहाँ जा चुकी थी। और जहाँ तहां अचरज भरी निगाहों से देखती कि उस गगनचुम्बी अट्टालिका के भीतर अनगिनत सेवकों का डेरा है। कोई माली, तो कोई पालित कुत्तों की देखरेख करने वाला। तो कोई बावर्ची, तो मालिश करने वाला। तो कोई कोई, तो कोई कोई...... ! नौकरों की गिनती करते करते कोई भी पागल हो सकता था। 

पर आज सब जगह खाली खाली सन्नाटा क्यों पसरा हुआ था! चहलपहल मानों कभी थीं ही नहीं। बस एकदम एक दमघोंटू सी निस्तब्धता और खिन्नता चहुँ ओर व्याप्त थी। 

कुछ विलंब विशेष विचार के पश्चात मैं बिलकुल बेफिक्र हो गई। कि उससे मुझे क्या? अपने काम में लगना और खत्म होने के साथ पुनः गेह की ओर! और क्या? 

प्रत्येक व्यक्ति अपने सुख से सुखी और अपने दुःख से दुखी हुआ करता है। औरों के संग अपरिमित सहानुभूति रखने वाले लोग होते ही कितने हैं? 

                            - २ -

लगभग दो घंटे लगे होंगे उन कार्यों को निबटाने में। तुरंत उसी क्षण माँ की याद आ गई। कि कैसा कठेठ जिगरा है मेरी माँ का! इतना बोझिल काम करके भी वो पुनः वापिस घर आने पर भी हम दोनों बहनों के लिए रात का खाना भी बनातीं हैं। 

कुछ देर मैं बरामदे में  नीचे  ही धरती पर बैठ गई। जैसे कि किसी पराये घर ना बैठकर अपने घर में बैठी हूँ। मेरी सारी देह उस वक्त ऐसे टूट रही थी कि जैसे कि किसी ने जमकर पिटाई की हो। मेरी देह का पुर्जा पुर्जा मानों अपनी अपनी जगह से हिल डुल गया हो। 

फ्रिज में से पानी की बोतल निकाली और गट गट गट करके मैं जी नाक तक भर जाने तक ठंडे ठार पानी को पीने के साथ ही पुनः अधखाली  बोतल मैंने फ्रिज में टिका दी। 

वो फ्रिज तरह तरह की खाने पीने की वस्तुओं से पूरी तरह से ठूस ठूस कर भरा हुआ था। एक तिल रखने की भी जगह नहीं बची थी उस इतने बड़े से फ्रिज में। ठीक बिलकुल ऐसे जैसे कि आजकल मुर्गों को छोटे छोटे पिंजरों में ठूस ठूस कर भर देते हैं। बेचारे छूरी के नीचे आने के बहुत पूर्व ही हज़ारों हज़ार मौतें मर जाते हैं। उन बेचारों का दर्द लेकिन समझता कौन है? 

मैं भी ना, ना जाने क्यों यूँ ही क्या क्या सोचती रहती थी। मैंने अपनी साड़ी के आंचल से अपने मुंह पर जमकर बैठे हुए स्वेद कणों को सहजता से पौंछा और एक लंबी सी सुकून भरी सांस लेने और पुनः छोड़ने के साथ ही मैं उठकर चलने को उद्यत हुई ही थी कि अचानक से किसी के अनजान हाथों ने मुझे अपनी ओर खींच लिया। जैसे कि डोर को खींचने के साथ ही पतंग आप ही आप आ जाती है। 

मैं इतनी खौफ़शुदा हो गई थी कि लगा जैसे कि मेरी जान अब गई तब गई। और मेरी सांसों की डोरी एकाएक तनने लगी थी। मानो कि मारे डर से सांसे अटक गई हो। ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे। 

                         -३-

" क - क - कौन? " मैंने लड़खडाती हुई जबान से प्रत्युत्तर मांगा और तभी एक मर्दाना आवाज ने जबाब दिया, " मैं सेठ जी का सबसे छोटा बेटा ' प्रीतम' हूँ। और लोग अक्सर मुझे प्यार से ' प्रीत ' कहकर बुलातें हैं, जी! "

मारे डर के मैंने अपने दोनों आंखें मूंद लीं थीं। उस व्यक्ति का परिचय मिलते ही मैंने भभकी लपटों के जैसे क्रोध से कहा, " ओ अमीरजादे! मेरा हाथ छोड़िए! वरना! "

" वरना क्या? मुझे गोली मार दोगी क्या? "

" बाप जितना शरीफ और सारे बेटे एक से एक लफंगे! "

" जी! दुरुस्त फरमाया आपने! अक्सर फूलों से भरी डाली में अनगिनत कांटे भी तो हुआ करते हैं। "

" आप मेरा हाथ छोड़ते हो कि शोर मचाऊं? "

" लो छोड़ दिया हाथ! "

उसके मेरे हाथ को छोड़ने के साथ ही ना जाने कितनी गजलें याद हों आईं। कह नहीं सकती! और एक गजल को तो सुनते ही मैं पुरज़ोर खिल खिला कर हंस दी। यों कि तेज़ तर्रार बयार के चलते मस्त झोंकों के साथ ही अनगिनत कुमुदिनियां खिल खिला कर हंस देती हैं। 

और जब सहसा मैंने हंसी को एक पूर्ण विराम दिया, तो मैंने देखा कि वो मुझे बहुत ही गौर से, टुकुर टुकुर, देख रहा है। मानों मेरी अनिंद्य सी दिखाई देती खूबसूरती पर अनायास ही रीझता हो।

मैंने फिर से गुस्सा दिखाते हुए कहा, " ओ मिस्टर! अब जरा  यूँ घूर घूर कर देखना बंद करने की जहमत उठाने की कोशिश करें, तो मैं चलूँ? " मेरी खूबसूरत सी हिरनी के जैसी आंखों में उस वक्त क्रोध के अनमेल बादल छाए हुए थे। 

और यों ही मेरी नज़रों ने उसके खूबसूरत से चेहरे की तरफ देखा, तो मेरी आँखें उस पर से हटने को तत्पर नहीं थी और वो एक अड़ियल घोड़ी के जैसे पूरी तरह से ढीठ हो गईं थीं मानों वो यकायक अपनी गुस्ताखी पर उतर आईं हों। 

" जाने वाले चले जाते हैं, मगर उनकी यादें, कमबख़्त बड़ा जुल्म ढाती है! मेरे नालायक दिल! " उसने फिर से मुझे हंसा दिया। मैं उस क्षण खुल कर ऐसे हंसी जैसे कि उससे मेरी बरसों पुरानी जान पहचान हो। क्योंकि उस दिलकश हंसी मे अपनापन था और अपनों सा स्नेह। 

और  उस सुअवसर को गवाएं बगैर ही वो झट से बोल पड़ा, " हाय, कितनी खूबसूरत हो, आप! कभी बहुत जमाने पहले देवदास ने बड़ी ही शिद्दत से अपनी पारो से कहा होगा! "

वो मजेदार सी बात पर मैं फिर से हंस उठी। 

" आप भी तो कोई कम खूबसूरत नहीं हो! " कहते ही मारे लज्जा के मैंने अपनी ग्रीवा झुका ली थी। 

" अच्छा अब मैं चलती हूँ? " मैंने फिर से कहा और वहाँ से निकलने के लिए एक दो कदम उठाए। 

बमुश्किल दो कदम और चली ही थी कि उसने एक ही झटके में मेरे हाथ को पकड़ कर अपनी ओर खींच लिया और मेरी आँखों में आंखें डालकर कुछ देर तक मेरी तरफ देखता रहा। 

" अब चलती हूँ। कोई आ जाएगा। " मैंने अनुनय विनय की। 

पर वो नहीं माना और उसने अविलम्ब मेरे अधरों को चूम लिया। 

मैं मारे लज्जा के स्वयं में ही सिमटने लगी। और जब वो सभी हदें लांघने को सोचने ही वाला था कि सेठ जी की गाड़ी ने हॉर्न बजाया। 

 पिता के आगमन की अनुभूति मात्र से ही प्रीतम के हाथों की जबरदस्त पकड़ के पांव उखड़ चुके थे और अब मैं पूरी तरह से आज़ाद थी। 

मुझे उन घड़ियों में ऐसी अनुभूति हुई थी कि मानों मैं तत्क्षण एक निरीह हिरनी में तब्दील हो गई थी और प्रीतम एक खूंखार शेर। और उसके चंगुल में फंसी मैं छटपटा उठी थी। 

वो ना जाने अपनी किस गहरी सोच में पड़ गया और मैं बिना कहीं पर रुके कुछ एक सांसों को रोकने के साथ ही वहाँ से बहुत दूर निकल गई थी। शायद इतनी भी दूर नहीं कि फिर से कभी आ भी नहीं पाती! 

                           -४-

सारे रस्ते मैं सोचती रही। उसने मेरी हृदय रूपी वीणा के सभी तार एक साथ ही इकट्ठे झंकृत कर दिए थे। और उसके एकमात्र स्पर्श ने मेरे भीतर का सब कुछ बदल कर रख दिया था। मैं उस कैद पंछी के जैसे अपने आप को असहाय महसूस कर रही थी जो कि उड़ान तो बहुत ऊंची भरना चाहता है, पर पर कटे होने के कारण वह ठीक से चल भी पाता। उड़ना तो बहुत दूर की बात है। 

एक तरफ मतलबी समाज है और दूसरी तरफ माँ और तीसरी तरफ प्रीतम और उन सबके बीच फंसी हुई मैं। 

उस रात मैं बिलकुल भी सो ना सकी। सारी रात करवटें बदलते ही बीत गई। 

माँ को थोड़ा सा शुबह हो गया था। लेकिन वो कुछ बोली नहीं। 

बाल सफेद कोई धूप थोड़ी ही होतें हैं। जिंदगी भर का अनुभव होता है वृद्ध लोगों को। उन आंखों ने सब कुछ देखा होता है और उस दिल ने सब कुछ महसूस किया होता है। बेढब टेढ़े वक्त के थपेड़े खाए होतें हैं। 

अगले दिन जब मैं फिर से उस घर में गई, तो प्रीतम मुझे कहीं पर भी दिखाई नहीं दिया। मैं बहुत अधीर हो उठी थी। संभवतः मुझे उससे प्यार हो गया था और अब मैं उसके बगैर एक लम्हा भी जीने की सोच तक नहीं सकती थी। 

अपने काम से पूरी तरह से निबटने के साथ ही मैंने उस महल से बड़े घर के हर एक कोने नुक्कड़ में उसे ढूंढने की कोशिश की। लेकिन वो वहां पर कहीं पर भी नहीं मिला। 

मैं बहुत उदास हो गई। मुझे हर लम्हा रह रह कर उसका स्पर्श याद आ रहा था और मैं उसको मिलने के लिए बेचैन हो उठी। 

                         -५-

कईं दिन बीत गए। मुझे उसका अता पता कुछ भी मालूम नहीं था और मुसीबत एक यह भी थी कि खुलकर मैं उसके बारे में किसी से भी पूछ भी नहीं सकती थी। 

मैं पहले जैसी बिलकुल भी नहीं रही थी। मेरे भीतर का सब कुछ बदल सा गया था। 

मैं रोज़ सेठ जी के घर काम करने आ जाती थी। माँ को भी किसी ना किसी तरह कोई बहाना देकर समझा ही लेती थी। प्रीतम अब मेरे लिए एक नशा सा हो गया था। जैसे कि कोई गंजेड़ी गांजा पिए बगैर नहीं रह पाता, वैसे ही मैं उसके बगैर जी नहीं पा रही थी। जो लोग किसी को टूट कर प्यार करने के बाद उस शख़्स को छोड़ देते हैं, तो वो शख्स एक जीती जागती लाश के सिवा कुछ भी नहीं रहता। 

मेरा सुख चैन पूरी तरह से छिन गया था। ना घर पर ही सुख चैन मिलता और ना ही बाहर कहीं। मैं उन बेजुबान पंछियों की तरह हो गई थी जिन्होंने चहकना छोड़ दिया हो। 

रात बे रात उसके स्पर्श के स्मरण मात्र से भी मेरी देह क्या, मेरी रूह तक भी सिहर उठती। 

एक रोज़ जब मैं अपने काम को खत्म करने के बाद उस घर से जाने ही वाली थी कि एकाएक सेठ जी ने मुझे आवाज लगा कर अपने पास बुला लिया और जब मैं उनके करीब पहुंची, तो वे संजीदगी के साथ बोले, " बिटिया, तुम्हें हुआ क्या है? बहुत दिनों से देखता आया हूँ तुम कुछ बुझी बुझी सी नज़र आने लगी हो। ना तो पहले जैसा वो फूलों की तरह हंसता हुआ चेहरा और वो दिलकश सी बातें। "

" पिता जी, ऐसा वैसा कुछ भी नहीं है। वो मेरी तबियत कुछ ठीक ठाक नहीं चल रही है। इसलिए आपको ऐसा लगा होगा। मुआफ़ी चाहूंगी कि मेरे मुंह से जाने अनजाने में पिता जी लफ्ज़ निकल गया। " मैं अपने दिल को उनके सामने यूँ पूरी तरह से खोल देना चाहती जैसे कि कोई मरीज अपने डाक्टर के साथ खुल जाता है। पर मर्यादा मुझे रोकती थी। मेरी गरीबी रोकती थी और रोकता था इस समाज का डर। 

अनायास ही मेरी आंखें भर आईं और ओस की बूंदों के जैसे मेरे दोनों गालों पर लुढ़क आईं। मैंने अपलक मेरी अपर दिशा की तरफ घुमा लिया। 

" यदि हम तुम्हें बिटिया बोल सकते हैं, तो पिता जी कहना तुम्हारे भी अधिकार की वस्तु बन जाता है। जहाँ तक मेरा हृदय सोचता है मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि किसी ने तुम्हारे हृदय को आहत किया है और वो शख्स कौन है - वो पूछना हमारी अधिकार सीमा के भीतर नहीं आता। हाँ, यदि हमें बताओगे, तो हम उस दुष्ट को पूरी पूरी सज़ा देंगे, जिसने तुम्हारे संग बेइंसाफी की है। " सेठ जी ने मेरे मुंह से उस शख़्स का नाम सुनना चाहा। लेकिन मैं लाख चाहकर भी उसका नाम कह ना सकी। 

                               -६-

निर्मोही समय किसी के साथ ना आज तक ठहरा है और ना ही कभी ठहरेगा। 

मेरे पास भी वक्त ने ठहरना ठीक नहीं समझा और वो अपने पर लगा कर बहुत दूर चला गया। 

मैं बिमार भी कुछ ज्यादा ही रहने लगी थी। बहुत ही दिन बीत गए होंगे, जब से आखिरी दिन मैं सेठ जी के घर काम करने गई थी। 

मेरी बिमारी का ईलाज मेरी माँ और अन्य लोगों ने मेरी शादी  ही निकाला और एक धनाढ्य लेखक के साथ मेरा विवाह कर दिया गया। 

और जब सुहागरात की रात वाली वो अजीबोगरीब सी घड़ियाँ आईं, तो मेरे दिल की धड़कन कुछ ज्यादा ही रफ्तार पकड़ गई। 

और जब उन्होंने मुझे अपना स्पर्श देना चाहा, मुझे ऐसा लगा जैसे एक साथ हज़ारों हज़ार बिच्छुओं ने मुझे डंक मार दिया हो।

और मैं सिर्फ छटपटा कर ही रह गई।