उन सड़े हुए हाथों के नाखून कम से कम छह-छह इंच लंबे थे और उनमें से पीला मवाद टपक रहा था। यह कोई वहम नहीं था, मौत साक्षात हमारे सामने कुएं से बाहर निकल रही थी। "भागो गाड़ी की तरफ! कोई पीछे मुड़कर नहीं देखेगा!" मैंने अपनी पूरी ताकत से चिल्लाकर कहा। हम सब अपनी जान बचाकर उसी संकरी गली वाले रास्ते पर वापस भागने लगे, जिससे हम आए थे। लेकिन वह रास्ता जो आते वक्त बहुत छोटा और सीधा लग रहा था, अब खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था।रात का अंधेरा और घना हो गया था और हमारी टॉर्च की रोशनी भी धुंधली पड़ने लगी थी। हम जितना तेज़ भाग रहे थे, ऐसा लग रहा था कि हम उसी जगह पर बार-बार घूमकर वापस आ रहे हैं। चक्कर काटने का यह सिलसिला खत्म ही नहीं हो रहा था। भागते-भागते अचानक नितिन का पैर एक बड़े पत्थर से टकराया और वह मुंह के बल नीचे गिर गया। उसके हाथ से छूटकर टॉर्च दूर जा गिरी और बुझ गई।जैसे ही वह उठने के लिए अपने हाथों को जमीन पर टिकाया, हवा में एक भयानक सरसराहट हुई। एक ऐसी गंध फैली जैसे कोई लाश हफ्तों से सड़ रही हो। हमने डरते-डरते पीछे मुड़कर देखा। नितिन के ठीक पीछे एक साया खड़ा था। उसकी लंबाई करीब सात फीट रही होगी। उसका चेहरा आग में पूरा जला हुआ था, मांस लटक रहा था, आंखें पूरी तरह लाल अंगारे जैसी चमक रही थीं और उसके काले घने बाल जमीन को छू रहे थे। वह वही कुएं वाली चुड़ैल थी।"मुझे बचाओ! भाई मुझे छोड़ना मत!" नितिन ने रोते हुए ज़ोर से चिल्लाया। इससे पहले कि मैं या रोहित उसकी तरफ बढ़ते या उसका हाथ पकड़ते, उस भयानक साये ने पलक झपकते ही नितिन के दोनों पैर अपने हाथों से जकड़ लिए और उसे हवा में उल्टा उठा लिया। नितिन हवा में मछली की तरह छटपटा रहा था, लेकिन उस चुड़ैल की पकड़ लोहे जैसी मजबूत थी। उस चुड़ैल ने अपने लंबे, नुकीले और गंदे दांत नितिन की गर्दन में गहरे गड़ा दिए।रात के उस सन्नाटे में नितिन की गर्दन की हड्डियां टूटने की और उसका खून चूसने की डरावनी आवाजें साफ सुनाई दे रही थीं। नितिन के मुंह से केवल खून के फव्वारे निकल रहे थे और उसकी चीखें धीरे-धीरे शांत हो गईं। महज कुछ ही सेकंड में उसका बेजान, सूखा हुआ शरीर जमीन पर गिर गया। उसकी आंखें खौफ के मारे फटी की फटी रह गईं।हम चारों के होश उड़ चुके थे। अपने सबसे पक्के दोस्त को अपनी आंखों के सामने इस तरह मरते देखना एक ऐसा सदमा था जिसने हमारे दिमाग को सुन्न कर दिया था। लेकिन इस वक्त दुख मनाने का समय नहीं था, हमारे ऊपर खुद की मौत का खौफ हावी था। स्नेहा और अंजलि पागलों की तरह रो रही थीं और उनके पैर कांप रहे थे। रोहित ने मेरा हाथ कसकर खींचा और रोते हुए बोला, "भाई, नितिन अब नहीं रहा! अगर हम एक सेकंड भी यहां और रुके तो हम सब मारे जाएंगे, भागो!" हम नितिन की लाश को उसी सुनसान सड़क पर छोड़कर गाड़ी की तरफ अंधाधुंध भागने लगे। इस बार खुशकिस्मती से हमें सामने अपनी कार खड़ी दिखाई दी, लेकिन हमारा डर अभी खत्म नहीं हुआ था।