Sanatan Gatha: Unheard pages of Ramayana and its complete history - 2 in Hindi Mythological Stories by Tejendragodara books and stories PDF | सनातन गाथा: रामायण के अनसुने पन्ने और संपूर्ण इतिहास - 2

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सनातन गाथा: रामायण के अनसुने पन्ने और संपूर्ण इतिहास - 2

चारों राजकुमार अब किशोर अवस्था में प्रवेश कर चुके थे। वे जितने सुंदर थे, उतने ही बुद्धिमान और पराक्रमी भी थे। गुरु वसिष्ठ के आश्रम में रहकर उन्होंने वेदों का ज्ञान लिया था और तीरंदाजी में महारत हासिल कर ली थी। श्री राम की सादगी और शांत स्वभाव पूरी अयोध्या का दिल जीत लेता था। राजा दशरथ अब चैन की सांस ले रहे थे। वे अक्सर महल के झरोखे से चारों भाइयों को अखाड़े में अभ्यास करते हुए देखते और फूले नहीं समाते थे। अब राजा के मन में बस एक ही विचार चल रहा था कि चारों बच्चों की शादी किसी अच्छे राजघराने में करवा दी जाए ताकि वे गृहस्थ जीवन में प्रवेश कर सकें। लेकिन विधाता ने तो श्री राम के लिए कुछ और ही रास्ता चुन रखा था। महलों की सुख-सुविधाएं बहुत जल्द छूटने वाली थीं।एक दोपहर, जब राजा दशरथ अपने मंत्रियों के साथ राजसभा में बैठे राजकुमारों के विवाह की चर्चा कर रहे थे, तभी द्वारपाल हांफता हुआ अंदर आया। उसने घबराते हुए कहा, "महाराज! द्वार पर परम प्रतापी और अत्यंत क्रोधी महर्षि विश्वामित्र पधारे हैं।" विश्वामित्र का नाम सुनते ही पूरी सभा में सन्नाटा पसर गया। सब जानते थे कि विश्वामित्र एक बहुत बड़े तपस्वी हैं, लेकिन उनका गुस्सा भी उतना ही तेज है। राजा दशरथ तुरंत अपने सिंहासन से उठे और नंगे पैर दौड़ते हुए मुख्य द्वार तक गए। उन्होंने ऋषि विश्वामित्र के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और उन्हें पूरे आदर के साथ राजसभा के भीतर लेकर आए। सोने के आसन पर बैठाकर उनके पैर धोए गए।राजा दशरथ ने हाथ जोड़कर कहा, "हे महर्षि! आपके आने से मेरी पूरी अयोध्या पवित्र हो गई। आज तक कोई भी खाली हाथ आपके द्वार से नहीं लौटा, और आप स्वयं मेरे पास आए हैं। आज्ञा कीजिए ऋषिवर, आपके मन में जो भी इच्छा है, उसे पूरा करने के लिए मैं अपना सर्वस्व दांव पर लगा सकता हूँ। अगर आप मेरी जान भी मांगेंगे, तो यह दशरथ हंसते-हंसते दे देगा।"ऋषि विश्वामित्र ने राजा दशरथ को देखा और गंभीर आवाज में बोले, "राजन! मैं अपनी किसी व्यक्तिगत इच्छा के लिए नहीं आया हूँ। मैं सिद्धाश्रम में एक बहुत बड़ा यज्ञ कर रहा हूँ। लेकिन जब भी यज्ञ अपने अंतिम चरण में पहुंचता है, मारीच और सुबाहु नाम के दो भयानक राक्षस अपने दल-बल के साथ आते हैं और यज्ञ कुंड में मांस और रक्त डालकर उसे अपवित्र कर देते हैं। मैं उन राक्षसों को अपनी तपोबल से भस्म कर सकता हूँ, लेकिन यज्ञ के नियमों के कारण मैं क्रोध नहीं कर सकता और न ही किसी को शाप दे सकता हूँ। इसलिए मैं यहाँ तुमसे सहायता मांगने आया हूँ।"राजा दशरथ ने तुरंत मुस्कुराकर कहा, "ऋषिवर! इसमें कौन सी बड़ी बात है। मैं अभी अपनी चतुरंगिणी सेना तैयार करने का आदेश देता हूँ। मैं खुद अपने रथ पर सवार होकर आपके साथ चलूँगा। जब तक इस दशरथ के हाथ में धनुष है, कोई भी राक्षस आपके यज्ञ की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देख पाएगा।"विश्वामित्र ने अपना सिर हिलाया और बोले, "नहीं राजन! मुझे तुम्हारी सेना नहीं चाहिए और न ही मुझे तुम्हारी जरूरत है। मारीच और सुबाहु को हराने की शक्ति केवल तुम्हारे बड़े पुत्र श्रीराम में है। इसलिए तुम अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम को मेरे साथ भेज दो। वह मेरे यज्ञ की रक्षा करेगा।"यह सुनते ही जैसे राजा दशरथ के पैरों तले जमीन खिसक गई। उनके चेहरे का रंग सफेद पड़ गया। वे थर-थर कांपने लगे और लड़खड़ाते हुए अपने सिंहासन पर बैठ गए। जिस बेटे को उन्होंने बुढ़ापे में इतनी मन्नतें मांगकर पाया था, जो उनकी जान से भी बढ़कर था, उसे वे भयानक राक्षसों के सामने जंगल में कैसे भेज देते? राजा दशरथ रोने लगे। उन्होंने हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हुए कहा, "ऋषिवर! यह आप क्या मांग रहे हैं? मेरा राम अभी केवल सोलह वर्ष का बालक है। उसने अभी तक युद्ध की विभीषिका नहीं देखी है। वह उन क्रूर और मायावी राक्षसों का सामना कैसे करेगा? वे राक्षस छल से युद्ध करते हैं। मेरे राम को मत ले जाइए। उसके बिना मैं एक पल भी जीवित नहीं रह पाऊंगा। अगर आप चाहें तो मेरी जान ले लें, मेरी पूरी सेना ले लें, लेकिन मेरे राम को मत मांगिए।"राजा दशरथ की यह बात सुनकर विश्वामित्र की आँखें गुस्से से लाल हो गईं। राजसभा का तापमान अचानक बढ़ गया। विश्वामित्र कड़ककर बोले, "दशरथ! तुमने अभी-अभी कहा था कि तुम अपना सर्वस्व दे सकते हो, और अब अपनी बात से मुकर रहे हो? रघुकुल की रीत यही है क्या कि अतिथि को वचन देकर पीछे हट जाओ? यदि तुम्हें अपने पुत्र से इतना ही मोह है, तो मैं खाली हाथ लौट जाता हूँ। लेकिन याद रखना, इतिहास तुम्हें एक वचन तोड़ने वाले राजा के रूप में याद रखेगा।"विश्वामित्र का क्रोध देखकर पूरी सभा थर-थर कांपने लगी। तब कुलगुरु महर्षि वसिष्ठ आगे आए। उन्होंने राजा दशरथ को एकांत में ले जाकर समझाया, "राजन! तुम मोह में पड़कर विधाता के खेल को नहीं समझ रहे हो। ऋषि विश्वामित्र कोई साधारण ऋषि नहीं हैं। वे श्रीराम को कोई खतरा नहीं, बल्कि उनके जीवन का सबसे बड़ा अवसर देने आए हैं। उनके पास ऐसी गुप्त विद्याएं और अस्त्र-शस्त्र हैं जो पूरी सृष्टि में किसी के पास नहीं हैं। वे राम को और भी शक्तिशाली बनाने आए हैं। उन पर भरोसा करो और राम को विदा करो।"गुरु वसिष्ठ की बात सुनकर राजा दशरथ का डर थोड़ा कम हुआ। उन्होंने भारी मन से हामी भर दी। श्री राम को राजसभा में बुलाया गया। जब लक्ष्मण को पता चला कि भैया जंगल जा रहे हैं, तो वे भी दौड़ते हुए आए और राम के चरणों में बैठ गए। लक्ष्मण ने कहा, "भैया जहाँ जाएंगे, यह लक्ष्मण साये की तरह उनके साथ रहेगा।" विश्वामित्र ने मुस्कुराकर दोनों भाइयों को साथ ले जाने की अनुमति दे दी। राजा दशरथ ने नम आँखों से अपने दोनों बेटों के सिर को चूमा और उन्हें विश्वामित्र के पीछे चलने का आदेश दिया। श्री राम और लक्ष्मण ने अपने धनुष-बाण संभाले, माता-पिता के पैर छुए और बिना किसी हिचकिचाहट के महल के ऐशो-आराम को छोड़कर ऋषि विश्वामित्र के पीछे घने और डरावने जंगलों की तरफ कदम बढ़ा दिए। यह उनके जीवन की पहली परीक्षा थी, जहाँ से उनके 'मर्यादा पुरुषोत्तम' बनने का सफर शुरू हो रहा था।