नियमित व्यायाम व ध्यान: -स्वास्थ्य की कुंजी
स्वस्थ्य जीवन प्रकृति द्वारा दिया गया दिव्य अनुपम उपहार है। इस संपदा का संरक्षण व संवर्धन करना हमारी प्रथम प्राथमिकता होनी चाहिये। दुर्घटनाओं को छोड़कर हमारा शरीर सदैव आरोग्य की ओर प्रयासरत् रहता है, इसलिये किसी भी संस्थान में थोड़ी सी गड़बड़ी होने से हमारी जीवनी शक्ति का प्रवाह उस ओर जाकर उस संस्थान की ठीक करने में लग जाता है। प्रकृति ने अपनी इस अनुपम रचना को बनाये रखने के लिये हर प्राणी में शक्ति दी है। शक्ति के पोषण और संवर्धन के लिये गति प्रदान की है।
इस शक्ति और गति का सामंजस्य या सही मेल ही स्वास्थ्य की कुंजी है, या यह कहिये रोग का निदान है। प्राणी में निहित शक्ति गति का संचालन करती है और गति शक्ति का उत्पादन करती है। दूसरे शब्दों में गति व शक्ति एक दूसरे के पूरक है।
हमारे शरीर में खरबों कोशिकाऐं है जो दिन रात कार्यशील रहती है। आहार द्वारा लियो गया पोषक तत्व पाचन संस्थान की क्रिया से गुजर कर रक्त वाहिनायों में उपलब्ध ऑक्सीजन के संयोग से चया पाचय की क्रिया द्वारा जैब उर्जा, विद्युत का उत्पादन होता है, जिससे हमारा जीवन चलता है। पर इस क्रिया में अनेक विजातिय तत्व भी निकलते है जिसका शरीर से बाहर निकलना बहुत ही आवश्यक है। अगर वे शरीर में जमा हो जाते है तो विभिन्न प्रकार के रोग प्रकट होते है। इसके अलावा नवीन कोशिकाओं के निर्माण के साथ पुरानी कोशिकाऐं भी खत्म होती है। अतः उनका भी शरीर से बाहर निकलना अत्यधिक जरूरी है। यह कुछ विजातिय तत्व हमारे शरीर में से मल, मूत्र, पसीना और प्रश्वास के रूप में बाहर निकलते रहते है।
अब प्रश्न उठता है इस शक्ति व गति का संतुलन कैसे है। आघुनिकता की इस दौड़ में हमारी जीवन शैली व दिनचर्या में बहुत बदलाव आया है। शुद्व ताजी हवा की जगह एसी, पोषक खाद्यों में लिखने को तो अनेक उपयोगी तत्व शामिल होते है, परन्तु उनके उत्पादन के तरीकों में उनके प्राकृतिक तत्वों का नाश हो जाता है जो स्वास्थ्य के लिये बहुत ही अहितकार है। इस श्रेणी मे सभी संसाधिक खाद्य पदार्थ मैदा आदि के व्यजंन जैसे पिज्जा, बरगर, नूडलस, चाईनीज फूड सम्मिलित है जो शरीर को पोषक तत्व नहीं पहुंचाते है बल्कि उनको पचाने में शरीर की शक्ति का अधिक अपव्यय होता है।
दैनिक जीवन चर्या में हर मनुष्य तनाव से ग्रस्त है उसके पास अपने स्वास्थ्य में हर तरफ ध्यान देने की फुरसत नहीं है। सुबह उठते ही भागदौड़ चालू हो जाती है, दिन की शुरूआत ही रेडीमेड नाश्ता या जो जल्दीबन जाये वैसे खाना लेकर मियां बीबी दोनों काम पर निकल जाते है। दोपहर को खाने का समय मिला तो ठीक नहीं तो चिप्स , चाय, कॉपी या कोल्ड ड्रिक्स से काम चला लेते है। यही हाल शाम के खाने का है। ऐसी दिनचर्या उपर से तनाव ग्रस्त जीवन, शक्ति आये कहाँ से ?
इस आघुनिकता में एक ओर इजाफा हुआ है, वो यह कि सब लोग ऐसा दर्शाते है कि उन्हें अपनी सेहत का बहुत ध्यान है सो जितने भी थके हो जिम में जाकर वर्क आउट या बहुत मेहनत के व्यायाम करते है। यह सोच कर कि दिन भर में जो कैलोरी ली वो इस तरह (बर्न) खत्म कर दी है।
स्वास्थ्य के लिये शक्ति व गति के लिये हमारे पुर्वजों ने, योगियों ने बहुत अनुसंधान किये है। उनके अनुसार शरीर में शक्ति के लिये आहार सत्-मित्-हित होना चाहिए।
सत् आहार का मतलब जो सुपाच्य हो संतुलित हो, सब आवश्यक तत्वों के समावेश के साथ मौसम के अनुकूल, शरीर की अवस्था व प्रकृति को ध्यान में रखने की सलाह दी है। इसके आलवा भोजन को कैसे खा ये, कब खाये और क्या खाये उसका भी विवरण दिया है बेमेल भोजन का वर्जन किया है जैसे खरबूजा के साथ दूध नहीं लेना चाहिये। दूध के साथ मैदा नहीं लेना चाहिये आदि अनेक बेमेल भोजन का निषेध किया गया है। उसका मतलब ये है कि आहार ऐसा हो जो शरीर को पोषण तो दे ही ,साथ में विजातिय तत्वों की बढ़ोतरी न करें। भोजन सुपाच्य होने से शरीर की जठराग्नि के संतुलन के साथ पाचन संस्थान भी सही रहने से शरीर से विजातीय तत्वो का निष्कासन भी सुगमता से होता है
मितहारः- भूख से कम खाना, चबा चबाकर खाना, शांतिमय वातावरण में खाना खाना चाहिये।
हितकारीः- आहार शरीर के लिये हितकारी होना चािहय। जैसे अंगूर में अनेका नेक गुण है,परंतु मधुमेह के रोगी के लिए अहितकर है| इसी तरह दमा के रोगी के लिए के रोगी को दही वर्जित है। अलग से देखा जाये तो तो ये दोनों ही गुणकारी है पर व्यक्ति विशेष पर ये हित की जगह नुकसान ही करेगें।
संक्षेप में यह कहा जा सकता है जहां तक हो सके भोजन ऐसा होना चाहिये जिससे शरीर का पोषण हो और विजातीय तत्व कम से कम पैदा हो।
अनियमितता से खाये आहार से शरीर में शुरू में छोटे, छोटे रोग प्रकट होते है| जैसे एसिडिटी, गैस, उकार, कब्ज, घबराहट। परन्तु उन पर ध्यान नही दिया जाये तो ये गंभीर रोगों का रूप ले लेते है। हमारी एलोपैथिक चिकित्सा में दर्द का निवारण होता है, बीमारी का पूर्ण रूप से नहीं, दवाईयों के अधिक सेवन से शरीर में और अधिक केमिकल्स जमा होते है जो कहीं न कहीं शरीर में जमा होते रहते हैं|इनको शरीर से निकालने के लिए हमारी शरीर की अतिरिक्त जीवनी श्क्ति/उर्जा का व्यय होता है।पर हमारी जीवन शैली में ऊर्जा के तो पहले ही कमी है तो शरीर में विजातीय तत्व (morbid matter) बढ़ते जाते जो बाद में अनेक बीमारियों को जन्म देते है |
जहां शरीर के पोषण के लिये संतुलित, सुपाच्य, शरीर की प्रकृति के अनुसार भोजन आवश्यक है, वहीं हमारे श्वसन प्रणाली को भी सशक्त करना होगा जिससे शरीर में ऑक्सीजन का अवशोषण पूर्ण हो और कार्बन डाई ऑक्साईड के रूप में शरीर के विकार बाहर निकाल सके । इसके लिये श्वास की क्रियाऐं करनी चाहिये जिससे फेफड़ों के प्रकोष्ठ में लचीलापन आये और उनकी कार्यदक्षता बढ़ जाये।
शरीर के विभिन्न अंगों, जोड़ो में भी विजातिय तत्व जमा हो जाते है, जिस पर अगर ध्यान नहीं दिया जाये तो विभिन्न रोगों के रूप में प्रकट होते है| जैसे जोड़ो का दर्द, गठिया, आस्टरोपोरोसिस संधिवात आदि| इसके अलावा धमनियों में कड़ापन आने से ब्लड़ प्रेशर, हार्ट की बीमारियॉं पैदा हो जाती है। शरीर के विभिन्न अंग ठीक से नहीं काम करने से भी बीमारी का प्रकोप होता है जैसे लीवर और पैन्क्रियास की गड़बड़ी से शर्करा (डायबिटीज) हो जाती है।
इन सबसे बचने का उपाय है- श्रम और विश्राम का संतुलन शरीर को गति देना व्यायाम करना, योगासन करना, जिससे शरीर में जमा विजातिय तत्व का निष्कासन हो सके। शरीर के अंगों को यदि काम नही लिया जाये तो वो धीरे धीरे अशक्त हो जाते है। जोड़ों और संधियों में अकड़न पैदा हो जाती है। मनुष्य की रूचि, आयु शारीरिक दक्षता और समय की उपलब्धता का चुनाव को ध्यान में रखते हुये चयन करना चाहिये।
व्यायाम में नियमितता होना बहुत जरूरी है। व्यायाम से निम्न फायदे होते है:-
1. अशक्त व दुर्बल मांसपेशियों में रक्त का संचार बढ़ने से उसमें जमा विजातिय तत्व (टॉक्सीन) रक्त प्रवाह के साथ शरीर में विभिन्न रूप से (श्वास, पसीना, मल मूल) बाहर निकलते है जिससे मांसपेशियां व जोड़ धीरे धीरे शक्ति प्राप्त करते है।
2. व्यायाम से शरीर में ऑक्सीजन की पूर्ति से कोशिकाओं में स्थित माइटोकोरडिया को बल मिलता है और जीवनी शक्ति का उत्पादन होता है।
3. श्वसन क्रिया में सुधार होता है। फेफड़ों में स्थित कड़े हुये प्रकोष्ठ में लचीलापन आता है और उनकी कार्यक्षमता बढ़ती है। अधिक ऑक्सीजन का अवशोषण होता हे तो उसी अनुपात में शरीर से कार्बन डाई ऑक्साईड भी अधिक बाहर निकलती हे, जिससे शरीर में स्फूर्ति आती हें
4. व्यायाम या श्रम न करने की स्थिति में आहार से प्राप्त अधिक कैलोरी वसा के रूप में जमा हो जाती है जो मोटापे का कारण है। व्यायाम से चर्बी जमा नहीं हो पाती है, अतः शरीर सुडौल व स्वस्थ बनता है।
5. एक ही प्रकार के काम, ज्यादा देर बैठने या शरीर को अधिक आराम देने से संधियों व जोड़ों में अकड़न आ जाती है, वह व्यायाम से दूर होकर शरीर में लचीलापन बढ़ जाता है।
6. नाड़ी संस्थान, मस्तिष्क व सभी संस्थानों की कार्यशीलता उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है।
7. शरीर में स्थित नलिका विहिन ग्रंथियां, जैसे पिट्यूटरी, पिनियल, थॉईराईड आदि की कार्य क्षमता बढ़ती है जिससे शारीरिक स्वास्थ्य के साथ साथ मानसिक व भावनात्मक स्वास्थ्य पर प्रचुर प्रभाव पड़ता है।
आखिर में कुछ शब्द ध्यान पर:-
हमारी चेतना इन्द्रियों द्वारा बाहर दौड़ रही है, उसके भीतर लाना ही ध्यान है। यह स्वयं के विकास की प्रक्रिया है। चैतन्य जो शुद्व निर्मल होता है उन पर संकल्प, विकल्प, विक्षेप आदि कषाय का आवरण बन जाता है, जिससे चित्त में चंचलता बढ़ती है, रागद्वेष,, मोहमाया के जाल में आदमी फंसता रहता है।
ध्यान द्वारा उस चेतना को भीतर लाने का प्रयास किया जाता है जिससे चित्त की चंचलता कम होने लगती हें| शारीरिक मानसिक व भावनात्मक स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है। ध्यान की स्थिति में जब इन्द्रियों को स्थिरता शिथिलता व जागरूकता का अनुभव तन, मन और आत्मा के योग की अनुभूति के साथ परम शांति का अनुभव करवाता है| चित की चंचलता दूर होती है, मस्तिष्क में अल्फा रस निकलने से व्यक्तित्व का विकास होता |
आज पूरा विश्व करोना की बीमारी से ग्रस्त है, ऐसे मे हमारी पुरातन स्वास्थ्य की मान्यताए हमारी प्रतिरोधक क्षमता को अवश्य बढ़ा सकती है|
सुनिता बापना
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