Why does this happen in my society - Part 2 in Hindi Short Stories by Std Maurya books and stories PDF | मेरे समाज में ऐसा क्यों होता हैं - भाग 2

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मेरे समाज में ऐसा क्यों होता हैं - भाग 2

मैं, सत्येंद्र, इस पुस्तक को स्वयं लिख रहा हूँ। मुझे नहीं मालूम कि मेरे विचारों पर लोग कितना विश्वास करेंगे, किंतु मुझे आशा है कि जो भी इस पुस्तक को पढ़ेगा, वह स्वयं सोचने और समाज को समझने का प्रयास अवश्य करेगा।
मैं एक साधारण परिवार से हूँ और वर्तमान में 18 वर्ष का युवा हूँ। आज दिनांक 28 मई से मैंने इस पुस्तक का लेखन प्रारंभ किया है। समाज के बीच होने वाली घटनाओं, चर्चाओं और अनुभवों को शब्दों में व्यक्त करने का प्रयास करता हूँ।
आज के समाज में एक ऐसी प्रवृत्ति विकसित होती दिखाई दे रही है जो लोगों के बीच दूरी और वैमनस्य पैदा कर रही है। इसके प्रमुख कारण धर्म, जाति और आर्थिक असमानता प्रतीत होते हैं। अनेक सामाजिक और राजनीतिक विवाद इन्हीं विषयों के इर्द-गिर्द केंद्रित दिखाई देते हैं।
मेरा मानना है कि राजनीति का उद्देश्य जनता की समस्याओं का समाधान होना चाहिए। गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और जल संकट जैसे विषयों पर अधिक ध्यान दिया जाना आवश्यक है। जब जनता मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करती है, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक क्यों नहीं पहुँच पा रहा है।
मध्य प्रदेश के भोपाल सहित देश के कई क्षेत्रों में गर्मी के दिनों में लोगों को पानी की समस्या का सामना करना पड़ता है। कई स्थानों पर बच्चे और महिलाएँ दूर-दूर से पानी लाने के लिए मजबूर होते हैं। यह स्थिति चिंताजनक है और शासन-प्रशासन तथा समाज दोनों के लिए विचार का विषय है।
यह पुस्तक किसी व्यक्ति विशेष के प्रति घृणा का नहीं, बल्कि समाज और व्यवस्था से जुड़े प्रश्नों को उठाने का प्रयास है। मेरा उद्देश्य पाठकों को सोचने, प्रश्न करने और बेहतर समाज के निर्माण पर विचार करने के लिए प्रेरित करना है न की नफ़रत।

##मेरे समाज में परिवर्तन क्यों नहीं?##

देखा जाए तो आज भी समाज में परिवर्तन की बात तो बहुत होती है, किन्तु व्यवहार में नफ़रत, भेदभाव और संकीर्ण सोच अधिक दिखाई देती है। मैं ऐसे समाज में रहता हूँ जहाँ लोग पत्थरों से बनी मूर्तियों का सम्मान करते हैं, लेकिन कई बार जीवित मनुष्यों के दुःख-दर्द को अनदेखा कर देते हैं। पूजा-पाठ करना गलत नहीं है, परंतु यदि हमारे भीतर करुणा, दया और मानवता नहीं है, तो केवल बाहरी आडंबर समाज को बेहतर नहीं बना सकते।

जब कोई व्यक्ति समाज में बदलाव की बात करता है, तब अक्सर उसे यह कहकर रोक दिया जाता है कि "यह तो सदियों से चलता आ रहा है।" मेरा प्रश्न है कि यदि केवल पुराना होना ही किसी परंपरा को सही साबित करता है, तो फिर इतिहास में चली अनेक कुप्रथाओं का अंत क्यों हुआ? सती प्रथा, दास प्रथा और अनेक सामाजिक बुराइयों को इसलिए समाप्त किया गया क्योंकि समाज ने यह स्वीकार किया कि हर पुरानी बात उचित नहीं होती।

परिवर्तन का अर्थ अपनी संस्कृति को छोड़ देना नहीं है, बल्कि गलतियों को पहचानकर उन्हें सुधारना है। जो समाज प्रश्न पूछना बंद कर देता है, वह धीरे-धीरे ठहराव का शिकार हो जाता है। नई सोच, नए विचार और नए प्रयोग ही समाज को आगे बढ़ाते हैं।

आज भी यदि कोई युवा जोखिम लेकर कुछ नया करना चाहता है, तो उसे अक्सर यह कहकर रोका जाता है कि "तेरे बाप-दादा ने ऐसा नहीं किया।" लेकिन यदि हर पीढ़ी केवल वही करती जो पिछली पीढ़ी ने किया था, तो मानव सभ्यता कभी आगे नहीं बढ़ पाती। न नए आविष्कार होते, न विज्ञान विकसित होता और न ही समाज में सुधार आता।

मेरा मानना है कि परिवर्तन का सबसे बड़ा शत्रु अंधानुकरण है। जब तक लोग स्वयं सोचने, प्रश्न करने और तर्क करने का साहस नहीं करेंगे, तब तक वास्तविक परिवर्तन संभव नहीं होगा। समाज को ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो परंपराओं का सम्मान करें, लेकिन साथ ही यह भी पूछें कि कौन-सी बातें आज भी मानवता और न्याय के अनुरूप हैं और कौन-सी नहीं।


*समाज का निर्माण*
समाज का निर्माण कैसे होता है?
क्या समाज एक व्यक्ति से बनता है, या बहुत से लोगों से?
यह प्रश्न सोचने योग्य है।
मेरा मानना है कि समाज के परिवर्तन की शुरुआत एक व्यक्ति से ही होती है।
आप सोच रहे होंगे कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ।
क्योंकि जब किसी समाज में एक व्यक्ति बुरा कार्य करता है, तो लोग उसके आधार पर पूरे समाज को गलत ठहराने लगते हैं।
उसी प्रकार, यदि एक व्यक्ति स्वयं को सुधारने का संकल्प ले और सही मार्ग पर चले, तो उसका प्रभाव दूसरों पर भी पड़ता है।
धीरे-धीरे अनेक लोग बदलते हैं, और यही परिवर्तन समाज को नई दिशा देता है।
इसलिए समाज को बदलने के लिए सबसे पहले स्वयं को बदलना आवश्यक है।
एक व्यक्ति की अच्छी सोच और अच्छे कर्म ही बेहतर समाज की नींव बनते हैं।

(अभी लिखी जा रही हैं )