मुंबई की सुबह और लोकल ट्रेन की वो भागदौड़। कहने को तो यह शहर कभी सोता नहीं, पर इस शहर की असली रूह इन पटरियों पर ही दौड़ती है।
मैं भी उसी भीड़ का एक हिस्सा था, जो अपनी नौकरी की ओर बढ़ रहा था। पर आज किस्मत अच्छी थी, मुझे लोकल में खिड़की वाली सीट मिल गई थी।
लोकल अपनी पूरी रफ़्तार में थी, बाहर का मंजर—वही जानी-पहचानी मुंबई की इमारतें, झोपड़पट्टियाँ और दूर से दिखता समंदर—सब कुछ एक फिल्म की तरह पीछे छूट रहा था।
मैं अपना सिर खिड़की की लोहे की जाली से टिकाए बस बाहर देख रहा था। कानों में हेडफ़ोन नहीं थे, क्योंकि मुझे उस वक्त लोकल की वो आवाज़ और हवा का वो शोर अपने ख्यालों के साथ बहुत सुकून दे रहा था।
मैं बस अपनी ही दुनिया में खोया हुआ था, यह सोच रहा था कि जिंदगी किस तरह इस लोकल की तरह पटरी पर दौड़ती जा रही है।
बाहर की ठंडी हवा चेहरे से टकरा रही थी और मैं बस उन भागते हुए नज़ारों को एकटक देख रहा था।
उस वक्त मेरे दिमाग में न कोई उलझन थी, न कोई सवाल। बस एक अजीब सा खालीपन था, जो उस सफर में बड़ा प्यारा लग रहा था।
तभी, मेरी गोद में रखे मोबाइल ने एक हल्की सी वाइब्रेशन की।मैंने बेख्याली में फोन उठाया।
स्क्रीन पर इंस्टाग्राम का एक नोटिफिकेशन चमक रहा था। जब मैंने उसे खोला, तो मेरा ध्यान अचानक उन भागते हुए नज़ारों से हटकर उस एक नाम पर अटक गया। वह पहली बार था जब उसने मुझे मैसेज किया था।
उस वक्त, उस शोर मचाती लोकल में, मेरे आस-पास सैकड़ों लोग थे, पर मुझे ऐसा लगा जैसे पूरा डिब्बा खाली हो गया है। मुझे बाहर की आवाज़ें सुनाई देना बंद हो गईं।
मेरी आँखों के सामने सिर्फ वो छोटी सी स्क्रीन थी और उसकी प्रोफाइल से झलकती वो सादगी।
मैंने कभी सोचा नहीं था कि मुंबई की इस भागती हुई लाइफ में, जहाँ किसी के पास रुकने का वक्त नहीं है, कोई अजनबी इस तरह मेरे डिजिटल दरवाजे पर दस्तक देगा।
ट्रेन का अगला स्टेशन आने वाला था, लोग उतरने और चढ़ने की तैयारी में थे, पर मैं... मैं तो जैसे उस एक मैसेज के स्टेशन पर ही ठहर गया था।
मैंने एक बार फिर खिड़की से बाहर देखा और फिर उस मैसेज की तरफ। वह सफर, जो हर रोज एक मजबूरी लगता था, आज अचानक बहुत खूबसूरत लगने लगा।
मैंने अपनी उंगलियां कीबोर्ड पर रखीं, दिल की धड़कन उस लोकल की रफ्तार से भी तेज हो चुकी थी।
मुंबई की लोकल अपनी रफ़्तार में थी। डिब्बे के भीतर लोगों की गहमागहमी थी, पर मेरा पूरा वजूद उस वक्त उस छोटी सी स्क्रीन में सिमट गया था।
जैसे ही मैंने उस नोटिफिकेशन पर क्लिक किया, चैट बॉक्स खुला और सामने लिखे उन चार शब्दों ने जैसे मेरे ख्यालों की दुनिया को एक पल के लिए थाम दिया।
लिखा था— "हाय, कहाँ से हो?"
इतना सा सवाल था, पर उस वक्त ऐसा लगा जैसे किसी ने इस भागते हुए शहर के बीचों-बीच मेरा हाथ थामकर मुझे रोक लिया हो।
मैं बस उस मैसेज को देखता रह गया।दिल में एक अजीब सी सिहरन हुई—हैरानी भी थी और एक अनजानी सी खुशी भी।
मैंने खिड़की से बाहर देखा, लोकल किसी पुल से गुज़र रही थी और नीचे सड़क पर गाड़ियों की कतारें थीं। पर मेरा ध्यान तो अब उस सवाल में उलझ चुका था।
मैंने अपनी धड़कनों को संभाला और कीबोर्ड पर उंगलियाँ घुमाईं। मेरा जवाब बहुत सादा था, पर उसे भेजते वक्त जो अहसास था, वो लफ़्ज़ों से परे था।
मैंने लिखा— "हाय, मैं मुंबई से हूँ। और आप?"'सेंड' दबाते ही मुझे लगा जैसे मैंने कोई पैगाम हवा में छोड़ दिया हो।
अब बारी मेरी थी। मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था—एक ऐसी जिज्ञासा थी जो मुझे उसकी पहचान की तरफ खींच रही थी। मैंने धीरे से उसकी प्रोफाइल पिक्चर पर टैप किया।
जैसे ही उसकी प्रोफाइल खुली, मेरी आँखों के सामने एक नई दुनिया आ गई। मैं एक-एक करके उसकी तस्वीरें देखने लगा। वो कोई मॉडल नहीं थी, पर उसकी सादगी में एक ऐसी कशिश थी जो मुझे बाँध रही थी।
उसकी हँसी, उसकी आँखों में झलकती वो मासूमियत—ऐसा लग रहा था जैसे मैं किसी अजनबी को नहीं, बल्कि किसी ऐसे शख्स को देख रहा हूँ जिसे मैं अरसे से ढूँढ रहा था।
उसकी हर फोटो एक कहानी कह रही थी। मैं उसकी प्रोफाइल को स्क्रॉल करते हुए इतना खो गया कि मुझे पता ही नहीं चला कि कब मेरा स्टेशन करीब आ गया।
उस भीड़भाड़ वाली लोकल में, जहाँ हर कोई एक-दूसरे से अनजान था, मैं किसी के अक्स में खुद को खोता जा रहा था।
वो जो एक अनजान सा रिश्ता इंटरनेट की गलियों से शुरू हुआ था, उस वक्त वो रूहानी लगने लगा। मैंने फोन सीने से लगा लिया और फिर से बाहर की तरफ देखा। अब मुंबई की वो धूल भरी हवा भी मुझे किसी ठंडे झोंके की तरह लग रही थी।
बस इंतज़ार था तो उसके अगले जवाब का, जो शायद मेरी तकदीर का अगला पन्ना लिखने वाला था।
मैं अभी उसकी प्रोफाइल की गहराइयों में उतरा ही था, उसकी सादगी को अपनी नज़रों में उतार ही रहा था कि स्क्रीन पर एक और हलचल हुई। एक और मैसेज ऊपर से गिरा— "कैसे हो? क्या करते हो?"
मेरे होंठों पर एक मुस्कुराहट आने ही वाली थी कि तभी ट्रेन की रफ्तार कम हुई और कानों में गूँजा— "अगला स्टेशन: वाशी"।
मुंबई की लोकल का दस्तूर है, यहाँ मंजिल आने पर आप ठहर नहीं सकते, आपको बस उस भीड़ के रेले के साथ बहना पड़ता है।
मेरा दिल चाह रहा था कि वहीं रुक जाऊं, अभी इसी वक्त उसे बताऊं कि उसे देखकर कैसा लग रहा है, पर हकीकत ने दस्तक दे दी थी।
मैंने एक गहरी सांस ली, धड़कते दिल के साथ मोबाइल को जेब के हवाले किया और उस धक्का-मुक्की के बीच जैसे-तैसे प्लेटफॉर्म पर उतर गया।
वाशी स्टेशन का वो शोर, लोगों की वो भागदौड़, आज सब कुछ बहुत पराया लग रहा था। दिमाग में बस वही दो सवाल घूम रहे थे— "कैसे हो? क्या करते हो?"
मैं अपने ऑफिस की तरफ बढ़ रहा था, पर पैर जैसे भारी हो गए थे। सबसे बड़ी मुश्किल तो अभी आनी बाकी थी। ऑफिस पहुँचते ही वो पुराना नियम—मोबाइल जमा करना।
जब मैंने अपना फोन उस काउंटर पर रखा, तो ऐसा लगा जैसे मैंने अपनी धड़कनें वहीं छोड़ दी हों।
पूरा दिन... वो आठ घंटे मेरे लिए किसी सजा से कम नहीं थे। मैं काम तो कर रहा था, फाइलें देख रहा था, लोगों से बातें कर रहा था, पर मेरा ज़हन उस एक चैट बॉक्स में अटका हुआ था।
हर आधे घंटे में मेरी नज़र घड़ी पर जाती। मन में सौ सवाल उठ रहे थे— "कहीं उसने ये तो नहीं सोचा होगा कि मैं इग्नोर कर रहा हूँ? कहीं वो नाराज़ होकर अपनी आईडी न बंद कर दे? क्या वो मेरा इंतज़ार कर रही होगी?"
वो जो 'मोबाइल यूज़ न करने' की पाबंदी थी, उसने उस दिन उस अजनबी के लिए मेरी बेचेनी को हजार गुना बढ़ा दिया था। मैंने कभी नहीं सोचा था कि किसी के दो मैसेज मुझे इतना बेबस कर देंगे।
भूख तो जैसे मर ही चुकी थी, बस इंतज़ार था तो उस एक घंटे के 'लंच ब्रेक' का।
जैसे ही घड़ी की सुइयां एक पर पहुँची, मैं अपनी सीट से लगभग भागा। खाने की प्लेट हाथ में थी, पर भूख आंखों में नहीं, उस मोबाइल स्क्रीन में थी।
मैंने कांपते हाथों से अपना फोन लिया और उसे ऑन किया। दिल की धड़कन इतनी तेज़ थी कि मुझे अपने कानों में सुनाई दे रही थी।
मैंने लॉग-इन किया, इंस्टाग्राम खोला और उसकी चैट पर जाकर टाइप किया...
"माफी चाहता हूँ, काम के चक्कर में फंस गया था। मैं ठीक हूँ, और मुंबई में एक प्राइवेट जॉब करता हूँ। आपने बताया नहीं, आप कहाँ से हैं?"
जवाब भेजने के बाद मैंने फोन को मेज पर रखा और एक लंबी राहत की सांस ली। वो एक निवाला जो मैंने उसके बाद लिया, उसमें जैसे पूरी दुनिया का स्वाद आ गया था।
वो इंतज़ार की तड़प खत्म हुई थी, पर एक नए सफर की बेचैनी अब शुरू हो चुकी थी।
पाठकों के लिए सवाल:
अयान ने लंच ब्रेक में अपना जवाब तो भेज दिया था, लेकिन क्या वह अजनबी लड़की अयान की इस मजबूरी को समझ पाएगी?
क्या एक डिजिटल 'हाय' से शुरू हुई यह कहानी मुंबई की इस भागती दौड़ती जिंदगी में ठहर पाएगी?”
क्या आपको लगता है कि ऑनलाइन शुरू हुई मोहब्बत, हकीकत के धरातल पर टिक पाती है?
अगर आप अयान की जगह होते और काम के बीच किसी खास का मैसेज आता, तो क्या आप भी ऐसी ही बेचेनी महसूस करते?
क्या वह लड़की अयान के इस 'देर से दिए गए जवाब' को उसकी बेरुखी समझेगी या इंतज़ार का मजा लेगी?
मेरी जिंदगी की आगे की कहानी जानने के लिए बने रहिए पार्ट 2 में