[] बेटा []
-१-
" पांच सौ गज जगह है वो। मैं कहती हूँ कि यहीं कहीं आसपड़ोस में कोई बढ़िया सा कमरा दिला देते। तीस पैंतीस हज़ार से क्या कम चढ़ा हुआ था कि जो अब लाखों की उम्मीद कर बैठें? " निरंजन शर्मा की घरवाली खनक कर बोली। स्वर में अग्नि की भभकती लपटों सी झुलसा देने वाली ऊष्मा थी और उस वक्त निरंजन शर्मा को यूँ लगा जैसे कि वो अभी के अभी सब कुछ भस्म कर देगी।
निरंजन शर्मा ने किंचित अपनी वाणी में मिठास बनाये रखने का प्रयास किया और झट बोले, " पगली, सारे घर के तो मालिक ही वो ही हैं। हम तो सिर्फ किरायेदार की हैसियत से जहाँ टिके हुए हैं। यदि उनके मन में हमें जहाँ से निकालने की कभी मंशा प्रबल हो उठी, तो उसी दिवस समझिए कि पास की हर वक्त चलने वाली सड़क के एक किनारे पर हमारा स्थायी ठिकाना होगा। कुछ समझी कि नहीं? "
" खूब समझ गए! तुम तो रहोगे ना जाने कब तक दूध पीने वाले बच्चे। इस घर रूपी रेलगाड़ी को अनथक खींचने वाला इंजन तुम हो कि तुम्हारे बाप? "
" बस तुम एक नन्हीं सी गुड़िया के जैसे रेलगाड़ियों और इंजनों से खेलना नहीं छोड़ना। पूरी तीस बरस की होने वाली हो और बातें बचकानी सी करना कब छोड़ोगी, रमेश की अम्मा? "
" तुम नादान आदमी के संग मति भिड़ाना, तो मेंढे से सर टकराने जैसा ही है। "
" तो मत टकराओ ना। अच्छा ये बताओ कि मेरा लंच पैक कर दिया ना? आज फिर से ऑफिस के लिए देरी हो गई। मंगत रम फिर से झक्की तोते के जैसे फड़फड़ाएगा। साला, अपनी तीखी चोंच मारने पर अमादा होता है। ऑफिस के सारे काम मैं देखूँ और वो अपनी आरामदेह कुर्सी पर बैठे बैठे सारा दिन सिगरेटें फूंकने के सिवा करता ही क्या है? बाबूजी ठीक ही कहा करते थे कि और पढ़ाई लिखाई कर ले, बच्चे! तेरे लाख काम आएगी। पर मैं भी अपनी अजीबोगरीब सी जिद्द पर ना जाने क्यों अड़ा रहा और बमुश्किल बारहवीं तक ही पहुँच सका। "
" अब क्या होत है, जब चिड़िया चुग गई खेत। "
" तुम तो चुप ही रहो, तो अच्छा है, रमेश की प्यारी सी अम्मा! तुमे तो घोड़ी और निगोड़ी का फेर फार नहीं मालूम। बड़ी आई हो, अक्ल के पेंच कसने वाली! "
" मैंने आपका लंच पैक कर दिया है। वक्त पर खा लेना। फाइलों के नीचे एक गधे के जैसे दबे ना रह जाना। "
निरंजन शर्मा प्रत्युत्तर में कुछ भी नहीं बोला और लंच और स्कूटी की चाबी लेकर घर की सीढ़ियों से नीचे उतर गया।
उसकी पुरज़ोर हंसी साफ़ साफ़ उसके कानों में पड़ रही थी। पर वह कुछ बोला नहीं। वो सुबह सबेरे अपना मत्था खराब नहीं करना चाहता था।
उसके पांवों में जैसे फिर से जान आ गई हो। पैंतालीस बरस की ढलती उम्र में भी वो नवयुवकों सा सोपानों पर से कदम दर कदम उठाने के साथ ही नीचे की ओर दौड़ा जाता था।
उसका रोजमर्रा के मामुरों में से एक खासमखास था कि सुबह शाम अपने पिता से मुलाक़ात करना। और वो वह बिना नागे करता था।
और जहाँ तक बात उसकी औरत की तरफ आती थी, वो तो चाहती थी कि उसका पति अपने बाप से सारे , इतने बड़े , दिन में एक बार भी मिलने ना जाता।
निरंजन शर्मा सौ में से निन्यानवे प्रतिशत बातें अपनी प्राण प्यारी, निष्ठा शर्मा! रमेश की अम्मा, की मानता था, लेकिन एक यही बात वो कभी भी मानने को तत्पर नहीं हुआ कि अपने पिता से नहीं मिले। वो हर रोज अपने पिता से मिलने जाता और डंके की चोट पर जाता।
तो फिर वो अपने पिता से न्यारा क्यों हो गया? वो इसलिए कि उसमें उसकी जोरू और उसके परम पूज्य पिता श्री, दोनों, की मर्जी थी। निरंजन शर्मा को तो अपनी जिह्वा से हस्ताक्षर करने थे और वो उसने कर दिए थे।
चक्की के दो पाटन के बीच में साबुत ही ससुरा कौन बचता है। पिता की भी बात को भी स्वीकृति दी और गृहिणी की भी।
फिर भी खुशियाँ इक़ट्ठी करना भारी भरकम जोखिम भरा कार्य बना रहा।
जिस ओर भी निरंजन शर्मा जाता, उसी ओर का शिकायतों भरा पिटारा खुल जाता। तरह तरह के तानें उपालंभ वो अलग से।
उस दिन तो पिता के चढ़े पारे की कोई सीमा ही नहीं रही थी। उनके क्रोध ने सभी सीमाओं को लांघ लिया था। गाली देकर बोले, " निरंजन बेटा, तू सिर्फ अपनी जोरू की गुलामी ही सही ढंग से कर ले, इतना ही समझ तूने गंगा नहा ली। हमारी हम पर छोड़ दो। दिन में एक दो दफा आता भी है, तो छूटते ही बोलेगा बाबूजी चलता हूँ। वो नाराज होगी। चुतिया बनने और बनाने में तू अब तो बड़ा ही सिद्धहस्त हो गया है। अब आगे की ट्रेनिंग पोस्टपोन कर दो। नहीं तो कुछ अधिकाधिक अतिश्योक्ति वाली बात सी हो जाएगी। "
" बाबूजी, अब मुझसे कौन सा बड़ा संगीन जुर्म हो गया है कि ऐसे दुर्व्यवहार करते हो? "
" हमारा मुंह मत खुलवाओ! तुम कैसे श्रवण कुमार बेटे हो, किससे भला छिपा है? "
" क्षमा प्रार्थी हूँ। अब से समय अधिक आपकी सेवा में लगा करेगा। बहादुर कहीं नज़र नहीं आ रहा? क्या आपने कोई सामान लेने बाजार भेजा है? "
" भाई, ये साला नौकर भी तूने जी का जंजाल ही रख छोड़ा है। सारे यूँ ही पागल सा डोलता फिरता है। शायद नशा वशा करता है। और बातों का मानों पिटारा ही है। यूँ बोलना शुरू होता है कि घड़ी की सुइयों के जैसे बराबर ही खनकता रहता है। "
" तो अच्छा है ना। आपका दिल लगाए रखता है। "
" तू भी अच्छा, तेरी जोरू भी अच्छी और ये हरामखोर भी अच्छा। बुरे तो सिर्फ हम ही हैं। "
" अच्छा बाबूजी, चलता हूँ। ऑफिस के लिए बहुत लेट हो गया। "
अपने पिता के चरणों को स्पर्श करने के साथ ही निरंजन शर्मा उनके कमरे से बाहर निकल आया। बाहर खुले में आकर उसके बेचैन दिल को बहुत सुकून मिला।
घर की कारागार से निकले एक कैदी की तरह वो भी एक अजीबोगरीब तरह के अलभ्य सुख की अनुभूति से सराबोर हो गया था।
-२-
और जब वह पुनः घर वापिस लौटा, तो बाबूजी गहरी नींद का आनंद ले रहे थे और बहादुर फोन पर किसी से बातचीत करने में निरत था और अपनी नेपाली भाषा में क्या कुछ कहकर जोर जोर के ठहाके लगा लगा कर खूब हंसता।
पहले तो वह उसे कुछ कहने के निमित्त उसकी ओर आने को हुआ, परंतु कुछ सोचकर वापिस लौट गया। उस वक्त उसकी सोच को जरूरत से कुछ ज्यादा ही पंख लग गए थे। वो चुपचाप से अपने कमरे में एक कुर्सी पर आकर बैठ गया। यूँ उस तरह जैसे कि चोर पकड़े जाने पर हो जाता है।
उसके मुंह को उस तरह से लटके हुए देखकर उसकी घरवाली किंचित घबरा गई और बड़े ही प्रेमपूर्वक बोली, " शरबत बनाऊँ? आज बड़ी गर्मी हो गई है। पेड़ों की डालियों के पत्ते तक नहीं हिल डुल रहे। लगता है बारिश आने को है! "
वह प्रत्युत्तर में कुछ नहीं बोला, निस्तब्ध ही बना रहा। गृहिणी शरबत बना लाई। दोनों ने पिया। दोनों बच्चे सो चुके थे।
दंपत्ति के बीच एक दमघोंटू सी निस्तब्धता कुछ देर के लिए ठहर सी गई थी। उन दोनों में से कोई भी पहल करने के लिए तत्पर नहीं था कि उस ख़ामोशी को तोड़ने की कोशिश करते।
आखिरकार थक हार कर घरवाली ने ही पहल की और फिर से बहुत ही प्रेमपूर्वक बोली, " जी, मैं सोच रही थी कि? "
" अब क्या सोच रही हो? " निरंजन शर्मा की आंखें आश्चर्य से फट सी गईं।
" यही कि पिता जी को अपने पास ही लिबा लाइए! अकेले कहाँ लगता होगा उनका मन? "
" क्या? ये तुम कह रही हो? मैं कोई सपना तो नहीं देख रहा हूँ। "
निरंजन शर्मा ने अपने गाल पर चिकोटी काटने के साथ ही कहा।
" जी, ये मैं ही कह रही हूँ। माँ मेरे सपने में आई थी और ये सब अक्ल उन्होंने ही मुझे दी। सच भी तो। बुढ़ापे में अपने भी पराये हो जातें हैं। अपना साया तक भी साथ छोड़ता नज़र आता है। "
कहते कहते निष्ठा की आंखों में आंसुओं की बाढ़ आ गई और कंठ सिसकियों से भर गया। वह अहसास अनोखा था। अद्भुत था। मानों चिड़िया को अपने नन्हें नवजात शिशुओं को देखकर चहचहाना आया हो। अपनेपन का अहसास बहुत ठोस और घनत्व हो चुका था।
निरंजन शर्मा का भी कंठ सूखने लगा और उसकी आंखों में आंसुओं की अविरल धाराएँ फूट पड़ी। एक शब्द भी मुंह से नहीं निकाल सका ।
-३-
उस रात निरंजन शर्मा को अपनी पहली सी पत्नी मिली थी। वह बहुत खुश था।
दोनों आपसी बातचीत में निरत थे कि एकाएक उन्हें यूँ लगा जैसे कि बाबूजी दर्द से चीत्कारें हों।
एक क्षण के अवसान के पहले ही अपने घर की अनगिनत सी प्रतीत होने वाली सारी सीढ़ियों को लांघने के साथ ही जब निरंजन शर्मा बाबूजी के कमरे तक पहुंचने ही वाला था कि कोई व्यक्ति उससे टकराया और वो गिरते गिरते संभला और जब उसने उस शख़्स का चेहरा देखा, तो वो हैरान परेशान हो गया। वह कोई और नहीं, बल्कि बहादुर ही था।
इसके पहले कि वो कुछ बोलता, बहादुर अविलंब बोला, " साब, आफ बाबूजी को संभालिए। मैं उस लड़की को पकड़ने जा रहा हूँ, जिसने बाबूजी पर हमला किया है। "
और सुअवसर पाने के साथ ही बहादुर भी उस लड़की के साथ ही खिसक गया।