Rebirth of a Bench - Index in Hindi Comedy stories by Amardeep Kumar books and stories PDF | Rebirth of a Bench - Index

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Rebirth of a Bench - Index

चैप्टर 0: मैं, सतोशी नाकामोतो, और एक लकड़ी का फलसफ़ा
चारों तरफ घना अँधेरा।
मैं एक अजीब सी जगह पर था। मैंने अपने हाथों को देखने की कोशिश की, पर वहाँ कुछ था ही नहीं, सिर्फ घुप्प अँधेरा।
"मैं कहाँ हूँ? ये कौन सी जगह है? और मुझे इस तरह घसीट कर कहाँ ले जाया जा रहा है?"
मैं चिल्लाना चाहता था, पर मेरी आवाज़ मेरे गले से बाहर ही नहीं आ रही थी। मैंने अपना सिर हिलाने की कोशिश की, अपने हाथ-पैर चलाने चाहे, पर सब बेकार। मेरा शरीर जैसे पत्थर का बन चुका था। या शायद पत्थर से भी ज़्यादा सख्त किसी चीज़ का।
"कहीं मुझे स्लीप पैरालिसिस तो नहीं हो गया?" मैंने सोचा। मैं अपना वजूद, अपनी साँसें—कुछ भी महसूस नहीं कर पा रहा था। पक्का, ये स्लीप पैरालिसिस ही है। पर ये लोग... ये जो मुझे उठाये हुए हैं, इनकी आवाज़ें इतनी असली क्यों लग रही हैं?
तभी मुझे एक भारी आवाज़ सुनाई दी।
"तुम्हें पता है ना कि आज मज़दूर दिवस (Labor Day) है?"
दूसरी आवाज़ ने हाँफते हुए जवाब दिया, "हाँ, पता है। लेकिन क्या करें भाई? इस छुट्टी से हमारा पेट थोड़ी भरने वाला है। काम तो करना ही पड़ेगा।"
कुछ सेकंड की खामोशी के बाद पहली आवाज़ फिर गूँजी, "अरे बाप रे! भाई, ये इतनी भारी क्यों है? कम से कम 120 किलो की होगी!"
*एक सौ बीस किलो?* मैं दिमाग में चीखा। *पागल हो गए हो क्या? मैं तो सिर्फ 65 किलो का हूँ! और तुम दो लोग मिलकर मुझे उठा नहीं पा रहे?*
दूसरी आवाज़ ने कहा, "पता नहीं कौनसी लकड़ी की बनी है। लगता है किसी ख़ास किस्म की सागौन (Teak) लकड़ी है। छोड़ो यार, हमें इससे क्या, बस अंदर पहुँचा देते हैं।"
*लकड़ी? मैं लकड़ी का बना हूँ?* मेरा दिमाग घूमने लगा। ये कैसा मज़ाक था?
हम चलते हुए किसी बड़ी सी बिल्डिंग के पास पहुँचे। आस-पास की आवाज़ों से लग रहा था जैसे ये कोई स्कूल या कॉलेज का कैंपस हो। तभी दूसरी तरफ से एक शिक्षक (Teacher) आते हुए दिखाई दिए। उनके साथ एक स्टूडेंट भी था।
"अरे, ये तो बिल्कुल नई जैसी लग रही है," टीचर ने मुझे देखते हुए कहा, "वैसे इसे कहाँ पर रखना है?"
टीचर ने फिर उन्होंने मज़दूरों को निर्देश देते हुए कहा, "एक काम करो, इसे ऊपर हॉल नंबर 304 में ले जाओ और खिड़की के पास वाली तीसरी लाइन में रखवा दो।"
 मज़दूर ने जल्दी से सिर हिलाते हुए कहा, "जी सर, हम अभी इसे वहाँ पहुँचा देते हैं।"
मज़दूरों ने मुझे थोड़ा घुमाया। सूरज की रौशनी सीधे कॉरिडोर के एक बड़े से काँच पर पड़ रही थी, बिल्कुल किसी सिनेमैटिक फिल्म के सीन की तरह, जहाँ रौशनी और धूल के कण हवा में तैरते हुए दिखते हैं। उस चमकते हुए काँच में मेरी नज़र खुद पर पड़ी।
मेरा पूरा शरीर सुन्न पड़ गया। मैं वहाँ था। चार लोहे के पाये, एक मोटी लकड़ी की सीट, और एक बैकरेस्ट।
*मैं... एक बेंच हूँ?!*
**[बैकग्राउंड में एक खतरनाक, रोंगटे खड़े कर देने वाला एनिमे (Anime) इंट्रो म्यूज़िक बजता है: डम-डम-डम!]**
हाँ। आपने सही सुना। मैं एक बेंच हूँ।
चलिए, पहले मैं अपना परिचय दे दूँ। मेरा नाम है सतोशी नाकामोतो। हाँ, मुझे पता है आप क्या सोच रहे हैं—बिटकॉइन वाला। नहीं भाई, मैं किसी क्रिप्टोकरेंसी का मालिक नहीं हूँ। लेकिन नाम रखने में क्या बुराई है? सुनकर थोड़ा वज़न लगता है, है ना? ख़ैर, मेरा असली नाम अब मायने नहीं रखता, क्योंकि अब मेरी पहचान सिर्फ 'क्लासरूम की तीसरी लाइन का बेंच' बनकर रह गई है।
आज लगता है स्कूल में छुट्टी है। कोई बच्चा नज़र नहीं आ रहा। वैसे आज मज़दूर दिवस है ना, इसलिए। लेकिन अब मैं करूँगा क्या? अकेला। चुपचाप। क्या मैं ध्यान मुद्रा में बैठ जाऊँ? अगर मैं यहाँ बैठे-बैठे 'बुद्धत्व' (Enlightenment) प्राप्त कर भी लूँ, तो क्या फ़ायदा? एक बेंच को मोक्ष मिलकर भी क्या मिलेगा? मेरी पूरी ज़िंदगी ऐसे ही कटने वाली है। लकड़ी जल्दी सड़ती थोड़ी है। सालों तक मुझे इन्हीं चार दीवारों के बीच सड़ना होगा।
मुझे बहुत दुख हो रहा है। और सबसे बड़ा दुख ये है कि इस ग़म में मेरा साथ देने वाला कोई नहीं है। ताजमहल जैसी जगह होता तो किसी से दो बातें कर लेता, यहाँ इस सूने स्कूल में कौन है?
ख़ैर, कोई आएगा। कोई तो मेरे ऊपर बैठेगा।
*रुक जाओ।* मेरे ऊपर बैठने वाला कौन होगा? लड़के? *नहीं, नहीं, नहीं।* कृपया लड़के नहीं। अगर लड़कियाँ बैठें तो बेहतर है...
*छी, सतोशी! तू एक बेंच होकर क्या सोच रहा है!* मैं अपनी ही सोच पर बुरी तरह शर्मा गया। अगर मेरे चेहरे पर ख़ून होता, तो पक्का लाल हो चुका होता।
मैंने खुद को शांत किया और अपनी इस स्थिति का साइंटिफिक विश्लेषण (Analysis) करने की कोशिश की। मुझे अपने पिछले जन्म की ज़्यादा बातें तो याद नहीं हैं, बस कुछ धुंधली यादें हैं। मैं एक लड़का था, उम्र क्या थी पता नहीं। पर हाँ, मुझे इतना याद है कि मेरी स्कूल की ज़िंदगी बिल्कुल अच्छी नहीं गई थी। और जवानी? वो भी किसी ट्रेजेडी से कम नहीं थी, जब भी याद करता हूँ तो बहुत ही बुरी और अजीब चीज़ें याद आती हैं।
पर रुको... ये स्कूल... आस-पास का ये स्ट्रक्चर... मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि मैं इस स्कूल को जानता हूँ? मेरे अंदर इसे पहचानने का जो एहसास है, उसकी कोई तो ठोस वजह होगी।
अगर मेरा 'पुनर्जन्म' हुआ है, तो इसका मतलब मेरे पास सुपर पावर्स होनी चाहिए थीं! सिस्टम विंडो, मैजिक स्किल्स, ओवरपावरिंग ऑरा... कुछ तो होना चाहिए था!
पर तभी मुझे एक कड़वी सच्चाई याद आई। ये सब तो जापानी इसेकाई (Isekai) कहानियों में होता है। मेरा राइटर तो एक इंडियन है! सारा मूड खराब कर दिया।
लेकिन एक मिनट... मैं शून्यता में हूँ, पर मेरे पास सोचने-समझने की शक्ति है। और रुको... मैं उस काँच में खुद को कैसे देख पा रहा था? लकड़ी की आँखें तो होती नहीं! इसका मतलब इस इंडियन राइटर ने मुझे कम से कम 'देखने' और 'सुनने' की शक्ति तो दे दी है। चलो, शुक्र है! अंधा और बहरा बेंच बनने से तो अच्छा ही है। कम से कम इतनी कृपा तो कर दी इस राइटर ने मुझ पर।
सोचते-सोचते दिन ढल गया। सूरज डूब चुका था और स्कूल के इस खाली कमरे में अँधेरा छाने लगा था।
रात। सुनसान स्कूल।
मुझे डर लगने लगा। *कहीं यहाँ भूत-वूत तो नहीं आते?*
"खड़क्क..."
मेरा ध्यान अचानक टूटा। कमरे के उस कोने से एक आवाज़ आई थी।
सन्नाटा और गहरा हो गया। मेरी लकड़ी की नसें (Grains) डर से सिकुड़ने लगीं। वहाँ अँधेरे में कोई था। और मैं... मैं अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हिल सकता था।
अब मुझे बस सुबह होने का इंतज़ार था। अगर मैं सुबह तक ज़िंदा बचा, तो।