चैप्टर 1: सपने, जूते और मेरा जेंडर क्राइसिस
सब कुछ कितना अजीब था।
मैं वापस स्कूल में आ चुका था — और यहाँ भी एक बेंच के रूप में ही था। तभी क्लासरूम का दरवाज़ा खुला और कई सारे बच्चे अंदर भागते हुए आए। वो सब अपनी-अपनी जगह बैठने लगे, लेकिन मुझे किसी का भी चेहरा साफ़ नहीं दिख रहा था। सब धुँधला था। चारों तरफ बच्चों के बात करने और चिल्लाने की आवाज़ें गूँज रही थीं। शोर इतना था कि मेरी लकड़ी की नसें फटी जा रही थीं।
तभी एक लड़का मेरे ऊपर आकर बैठ गया। मैं उसका चेहरा देखना चाहता था, पर मेरा पूरा वजूद एक जगह जमा हुआ था — हिलना तो दूर, झाँकना भी नामुमकिन था। उसने चुपचाप अपने बैग से कॉपी निकाली और पढ़ना शुरू कर दिया।
अचानक क्लास में सन्नाटा छा गया। टीचर अंदर आ चुके थे।
"सब लोग शांत हो जाओ!" टीचर की कड़क आवाज़ गूँजी।
अटेंडेंस शुरू हुई।
"रोल नंबर वन... रोल नंबर थ्री... रोल नंबर थर्टीन..."
और तभी, जो लड़का मेरे ऊपर बैठा था, उसने अपना हाथ उठाया। "रोल नंबर ट्वेंटी-वन, प्रेज़ेंट सर!"
रुक जाओ! यह आवाज़ तो कुछ पहचानी सी लग रही है। मुझे कुछ बच्चों की आवाज़ें और यह कमरा जाना-पहचाना क्यों लग रहा है? क्या मैं इस स्कूल को जानता हूँ?
तभी अचानक मेरी नींद टूट गई।
पता नहीं कब — रात के डर से थके इस बेंच को नींद आ गई थी। उस 'खड़क्क' वाली आवाज़ के बाद भी।
सामने सुबह की किरणें पड़ रही थीं। मैं असल दुनिया में वापस आ चुका था। मेरे नीचे से कोई झाड़ू लगा रहा था। वह स्कूल का सफाई कर्मचारी था। उसने झाड़ू लगाते-लगाते अपना हाथ मेरे ऊपर रखा।
"हम्म... नई बेंच है। इसके ऊपर अभी तक किसी ने अपना नाम नहीं खोदा है। ठीक है..." उसने खुद से कहा।
लेकिन तभी उसने जो किया, उससे मेरी आत्मा — अगर लकड़ी की कोई आत्मा होती है — काँप उठी। वह आलस मिटाने के लिए सीधा मेरे ऊपर लेट गया!
हट जा! मेरे ऊपर से हट जा बेवकूफ़! मैं अंदर ही अंदर चीख रहा था। अगर मुझे इस तरह से किसी ने देख लिया तो मेरी क्या इज़्ज़त रह जाएगी? गनीमत रही कि कुछ सेकंड बाद वह उठा और झाड़ू लेकर चला गया।
"मेरी तो लकड़ी ही फट गई थी डर के मारे!" मैंने चैन की साँस ली।
लेकिन एक मिनट... वो सपना कैसा था? बहुत ही अजीब सपना था। और सबसे बड़ा सवाल — मैं सपना कैसे देख सकता हूँ? मैं तो एक बेंच हूँ! इसका मतलब है कि मेरे अंदर 'चेतना' (Consciousness) है और मैं सो भी सकता हूँ।
चलो, एक बात तो अच्छी है कि राइटर ने मुझे सपने देखने की आज़ादी दी है। लेकिन मुझे मेरे past के सपने क्यों दिखा रहा है? मुझे कोई OP जादुई ताकत देने के बजाय ये मुझे मेरे अजीब से past के flashback क्यों दिखा रहा है? मुझे जापानी राइटर के पास जाना है यार! मुझे अपने past के बारे में कुछ याद नहीं, बस इतना याद आ रहा है कि मैं शायद इसी क्लास में था। पर मैं था कौन?
तभी मेरे ख्यालों की ट्रेन पटरी से उतर गई। क्लास का दरवाज़ा खुला और कुछ बच्चे अंदर आए। आते ही उन्होंने अपने भारी बैग धड़ाम से मेरे ऊपर पटक दिए।
"अरे भाई, आराम से! अभी नया-नया पैदा हुआ हूँ मैं!"
तभी एक और बच्चा आया और सीधे जूतों समेत मेरे ऊपर चढ़कर पीछे वाली सीट पर जाने लगा।
अबे बेवकूफ़! तुझे पता नहीं है कि इसी वजह से बेंच टूटते हैं? मुझे लगा था कि कम से कम कोई तमीज़ वाला बच्चा बैठेगा!
मुझे पता चला कि आज Class 11 में new admission वाले बच्चों का पहला दिन था। यानी सब नए चेहरे। धीरे-धीरे क्लास भरने लगी।
तभी मेरे आस-पास कुछ लड़कियाँ आकर खड़ी हो गईं।
अरे वाह! लड़कियाँ? मैं थोड़ा excited हुआ।
रुक जाओ सतोशी... ये तो बच्चियाँ हैं! मेरा ज़मीर मुझे धिक्कारने लगा। अगर मैंने ऐसी कोई भी 'गलत' सोच रखी, तो ये बहुत ही घटिया बात होगी!
लेकिन फिर मेरे शातिर दिमाग ने एक logic निकाला: क्या फर्क पड़ता है? मेरी कोई उम्र थोड़ी है। मैं भी तो अभी-अभी पैदा हुआ हूँ — factory से एकदम fresh! तो technically हम हमउम्र ही तो हुए?
ऑडियंस, मुझे माफ़ करना। आप सोच रहे होंगे कि मैं ऐसा react क्यों कर रहा हूँ। लड़कों और लड़कियों में भेदभाव क्यों? क्योंकि भाई, मैं अंदर से एक 'male gender' हूँ। मेरी मानसिक आवाज़ भी मर्दाने वाली ही है! अब अगर कोई लड़का मेरे ऊपर बैठेगा तो अजीब तो लगेगा ही ना!
लेकिन नहीं, अगर मैं ऐसे ही सोचता रहा तो लोग मुझ पर 'दरिंदा बेंच' वाले memes बनाने लगेंगे। नहीं, नहीं! मैं दरिंदा नहीं हूँ। मैं एक शरीफ लकड़ी हूँ!
तभी टीचर क्लास में आए। लंबे, कड़क, और ऐसी नज़र जिससे लग रहा था कि ये पूरी ज़िंदगी बच्चों को डराते आए हैं।
"अरे बेवकूफों, यह किस तरह से बैठे हो तुम सब? चलो, लड़के इस तरफ बैठेंगे और लड़कियाँ उस तरफ!" टीचर ने निर्देश दिया।
और किस्मत देखो! जिस तरफ लड़कियों को बैठना था, मैं उसी लाइन में था!
राइटर साहब ज़िंदाबाद! मैंने मन ही मन सलाम ठोका। राइटर साहब, मेरे साथ ऐसे ही इंसाफ करते रहना — मैं तुम्हारे साथ हूँ!
अब मेरी सीट पर किसी के बैठने की बारी थी। एक लड़की मेरी तरफ बढ़ी।
आ जाओ...
लेकिन जैसे ही वह मेरे पास आई, मेरे होश उड़ गए। वह क्लास की सबसे लंबी और हट्टी-कट्टी लड़की थी। उसने जैसे ही मेरे ऊपर आधा वज़न डाला, मेरी लकड़ी की नसें चटकने लगीं।
अरे नहीं! अरे नहीं! ये तो बहुत ज़्यादा वज़न है! मैं टूट जाऊँगा! भगवान के लिए मेरे ऊपर मत बैठो!
शायद भगवान — या मेरे राइटर — ने मेरी सुन ली।
"रुको!" टीचर की आवाज़ आई।
हाँ टीचर जी, बोलिए! इसे रोकिए!
"तुम बहुत ज़्यादा लंबी हो। अगर तुम आगे बैठोगी तो पीछे बैठने वाली बच्चियों को blackboard देखने में दिक्कत आएगी। तुम पीछे जाकर बैठो। और तुम... हाँ, तुम आगे आ जाओ।" टीचर ने एक सामान्य कद की बच्ची को आगे भेज दिया।
"जान में जान आई..." मैंने एक गहरी साँस छोड़ी — बिना फेफड़ों के।
अब तीन लड़कियाँ आईं और मेरे ऊपर बैठ गईं।
तीन?! मेरे दिमाग का calculator अचानक हरकत में आ गया। एक बेंच पर तीन लड़कियाँ? यानी तीन बैग, तीन कोहनियाँ, और तीन अलग-अलग तरीके से बैठने की style। भगवान, मेरी लकड़ी को ताकत देना।
पहली लड़की बिल्कुल किनारे पर बैठी — इतने किनारे पर कि लग रहा था अभी गिर जाएगी। दूसरी बीच में ऐसे फैल कर बैठी जैसे पूरा बेंच उसी का हो। और तीसरी... तीसरी ने अपनी कोहनी सीधे मेरी सबसे कमज़ोर जगह पर टिका दी।
अरे! अरे! वहाँ नहीं! वो जगह पहले से थोड़ी कमज़ोर है!
पर किसी को क्या पता। मैं बोल नहीं सकता। चिल्ला नहीं सकता। बस सहना था — और मैं सहता रहा।
यही है मेरी ज़िंदगी। एक खामोश गवाह। एक बेज़बान बेंच।
अब क्लास सेटल हो चुकी थी। पढ़ाई शुरू होने वाली थी, और मेरा पहला दिन एक बेंच के रूप में अभी बस शुरू ही हुआ था।
लेकिन वो सपना... वो रोल नंबर 21... वो पहचानी सी आवाज़।
मैं कौन था?
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