** केंट रोड का कमरा नंबर 3
:** कुछ अधूरी कहानियाँ कभी पीछा नहीं छोड़तीं।
## **अध्याय 1: पुराना ठिकाना और नई शुरुआत**
अमित ने भारी सूटकेस को जमीन पर रखा और गहरी सांस ली। कमरा छोटा था, लेकिन उसकी खिड़की से बाहर का नजारा सीधे गुलमोहर के उस पेड़ पर खुलता था, जिसके पत्ते इस वक्त हल्के लाल और पीले हो रहे थे। एक लेखक के लिए, यह शहर की भाग-दौड़ से दूर एक परफेक्ट कोना था।
पिछले छह महीनों से अमित के जीवन में कुछ भी सही नहीं चल रहा था। उसकी पिछली किताब बुरी तरह फ्लॉप हो चुकी थी, पब्लिशर के लगातार फोन आ रहे थे, और सबसे बड़ी मुसीबत थी
—'राइटर्स ब्लॉक'। उसके दिमाग में कहानियों के विचार आना जैसे पूरी तरह बंद हो चुके थे। इसी खालीपन से भागने के लिए उसने केंट रोड का यह पुराना मकान किराए पर लिया था।
मकान मालिक, एक बुजुर्ग सज्जन थे, जिन्होंने चाबी देते वक्त अजीब सी चेतावनी दी थी:
> *"बेटा, इस कमरे में रहना है तो रहो, लेकिन स्टोर रूम में रखी उस पुरानी लकड़ी की मेज को मत छूना। वह पिछले पैंतीस सालों से वहीं बंद है, और उसे बंद ही रहने देना।"*
>
अमित ने उस वक्त उनकी बात को हंसकर टाल दिया था। आखिर एक पुरानी मेज एक लेखक का क्या बिगाड़ सकती थी?
रात के करीब ग्यारह बज रहे थे। बाहर तेज बारिश शुरू हो चुकी थी और बादलों की गड़गड़ाहट से कमरा गूंज रहा था। अमित बेड पर लेटा हुआ लैपटॉप पर कुछ लिखने की कोशिश कर रहा था,
लेकिन कर्सर बस स्क्रीन पर ब्लिंक (blink) कर रहा था। खाली पन्ना उसे चिढ़ा रहा था।
झल्लाहट में आकर वह उठ खड़ा हुआ। अचानक उसका ध्यान कमरे के कोने में मौजूद छोटे से स्टोर रूम के दरवाजे पर गया। दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं था, हवा के झोंके से वह धीरे-धीरे हिल रहा था।
अमित के कदम अपने आप उस तरफ बढ़ गए। उसने जैसे ही मोबाइल की फ्लैशलाइट ऑन की, धूल से ढकी वह पुरानी लकड़ी की मेज उसके सामने थी। मेज के ठीक बीचों-बीच एक बहुत ही खूबसूरत, कांच की दवात (स्याही की बोतल) रखी थी, जिसके अंदर की गहरे नीले रंग की स्याही आज भी सूखी नहीं थी। उसके पास ही एक पुराना फाउंटेन पेन और एक कोरा कागज रखा था।
"जब मकान मालिक ने मना किया है, तो मुझे इसे नहीं छूना चाहिए," अमित के दिमाग ने कहा।
लेकिन एक लेखक का कौतूहल उसके डर पर भारी पड़ गया।
अमित ने पेन उठाया, उसे उस नीली स्याही में डुबोया और मजाक-मजाक में कोरे कागज पर लिखा— *"क्या यहाँ कोई है?"*
उसने पेन वापस रखा और मुड़कर जाने ही वाला था कि तभी कमरे की बत्ती गुल हो गई। पूरा कमरा घने अंधेरे में डूब गया। अमित ने घबराकर अपने फोन की फ्लैशलाइट वापस मेज पर चमकाई। जो नजारा उसने देखा, उससे उसकी रीढ़ की हड्डी में एक ठंडी सिहरन दौड़ गई।
कागज पर अमित की लिखावट के ठीक नीचे, एकदम अलग और सुंदर लिखावट में एक नया वाक्य उभर रहा था... जैसे कोई अदृश्य हाथ उस पेन को चला रहा हो।
वहां लिखा था:
> **"हाँ अमित, मैं पैंतीस साल से तुम्हारी ही राह देख रहा हूँ।"**
>
अमित की सांसें थम गईं। खिड़की से आई तेज हवा के झोंके से वह कोरा कागज हवा में फड़फड़ाने लगा।
**[अध्याय 1 समाप्त]**