Principal in the form of Banyan Tree – Prof. Dr. Bimal Kumar Mishra in Hindi Moral Stories by Raunak books and stories PDF | वट वृक्ष रूपी प्राचार्य- प्रो डॉ बिमल कुमार मिश्र

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वट वृक्ष रूपी प्राचार्य- प्रो डॉ बिमल कुमार मिश्र



आदर्श महा० राजधनवार के प्राचार्य प्रो० डॉ. विमल मिश्र के व्यक्तित्व पर एक विद्यार्थी की आत्मीय अभिव्यक्ति

कबीर दास जी की एक पंक्ति से मैं अपनी बात आरंभ करना चाहता हूँ -“सतगुरु शब्द कमान ले, वाहन लागे तीर।
एक जो बाहिर प्रीति सो, भीतर बिन गया शरीर॥”
अर्थात सद्गुरु ने शब्द रूपी धनुष से आत्मज्ञान का बाण चलाया। वह प्रेम से चला हुआ ऐसा तीर था, जो शरीर के भीतर तक प्रवेश कर गया। 
कभी-कभी कुछ बातें सामने से पाना बहुत कठिन होता है, पर वही भावनाएँ जब शब्दों का सहारा पाती हैं तो सहज रूप से कागज़ पर उतर आती हैं। भावनाओं को पूरी तरह लिपिबद्ध करना संभव नहीं होता, फिर भी भावनाएँ अंततः भावनाएँ ही होती हैं।

जब मैं परम आदरणीय डॉ. अमरनाथ सर, मुख्य संपादक वर्ल्ड विजन न्यूज से जुड़ा तो मुझे लेखन के माध्यम से बहुत सी ऐसी बातें कहने का अवसर मिला जिन्हें शायद मैं सीधे कभी व्यक्त नहीं कर पाता। आज उसी श्रृंखला में कुछ भावनाएं व्यक्त करने का प्रयास कर रहा हूँ ।

वर्ष 2022 तक आदर्श महाविद्यालय राजधनवार अपने अस्तित्व के साथ तो था, पर उसमें वह जीवंतता और आकर्षण नहीं दिखता था जिसकी अपेक्षा किसी महाविद्यालय से की जाती है। ऐसा लगता था मानो वर्षों की वातावरण पर जम गई हो। विद्यार्थियों का रुझान महाविद्यालय की ओर बहुत कम था। आसपास के गाँवों के लोग बस इतना जानते थे कि क्षेत्र का एकमात्र ग्रामीण महाविद्यालय यही है।

किन्तु वर्ष 2022 में जब प्रख्यात गणितज्ञ और विद्वान प्रोफेसर डॉ. विमल मिश्र सर जी का आगमन महाविद्यालय में हुआ, तब मानो किसी शांत तड़ाग में जलज खिल उठा हो। धीरे-धीरे महाविद्यालय का सर्वांगीण विकास दिखाई देने लगा। यह परिवर्तन भवन.. दृष्टि और वातावरण में स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होने लगा ।

महाविद्यालय को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने लगी। आधारभूत संरचनाओं को व्यवस्थित किया गया। संगोष्ठियाँ, युवा महोत्सव, सांस्कृतिक कार्यक्रम, खेल गतिविधियाँ और अनुशासन से जुड़ी अनेक पहलें प्रारंभ हुईं। विद्यार्थियों के भीतर एक नई ऊर्जा और आत्मविश्वास का संचार हुआ। इन सब कार्यों में आदरणीय डॉ. विमल सर का ही हाथ रहा । साथ ही सभी -प्राध्यापिकाएं एवं प्राध्यापकगण , कर्मचारियों और विद्यार्थियों का सहयोग भी उल्लेखनीय है।

वैसे तो सर के व्यक्तित्व को कुछ पन्नों में समेट पाना अत्यंत दुष्कर है, फिर भी अपने सीमित शब्दों में एक छोटा सा प्रयास कर रहा हूँ..।

मुझे उनके व्यक्तित्व में जो सबसे विशेष बात दिखाई देती है, वह है-आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि का अद्भुत समन्वय।

आदरणीय सर ने जगतगुरु श्रीरामकृष्ण फिल्म का निर्देशन किया, जिसका प्रसारण दूरदर्शन पर भी हुआ। साथ ही स्वामी विवेकानंद जी के विचारों और मूल्यों की झलक सर के व्यक्तित्व और भाषणों में स्पष्ट दिखाई देती है। वे अक्सर युवाओं से कहते हैं .. “ऊँचा सोचो और मेहनत करो, हर युवा बहुत बड़ा कर सकता है।” उनका यह कथन उपनिषदों के “तत्त्वमसि” और “अहं ब्रह्मास्मि” जैसे सूत्रों की अनुभूति कराता है, जो मनुष्य को उसकी विराट क्षमता का बोध कराते हैं।

आध्यात्मिक दृष्टि के साथ-साथ उनकी वैज्ञानिक सोच भी उतनी ही प्रखर है। उनके नाम एक दर्जन से अधिक पेटेंट हैं। स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर वे अपने भाषणों में वे भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और उनके द्वारा स्थापित वैज्ञानिक संस्थानों का उल्लेख करते हुए उनकी दूरदृष्टि की सराहना करते हैं। यह दर्शाता है कि उनका जुड़ाव विज्ञान और आधुनिक चिंतन से भी उतना ही गहरा है।

हाल ही में उन्होंने ऐसा जूता विकसित किया है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में सर्पदंश की घटनाओं को कम करने में सहायता मिल सकती है। उनके अनेक आविष्कार जनहित से जुड़े हुए हैं। यही सब बातें यह सिद्ध करती हैं कि उनके व्यक्तित्व में आध्यात्मिकता और वैज्ञानिकता का जो संगम है, वह वास्तव में अत्यंत दुर्लभ और प्रेरणादायक है।

मानवता के सच्चे पोषक आदरणीय सर लंबे समय से 'राष्ट्रीय सेवा योजना' से जुड़े हुए हैं। उनके मार्गदर्शन में अनेक विद्यार्थियों ने सेवा, अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को आत्मसात किया है। उनके निर्देशन में कार्य करते हुए कुछ विद्यार्थियों ने उल्लेखनीय उपलब्धियाँ भी प्राप्त कीं। उदाहरणस्वरूप, श्री प्रशांत सर ने एनएसएस के माध्यम से राष्ट्रपति सम्मान प्राप्त कर एक प्रतिमान स्थापित किया ।

आदर्श महाविद्यालय में भी आदरणीय डॉ. विमल सर ने विद्यार्थियों को राष्ट्रीय सेवा योजना से जुड़ने के लिए निरंतर प्रेरित किया। उन्होंने युवाओं को केवल पुस्तकीय शिक्षा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें समाज और प्रकृति के प्रति अपने दायित्वों का भी बोध कराया। उनकी वजह से वस्त्र दान, पुस्तक दान, वृक्षारोपण, स्वच्छता अभियान और सामाजिक जागरूकता जैसे कार्यों के माध्यम से विद्यार्थियों में सेवा और संवेदना की भावना विकसित हुई।

उनके सम्पूर्ण कार्य वर्षों पर विहंगम दृष्टि डालने पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि राष्ट्रीय सेवा योजना, जो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और युवा प्रेरणास्त्रोत स्वामी विवेकानंद जी के मानवतावादी आदर्शों से प्रेरित है, उसे आदरणीय सर ने नई ऊर्जा और दिशा प्रदान की है। उनके प्रयासों से राष्ट्रीय सेवा योजना.. विद्यार्थियों के भीतर मानवता, करुणा और सामाजिक चेतना जगाने का एक सशक्त माध्यम बनी ।

एनएसएस सदैव मानव हित और प्रकृति हित के लिए कार्य करती है, और आदरणीय सर ने अपने नेतृत्व से इस भावना को व्यवहारिक रूप में जीवंत कर दिखाया है।
आदरणीय सर के व्यक्तित्व का एक अत्यंत प्रेरणादायक पक्ष उनका प्रकृति प्रेम है। 
उनके भीतर प्रकृति के प्रति जो संवेदनशीलता और आत्मीयता दिखाई देती है, वह वास्तव में दुर्लभ है। मुझे स्मरण है कि अपने एक भाषण में उल्लेख किया था कि - उन्होंने संबंधित विभाग को सचेत करते हुए कहा था कि राजमार्ग निर्माण के नाम पर वर्षों पुराने विशाल वृक्षों और वटवृक्षों को काटा जा रहा है, जबकि उनके स्थान पर केवल छोटे सजावटी पौधे लगाए जा रहे हैं। यह चिंता केवल वही व्यक्ति व्यक्त कर सकता है, जिसके भीतर प्रकृति के प्रति सच्चा प्रेम और उत्तरदायित्व का भाव हो।

वे अक्सर इस बात का भी उल्लेख करते हैं कि आज घरों के आँगन से गौरैया की चहचहाहट धीरे-धीरे गायब होती जा रही है। सचमुच, जो स्वर कभी सुबहों को जीवंत बना देता था, वह अब बहुत कम सुनाई देता है। छोटी-सी लगभग छह इंच की यह चिड़िया अपने साहस और फुर्ती के लिए जानी जाती है। किसानों की फसलों को शरारती बच्चों की तरह चुगने में बड़े पंक्षियों के भी कान काट देती थी.. परन्तु वह शरारत अब देखने को कहाँ मिलती है?आज गौरैया ही नहीं, अनेक पक्षी विलुप्ति की ओर बढ़ रहे हैं। इसके पीछे बढ़ता तापमान, वृक्षों और जंगलों की अंधाधुंध कटाई, पर्यावरण प्रदूषण और मनुष्य की उदासीनता जैसे अनेक कारण हैं। आदरणीय सर इन विषयों पर केवल चर्चा ही नहीं करते, बल्कि अपनी गहरी चिंता भी व्यक्त करते हैं। यही एक सच्चे प्रकृति प्रेमी की पहचान है। उन्हें पेड़ों की छाँव, फूलों के बीच और प्रकृति के सान्निध्य में समय बिताना अत्यंत प्रिय है। प्रकृति उनके लिए केवल जीवन का संवेदनशील आधार है।

उनकी एक कविता की पंक्तियाँ इस भाव को अत्यंत मार्मिक ढंग से व्यक्त करती हैं -“कहाँ गई मेरी सोन चिरैया,
फुदकती थी मेरे आँगन में..सुबह की चहचहाहट को..क्या ले लिया ऊँची मीनारों ने।”

यह कविता प्रकृति के खोते हुए संगीत पर व्यक्त एक गहरी पीड़ा है। इसे पढ़कर हृदय सचमुच द्रवित हो उठता है। आदरणीय सर की ये चिंताएँ हमें यह संदेश देती हैं कि प्रत्येक मनुष्य को प्रकृति, पशु-पक्षियों और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। उनकी रक्षा करना केवल दायित्व के साथ आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी नैतिक जिम्मेदारी भी है।

आदरणीय सर का व्यक्तित्व केवल शिक्षा, विज्ञान और प्रशासन तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके भीतर एक संवेदनशील साहित्यप्रेमी और कला साधक भी निवास करता है। वे साहित्य और रंगमंच की दुनिया से गहराई से जुड़े हुए हैं। विशेष रूप से नाटक और अभिनय के क्षेत्र में उनकी समझ, अनुभव और रुचि अत्यंत प्रभावशाली है।

आदरणीय सर स्वयं भी कभी कभी कविताएँ पढ़ते है..। कई बार वे सहज भाव से शायरी की कुछ पंक्तियाँ गुनगुना देते हैं, जो उनके भीतर छिपे संवेदनशील और रचनात्मक व्यक्तित्व की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके शब्दों में केवल साहित्यिक सौंदर्य ही नहीं, बल्कि जीवन, समाज और मानवीय संवेदनाओं की गहराई भी दिखाई देती है।

उन्होंने साइबर अटैक और गणित जैसे विषयों पर पुस्तकें लिखकर यह सिद्ध किया है कि साहित्यिक चेतना और वैज्ञानिक दृष्टि एक साथ चल सकती हैं। उनके अनेक लेख विभिन्न मंचों पर प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें ज्ञान, समाज, विज्ञान और मानवीय मूल्यों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।

सबसे प्रेरणादायक बात यह है कि वे विद्यार्थियों को भी पुस्तक संस्कृति से जोड़ने का निरंतर प्रयास करते हैं। आज के डिजिटल और त्वरित मनोरंजन के दौर में, जब पढ़ने की आदत धीरे-धीरे कम होती जा रही है, तब उनका यह प्रयास अत्यंत महत्वपूर्ण और सराहनीय है। वे विद्यार्थियों को जीवन की गहराई को समझने के लिए पढ़ने की प्रेरणा देते हैं।

वास्तव में, साहित्य, कला, विज्ञान और शिक्षा का ऐसा संतुलित संगम किसी विरले व्यक्तित्व में ही देखने को मिलता है। यही विशेषता आदरणीय सर को साधारण शिक्षकों से अलग और अत्यंत प्रेरणादायक बनाती है।

आदरणीय सर का व्यक्तित्व जितना विज्ञान और गणित की दृष्टि से समृद्ध है, उतनी ही अद्भुत उनकी हिंदी पर पकड़ भी है। सामान्यतः यह दृष्टिगोचर होता है कि गणित और विज्ञान के विद्वानों के लिए अंग्रेज़ी अधिक सहज होती है, परंतु हिंदी कठिन..लेकिन सर की हिंदी भाषा पर पकड़ इतनी सशक्त और स्वाभाविक है कि अच्छे-अच्छे हिंदी- वक्ता भी आश्चर्यचकित रह जाएँ।

सर की वाणी में एक विशेष ओज और स्पष्टता है। आवाज़ बुलंद होने के साथ-साथ उनका उच्चारण अत्यंत शुद्ध और संतुलित है। वे शब्दों के सूक्ष्म अंतर पर भी गहरी दृष्टि रखते हैं। बड़ी “ई” और छोटी “इ” के उच्चारण में जो स्पष्ट भेद होना चाहिए, वह उनके बोलने में सहज रूप से दिखाई देता है। आज जबकि अनेक हिंदी विद्वान भी उच्चारण की इन बारीकियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाते, वहाँ सर की भाषिक सजगता विशेष रूप से प्रभावित करती है। “नई शिक्षा नीति”, “कुलपति” जैसे शब्दों के उच्चारण में उनकी यह स्पष्टता सहज ही देखी जा सकती है।

मुझे एक प्रसंग स्मरण आता है। एक बार उन्होंने होनहार छात्रा सुश्री खुशबू कुमारी से मुस्कराते हुए कहा था .. “फोटो खिंचवाते समय आँखें खुली रखना।” जब तस्वीर सर मे देखी तो हँसते हुए बोले - यह तो आँखें तरेर रही है।” मैं भी उस समय वहीं उपस्थित था। उस क्षण उनकी सहज विनोदप्रियता और शब्दों के सुंदर प्रयोग ने वातावरण को अत्यंत आत्मीय बना दिया था।

विशेष बात यह भी है कि वे ऐसे हिंदी शब्दों का प्रयोग करते हैं, जो आज धीरे-धीरे सामान्य बोलचाल से लुप्त होते जा रहे हैं। उनके शब्द चयन में हिंदी साहित्य की गहरी छाप दिखाई देती है। कई बार ऐसा अनुभव होता है मानो मुंशी प्रेमचंद की रचनाओं की भाषा सजीव होकर सामने आ गई हो। 
वास्तव में, आदरणीय सर हिंदी भाषा, उसके उच्चारण और शब्द-संस्कृति के गंभीर ज्ञाता हैं। उनकी वाणी में ज्ञान के साथ-साथ भाषा के प्रति प्रेम और सम्मान भी स्पष्ट रूप से झलकता है।

महिलाओं के प्रति आदरणीय सर के मन में विशेष सम्मान और संवेदनशीलता का भाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उनसे जुड़े लगभग सभी लोग इस बात से भली-भाँति परिचित हैं कि वे महिला सशक्तिकरण और नारी सम्मान के प्रबल पक्षधर हैं। उनके विचारों में केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि व्यवहारिक प्रतिबद्धता भी दिखाई देती है।

महाविद्यालय की छात्राओं को प्रोत्साहित करना हो, उनकी उपलब्धियों की सराहना करनी हो अथवा किसी भी महिला के सम्मान और अधिकार से जुड़ा विषय हो .. आदरणीय सर सदैव सकारात्मक और संवेदनशील भूमिका में दिखाई देते हैं। 
उनके व्यवहार में यह भावना अत्यंत सहज रूप से दिखाई देती है। छात्राओं के प्रति उनका मार्गदर्शन सदैव प्रेरणादायक और सम्मानपूर्ण होता है। वे केवल शिक्षा तक सीमित रहने की बात नहीं करते, बल्कि महिलाओं को आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी और नेतृत्वकारी भूमिका में देखने की आकांक्षा भी रखते हैं।

वास्तव में, आदरणीय सर का यह दृष्टिकोण उनके संवेदनशील, प्रगतिशील और मानवीय व्यक्तित्व का अत्यंत सुंदर पक्ष प्रस्तुत करता है।

आदरणीय सर एक कुशल प्रशासक के रूप में सचमुच खरे सोने की तरह सिद्ध होते हैं। इनका प्रशासन दूरदृष्टि, समन्वय और विकास की व्यापक सोच से परिपूर्ण है। वे यह भली-भाँति जानते हैं कि किसी भी महाविद्यालय का विकास केवल भवनों और पाठ्यक्रमों से नहीं, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों के सहयोग और सहभागिता से होता है।

वे महाविद्यालय स्तर पर ही नहीं, बल्कि आसपास के राजनीतिक प्रतिनिधियों, स्थानीय जनसेवकों, उद्योगपतियों, अभिभावकों और समाज के जागरूक लोगों के अनुभवों का उपयोग महाविद्यालय के विकास में किस प्रकार किया जा सकता है, इसे बहुत अच्छे ढंग से समझते हैं। यही कारण है कि वे निरंतर संवाद, विचार-विमर्श और सहभागिता के माध्यम से विकास की नई संभावनाएँ तलाशते रहते हैं।

जब भी किसी प्रकार की संगोष्ठी, शैक्षणिक कार्यक्रम या सांस्कृतिक आयोजन होता है, वे आसपास के जनप्रतिनिधियों और समाजसेवियों को अवश्य आमंत्रित करते हैं। उन्हें केवल अतिथि के रूप में नहीं, बल्कि सम्मानित सहभागी के रूप में स्थान देते हैं। चाहे दर्शक के रूप में हों या वक्ता के रूप में, सर हर व्यक्ति के अनुभव और योगदान को महत्व देते हैं। इससे महाविद्यालय और समाज के बीच एक सशक्त संबंध स्थापित होता है।

उनकी प्रशासनिक शैली में अनुशासन के साथ-साथ आत्मीयता भी दिखाई देती है। वे जानते हैं कि नेतृत्व केवल आदेश देने से नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलने से सफल होता है। यही कारण है कि उनके नेतृत्व में महाविद्यालय केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि सामाजिक और बौद्धिक संवाद का केंद्र बनता हुआ दिखाई देता है।

आदरणीय सर के व्यक्तित्व का एक मानवीय पक्ष उनकी परिस्थितिजन्य परिवर्तनशीलता भी है। मैंने उन्हें कई बार क्रोधित होते देखा है, परंतु उनका क्रोध कभी स्थायी नहीं होता। वह क्षणिक होता है, ठीक वैसे ही जैसे बादल थोड़ी देर बरसकर फिर शांत हो जाते हैं। उन्होंने मुझे भी कई बार डाँटा है।
कई बार महाविद्यालय, विद्यार्थियों और विभिन्न जिम्मेदारियों की चिंता के कारण वे कठोर शब्द कह देते हैं। परंतु मनुष्य उसी को डाँटता है, जिस पर वह अधिकार और अपनापन महसूस करता है। उनकी डाँट में भी कहीं न कहीं विद्यार्थियों के प्रति चिंता और अपेक्षा छिपी होती है। यह बात मैं शायद कभी प्रत्यक्ष रूप से उनसे कह नहीं पाता, पर आज शब्दों के माध्यम से साहस कर रहा हूँ -“सर, आप अधिक क्रोधित मत हुआ कीजिए, क्योंकि आपके स्नेह में ही एक अद्भुत आकर्षण है।”

सबसे सुंदर बात यह है कि यदि वे किसी बात पर नाराज़ भी हो जाएँ, तो वह भाव अधिक देर तक टिकता नहीं। कई बार अगले ही क्षण उनका स्वभाव सामान्य और सहज हो जाता है, और कई बार अगले दिन तक मानो कुछ हुआ ही न हो। यही गुण उनके व्यक्तित्व को कठोरता से दूर और मानवीयता के अधिक निकट ले आता है।
आदरणीय सर के व्यक्तित्व का जो पक्ष मुझे सबसे अधिक प्रभावित करता है, वह है उनकी पारदर्शिता, ईमानदारी और गहरा कर्तव्यबोध। उनके दृष्टिकोण में निष्पक्षता और स्पष्टता दिखाई देती है, जिस कारण विद्यार्थियों का विश्वास स्वाभाविक रूप से उन पर दृढ़ होता है।

आपकी पारदर्शिता मुझे विशेष रूप से प्रभावित करती है। चाहे खेल प्रतियोगिता हो, परीक्षा हो या कोई अन्य गतिविधि, हर क्षेत्र में आपकी निष्पक्षता और ईमानदारी स्पष्ट दिखाई देती है। मेरा मानना है कि यही भावना किसी भी शैक्षणिक संस्थान की सबसे बड़ी शक्ति होनी चाहिए।

आदरणीय सर के व्यक्तित्व का एक पक्ष और भी है, जो मुझे विशेष रूप से प्रेरित करता है-उनकी जिज्ञासु प्रवृत्ति और भ्रमणशील जीवन-दृष्टि।

एक बार हम कुछ विद्यार्थियों ने उनसे निवेदन किया था कि कौशल संवर्धन पाठ्यक्रम में पर्यटन एवं आतिथ्य विषय को शामिल किया जाए, ताकि हमें पर्यटन जगत, सांस्कृतिक विरासतों तथा विभिन्न स्थलों के ऐतिहासिक और सामाजिक महत्व को समझने का अवसर मिल सके। सर ने हमारे सुझाव को गंभीरता से सुना और सहमति प्रदान की। परिणामस्वरूप महाविद्यालय में इस विषय का अध्ययन करने का अवसर प्राप्त हुआ, जिससे हम सभी विद्यार्थियों को अत्यंत प्रसन्नता हुई।

इस विषय का अध्ययन करने के बाद एक रोचक तथ्य प्रस्तुत कर रहा हूँ कि जिन अनेक स्थलों के बारे में हम पुस्तकों में पढ़ा, आदरणीय सर उनमें से कई स्थानों की यात्राएँ स्वयं कर चुके थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि उनके लिए पर्यटन.. सीखने, समझने और अनुभव अर्जित करने की एक सतत प्रक्रिया है।

मेरा मानना है कि पर्यटन मनुष्य को केवल नए स्थानों से ही नहीं, बल्कि नए विचारों, नई संस्कृतियों और जीवन की विविधताओं से भी परिचित कराता है। यह दृष्टि को व्यापक बनाता है और मनुष्य को सीमित सोच से बाहर निकालता है। आज जब बहुत से लोग अपने दैनिक जीवन की सीमाओं में सिमटते जा रहे हैं, तब सर का जीवन इस बात का उदाहरण प्रस्तुत करता है कि सीखने की प्रक्रिया कक्षा की चाहरदीवारी तक सीमित नहीं होती।

कश्मीर की वादियों से लेकर श्री विजयपुरम, रामेश्वरम् और अंडमान-निकोबार जैसे दूरस्थ क्षेत्रों तक उनकी यात्राएँ केवल भौगोलिक भ्रमण नहीं हैं, बल्कि भारत की विविधता को निकट से समझने का प्रयास भी हैं। इसके अतिरिक्त विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में उनकी सहभागिता यह दर्शाती है कि वे निरंतर संवाद, अध्ययन और अनुभवों के माध्यम से स्वयं को समृद्ध करने का प्रयास करते रहते हैं।

शायद यही कारण है कि उनके व्यक्तित्व में ज्ञान केवल पुस्तकों से प्राप्त जानकारी के रूप में नहीं, बल्कि अनुभवों से अर्जित जीवन-बोध के रूप में दिखाई देता है।

आज के समय में, जब जीवन की आपाधापी और भौतिक उपलब्धियों की दौड़ के बीच मानवीय मूल्य, पारिवारिक आत्मीयता और संबंधों की ऊष्मा धीरे-धीरे क्षीण होती प्रतीत हो रही है, ऐसे दौर में आदरणीय सर का जीवन एक प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत करता है।

अपने माता-पिता की पावन स्मृतियों, संस्कारों और जीवन-योगदान के प्रति उनका सम्मान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह जुड़ाव केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि उन आदर्शों को वर्तमान जीवन में जीवित रखने का एक सतत प्रयास भी है।

इसी प्रकार अपने पुत्रों, बड़े भाई तथा परिवार के अन्य सदस्यों के साथ उनके आत्मीय और मधुर संबंध यह दर्शाते हैं कि जीवन की वास्तविक समृद्धि केवल पद, प्रतिष्ठा या उपलब्धियों में नहीं, बल्कि संबंधों की गरिमा, विश्वास और अपनत्व में निहित होती है। उनके व्यवहार में पारिवारिक निकटता और परस्पर सम्मान की जो सहज झलक दिखाई देती है, वह आज के समय में और भी अधिक अर्थपूर्ण प्रतीत होती है।

मेरा मानना है कि किसी व्यक्ति की पहचान केवल उसके सार्वजनिक कार्यों से नहीं बनती, बल्कि इस बात से भी बनती है कि वह अपने जीवन में प्राप्त संस्कारों, स्मृतियों और संबंधों को कितनी संवेदनशीलता के साथ संजोकर रखता है। इस दृष्टि से आदरणीय सर का जीवन मानवीय मूल्यों, पारिवारिक संस्कारों और आत्मीय संबंधों की गरिमा को समझने का एक सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है ।

आपके इतने विस्तृत और बहुआयामी व्यक्तित्व को कुछ पन्नों में समेट पाना मेरे सामर्थ्य से बाहर है। यह लिखते-लिखते बार-बार अनुभव होता रहा कि बहुत कुछ अभी भी छूट गया है और बहुत कुछ ऐसा है जिसे शब्दों में बाँधना संभव ही नहीं।

अचानक स्मरण आता है कि आप अपने विद्यार्थियों की परिस्थितियों, उनकी क्षमताओं, उनकी चुनौतियों और उनके मनोभावों से कितनी भली-भाँति परिचित रहते हैं। शायद इसी कारण आपका स्नेह भी सभी के लिए एक जैसा होते हुए भी प्रत्येक विद्यार्थी तक उसकी आवश्यकता के अनुरूप पहुँचता है। यह गुण विरले लोगों में ही देखने को मिलता है।
आपके विषय में मैंने पहले भी कई बार लिखा था 2022-23 के आसपास..आपके कुछ भाषण के बाद पोडियम पर आपकी लिखावट वाले छोटे कागज़ छूट जाते थे उसे मैं चुपचाप जेब में डाल लेता था.. और उस बिंदु पर तथा आपके व्यक्तित्व पर लिखने का प्रयास करता , कई बार लिखा भी.. पर कभी घर की चौखट से बाहर नहीं निकल पाए। वे आज भी शायद किसी पुस्तक के बीच दबे हुए होंगे या किसी पुरानी डायरी के पृष्ठों में सुरक्षित पड़े होंगे। मैं भूलक्क्ड़ हूँ इसलिए उन्हें खोज पाना अब मेरे लिए कठिन है। किंतु एक बात मैं अवश्य मानता हूँ कि जीवन की कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें आँकड़ों, संदर्भों और विस्तृत शोध की अपेक्षा नहीं होती..वे सीधे हृदय से निकलती हैं और हृदय तक पहुँचती हैं। यह लेख भी उसी भाव का एक विनम्र प्रयास है।

मुझे आपने जितना स्नेह, प्रोत्साहन और विश्वास दिया है, उसके लिए मैं सदैव आपका आभारी रहूँगा। इस आलेख में मेरी अनेक त्रुटियों, अपरिपक्वताओं और भूलों को क्षमा करदें । परन्तु यह बात कह रहा हूँ. .कि यदि मैं बिना रुके कई पन्ने केवल भावनाओं के आधार पर लिख सकता हूँ, तो कोई गंभीर शोधकर्ता आपके व्यक्तित्व और कृतित्व पर एक संपूर्ण पुस्तक भी लिख सकता है। आपका जीवन अनेक प्रेरक आयामों से भरा हुआ है।
मुझे स्मरण है, जब सितंबर 2022 में हम विद्यार्थियों ने पहली बार आपका आशीर्वाद प्राप्त किया था। उस समय हम अपने सलैया तालाब से कमल के फूल लेकर आपके पास पहुँचे थे। उस समय शायद हम नहीं जानते थे कि आगे चलकर शिक्षा, संस्कृति, विज्ञान, सेवा और युवा चेतना के क्षेत्र में आपके प्रयासों को देखकर हमें बार-बार रामधारी सिंह दिनकर की वह प्रसिद्ध पंक्ति स्मरण आएगी जिसको उन्होंने जवाहर लाल नेहरू के समक्ष प्रस्तुत किया था- "एक हाथ में कमल, एक में धर्मदीप्त विज्ञान लेकर उठने वाला है हिंदुस्तान।"

समय के साथ यह अनुभव हुआ कि ज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टि के साथ मानवीय मूल्यों का समन्वय किस प्रकार किया जा सकता है। इस दिशा में आपका योगदान हम विद्यार्थियों ने निकट से देखा और महसूस किया है।

मेरा प्रथम आलेख जब प्रकाशित हुआ था, तब आपके द्वारा दी गई बधाई आज भी स्मृतियों में सुरक्षित है। ऐसे अनेक अवसर आए जब आपका प्रोत्साहन केवल मेरे लिए ही नहीं, बल्कि असंख्य विद्यार्थियों के लिए ऊर्जा का स्रोत बना। आपका स्नेह किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहा..वह अनेक विद्यार्थियों के जीवन में विश्वास और प्रेरणा बनकर पहुँचा है।

कभी-कभी ऐसा लगता है मानो किसी मरुस्थल के विस्तृत और शुष्क प्रांगण में एक हरित उपवन विकसित हो गया हो। जहाँ संभावनाएँ सुप्त थीं, वहाँ आपने विश्वास जगाया.. जहाँ संकोच था, वहाँ अभिव्यक्ति का अवसर दिया.. जहाँ केवल स्वप्न थे, वहाँ उन्हें आकार देने का वातावरण निर्मित किया। अनेक अवसरों पर आपने मुझे मंच प्रदान किया, बोलने का अवसर दिया और स्वयं पर विश्वास करना सिखाया। इसके लिए मैं सदैव आपका ऋणी रहूँगा।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आपने आदर्श महाविद्यालय को केवल एक शिक्षण संस्था के रूप में नहीं, बल्कि उड़ान के लिए एक सुदृढ़ आधार के रूप में विकसित करने का प्रयास किया है। आज कोई भी विद्यार्थी यदि थोड़े से मार्गदर्शन, थोड़े से सहयोग और अपने परिश्रम को साथ लेकर आगे बढ़ना चाहे, तो उसके लिए संभावनाओं के अनेक द्वार खुले दिखाई देते हैं।

अंत में, आपके द्वारा दिए गए प्रेम, सहयोग, मार्गदर्शन और आशीर्वाद के लिए मैं हृदय से कृतज्ञ हूँ। साथ ही मेरा एक विनम्र आग्रह भी है कि इस लेख के पश्चात् भी सम्यक व्यवहार बना रहे । जहाँ कभी डाँट की आवश्यकता जरूर से डांटे क्योंकि वह भी मेरे लिए आशीर्वाद का ही एक रूप है।

आपका स्नेह, आपका मार्गदर्शन और आपका आशीर्वाद हम विद्यार्थियों के लिए अमूल्य धरोहर है। यही कामना है कि आपका सान्निध्य और प्रेरणा हमें निरंतर प्राप्त होती रहे।

बहुत ही कम शब्दों में बहुत प्रेम के साथ जन्मदिवस की बहुत - बहुत बधाई सर ।
आपका आशीर्वाद बना रहे। 
सदैव ऋणी ।