रसोई में चाय की भाप उठ रही थी। सुबह का समय था। राधा चुपचाप खाना बना रही थी। उसके बालों में अब सफेदी की हल्की लकीरें आ चुकी थीं। चेहरे की चमक पहले जैसी नहीं रही थी।
उम्र लगभग चालीस के आसपास पहुँच चुकी थी। लेकिन उसकी आँखों में आज भी वही इंतज़ार था...
तभी बाहर से एक आवाज़ आई—
माँ! मैं कॉलेज के लिए लेट हो रहा हूँ। मेरा बैग कहाँ है?
राधा मुस्कुराई और बोली -
सोफे के पास रखा है, रितांश।
अगले ही पल दूसरी आवाज़ आई—
मम्मी! मेरे जूते नहीं मिल रहे!
राधा बोली -
रितांशी, कल तुमने ही तो उतारकर फेंके थे। दरवाज़े के पीछे देखो।
कुछ सेकंड बाद दोनों भाई-बहन हॉल में खड़े थे। रितांश...अब अठारह साल का हो चुका था। लंबा कद। तीखी आँखें। बिल्कुल कृष्णा की तरह चेहरा।
और रितांशी...पंद्रह साल की। हँसमुख। शरारती। और बिल्कुल अपनी माँ जैसी।
रितांश बोला -
चलो दीदी, नहीं तो फिर लेट हो जाओगी।
रितांशी बोली -
आप मुझे दीदी बोल रहे हो?
रितांशी ने उसके सिर पर हल्की चपत मारी। दोनों हँसते हुए घर से निकल गए। दरवाज़ा बंद हुआ। और घर फिर से शांत हो गया।
राधा कुछ देर वहीं खड़ी रही। फिर उसकी नज़र दीवार पर टंगी एक तस्वीर पर गई। वह कृष्णा की तस्वीर थी। गले में फूलों की माला पड़ी हुई थी। राधा धीरे-धीरे उसके पास गई। उसने काँपते हाथों से फोटो को छुआ। उसकी आँखें भर आईं।
वो बोली -
आप कहाँ चले गए, कृष्णा...?
सोलह साल हो गए...जब आप गए थे..तब रितांशी मेरे पेट में थी...।
एक आँसू तस्वीर पर गिर पड़ा।
वो बोली -
एक बार तो अपनी बेटी का चेहरा देख जाते...
जानते हैं?
वो बिल्कुल आपकी तरह ज़िद्दी है...
राधा हल्का सा हँसी। और अगले ही पल रो पड़ी। घर के दूसरे कोने में...एक पुरानी लकड़ी की अलमारी रखी थी। जिसे पिछले सोलह वर्षों में कभी नहीं खोला गया था। अचानक...ठक...अलमारी के अंदर से आवाज़ आई। राधा ने आँसू पोंछे। उसने चौंककर पीछे देखा।
फिर दूसरी आवाज़ आई—
ठक... ठक...
जैसे...अंदर कुछ जाग रहा हो। और उसी समय...कॉलेज जाते हुए रितांश की आँखें एक पल के लिए चमक उठीं। उनकी पुतलियों में...सिर्फ एक सेकंड के लिए...गहरा लाल रंग उभरा। फिर सब सामान्य हो गया।
दूर कहीं...अंधेरे में एक आवाज़ गूँजी—
रक्तवंश जाग चुका है...अब उसकी बारी है...
कॉलेज जाने वाली सड़क पर हमेशा की तरह भीड़ थी। रितांश और रितांशी साथ-साथ चल रहे थे। रितांशी कुछ बोल रही थी और रितांश आधा सुन रहा था, आधा अपने ही ख्यालों में था। तभी सामने से कुछ लड़के आए। उनमें से एक ने रास्ता रोक लिया।
उसने हँसते हुए कहा -
अरे रितांशी, आज तो बड़ी जल्दी में हो...
रितांशी का चेहरा उतर गया। वो उन लड़कों को पसंद नहीं करती थी।
उसने सख्त आवाज़ में कहा -
रास्ता छोड़ो।
लेकिन वे हँसने लगे। एक लड़का आगे बढ़ा।
वो बोला -
इतना गुस्सा अच्छी बात नहीं है...
अब तक चुप खड़ा रितांश धीरे-धीरे उनकी तरफ मुड़ा। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक उभरी। एक पल के लिए...उसकी पुतलियाँ लाल हो गईं। गहरी लाल। उसका जबड़ा कस गया। मुट्ठियाँ भिंच गईं। ऐसा लग रहा था जैसे उसके अंदर कोई बहुत पुराना गुस्सा जाग रहा हो। रितांश ने सिर्फ एक बार उन लड़कों की तरफ देखा। बस एक बार। लेकिन पता नहीं क्यों...उन लड़कों के चेहरों का रंग उड़ गया। उनके दिल की धड़कन तेज़ हो गई। जैसे किसी शिकारी ने उन्हें घूर लिया हो।
वो बोला -
तुम लोगों ने मेरी बहन का रास्ता क्यों रोका है?
रितांश की आवाज़ सामान्य थी। लेकिन उसमें कुछ ऐसा था जिसने सबको बेचैन कर दिया।
एक लड़का हिम्मत करके बोला—
तू क्या कर लेगा?
उस पल रितांश के दिमाग में अजीब-अजीब तस्वीरें चमकने लगीं।
अंधेरा...लाल आँखें...
और किसी की फुसफुसाहट—
डराओ उन्हें...उन्हें पता चलना चाहिए कि तुम कौन हो...
रितांश ने अपना सिर पकड़ लिया।
उसके मुँह से अनजाने में निकला -
नहीं...
तभी रितांशी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
वो बोली -
भैया?
क्या हुआ आपको?
जैसे ही उसने उसका हाथ पकड़ा...रितांश की आँखों का लाल रंग गायब हो गया। साँसें सामान्य हो गईं। उधर वे लड़के बिना कुछ कहे पीछे हट गए। पता नहीं क्यों...लेकिन वे सचमुच डर गए थे।
रितांश ने धीमे से कहा -
चलो यहाँ से...
दोनों आगे बढ़ गए। लेकिन रितांशी बार-बार अपने भाई को देख रही थी। उसे लगा...अभी कुछ अजीब हुआ है। बहुत अजीब।
और दूर कहीं...एक पुरानी, बंद अलमारी के अंदर...कुछ फिर से हिला। ठक...ठक...
आवाज आई -
उसने पहली बार शक्ति महसूस की...रक्तवंश सचमुच जाग रहा है... ।
कॉलेज में रितांश और रितांशी काफी मशहूर थे। लेकिन वजह सिर्फ यह नहीं थी कि वे भाई-बहन थे। रितांशी अभी B.Tech के पहले वर्ष में थी। वहीं रितांश दूसरे वर्ष में। दोनों पढ़ाई में इतने अच्छे थे कि प्रोफेसर भी उनकी तारीफ करते थे।
कॉलेज में लोग अक्सर कहते—
एक ही घर के दोनों बच्चे टॉपर कैसे हो सकते हैं?
रितांशी हँसकर कहती—
क्योंकि मम्मी हमें बचपन से पढ़ाई के पीछे दौड़ाती हैं।
लेकिन...एक बात थी जो किसी को नहीं पता थी। जब भी रितांश को बहुत ज्यादा गुस्सा आता...कुछ अजीब होने लगता। उसकी आँखें लाल पड़ जातीं। बिल्कुल लाल। और उसके अंदर अचानक एक असामान्य ताकत आ जाती। ऐसी ताकत जो एक सामान्य इंसान में नहीं हो सकती।
कुछ महीने पहले कॉलेज की लैब में एक भारी मशीन गिरने वाली थी। नीचे दो छात्र खड़े थे। सभी घबरा गए। लेकिन रितांश दौड़कर वहाँ पहुँचा। और उसने अकेले ही उस मशीन को संभाल लिया।
बाद में सबने सोचा शायद एड्रेनालिन की वजह से हुआ होगा।लेकिन रितांश जानता था...वह सामान्य नहीं था।
कई बार जब वह आईने में खुद को देखता...तो उसे लगता जैसे उसकी आँखों के पीछे कोई और भी है। कोई जो उसके गुस्से का इंतज़ार कर रहा है। रितांशी ने भी यह बदलाव नोटिस किया था।
एक दिन उसने पूछा—
भैया, आपकी आँखें कभी-कभी लाल क्यों हो जाती हैं?
रितांश तुरंत मुस्कुराया और बोला -
रात को कम सोता हूँ इसलिए।
लेकिन दोनों जानते थे...यह जवाब सच नहीं था।
रात में रितांश अपने कमरे में पढ़ रहा था। तभी उसकी नज़र पुराने पारिवारिक फोटो एल्बम पर गई। उसने एक तस्वीर उठाई।
उसमें—
👉 उसकी माँ राधा थी
👉 उसके पिता कृष्णा थे
👉 और उनकी गोद में छोटा सा रितांश
रितांश कुछ देर तक तस्वीर को देखता रहा।
उसने धीरे से कहा -
पापा...
उसे अपने पिता की याद भी ठीक से नहीं थी।क्योंकि जब कृष्णा गायब हुए थे...वह बहुत छोटा था। तभी उसकी नज़र तस्वीर के पीछे लिखी एक तारीख पर गई।
और उसके नीचे एक शब्द—
सिद्धिका
रितांश ठिठक गया।
वो बोला -
सिद्धिका कौन है...?
उसी पल...उसके कमरे की लाइट एक बार झपकी। और कमरे के कोने में रखी पुरानी बंद अलमारी से फिर आवाज़ आई ठक...ठक...रितांश धीरे-धीरे उस तरफ मुड़ा। उसके अंदर एक अजीब एहसास जाग रहा था...जैसे उस अलमारी में उसके सवालों का जवाब छिपा हो।