Dushman Se Pehla Pyar: The Mysterious Queen - Bhag 3 in Hindi Love Stories by Pihu Patel books and stories PDF | दुश्मन से पहला प्यार: द मिस्टीरियस क्वीन - भाग 3

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दुश्मन से पहला प्यार: द मिस्टीरियस क्वीन - भाग 3

भाग 3: नज़दीकियाँ या साज़िश?

उंगली से टपकती खून की उस नन्ही बूंद को देखकर रुद्र की आँखों में एक अजीब सा भाव आया। उसने तुरंत अपनी जेब से एक रेशमी रुमाल निकाला और बिना कुछ सोचे-समझे मेरा हाथ पकड़ लिया। उसका यह कदम इतना अचानक था कि मैं अपनी जगह पर जड़ हो गई। रुद्र ने बहुत ही नरमी से उस रुमाल को मेरी उंगली पर लपेटा।

"सॉरी, मेरा इरादा तुम्हें चोट पहुँचाने का नहीं था। बस देखना चाहता था कि तुम ख़तरे से कितना डरती हो," रुद्र ने मेरी आँखों में गहराई से देखते हुए कहा। उसकी आवाज़ में इस वक्त कोई कड़कपन नहीं था, बल्कि एक अजीब सा ठहराव था।
मैंने अपना हाथ धीरे से पीछे खींचा और मुस्कुराते हुए कहा, "छोटे-मोटे कांटों से 'मायरा शर्मा' नहीं डरती, सर। और जहाँ तक राज़ की बात है, मेरी ज़िंदगी तो एक खुली किताब है। आप जब चाहें पढ़ सकते हैं।"
रुद्र वापस अपनी चेयर पर जाकर बैठ गया और उसने मुझे काम समझाना शुरू किया। मेरा काम उसके सारे शेड्यूल को संभालना और उसकी पर्सनल सिक्योरिटी की फाइलों को अपडेट रखना था। यानी अब मैं चौबीसों घंटे उसके सबसे करीब रहने वाली थी। बिल्कुल वैसा ही, जैसा मैंने प्लान किया था।
दिन बीतते गए। देखते ही देखते दो हफ्ते निकल गए। इस दौरान मैंने नोटिस किया कि रुद्र बाहर से जितना कठोर और बेरहम दिखता था, अंदर से वह उतना ही अकेला था। उसने अपने चारों तरफ नफ़रत की एक ऐसी दीवार खड़ी कर रखी थी, जिसे कोई पार नहीं कर सकता था। लेकिन न जाने क्यों, जब वह मेरे साथ होता, तो उसकी वो कड़वाहट थोड़ी कम हो जाती थी।
उधर, 'द मिस्टीरियस क्वीन' के रूप में मेरा मिशन अभी भी अधूरा था। मुझे उस लॉकर का पासवर्ड चाहिए था जो रुद्र के केबिन की खुफिया दीवार के पीछे था।
एक शाम, जब ऑफिस के सारे लोग जा चुके थे, अचानक मौसम ने करवट ली। बाहर ज़ोरदार बारिश होने लगी और आसमान में बिजलियाँ कड़कने लगीं। रुद्र अपने केबिन में एक बहुत ही ज़रूरी फाइल ढूंढ रहा था।
"मायरा, ज़रा उस अलमारी की ऊपरी रैक से वो ब्लू फाइल निकाल कर देना," रुद्र ने केबिन के अंदर से आवाज़ दी।
मैं स्टूल पर चढ़कर फाइल निकालने लगी। तभी अचानक बाहर एक बहुत ज़ोरदार बिजली कड़की, जिसकी गड़गड़ाहट से पूरा ऑफिस हिल गया। घबराहट में मेरा पैर स्टूल से फिसल गया और मैं सीधे नीचे की तरफ गिरी।
मुझे लगा कि आज तो हड्डियां टूटना तय है, लेकिन मैं फर्श पर नहीं गिरी। किसी की मजबूत और चौड़ी बाहों ने मुझे हवा में ही थाम लिया था। वह रुद्र था।
उसने मुझे अपनी बाहों में उठा रखा था। मेरी दोनों हथेलियाँ उसके मजबूत कंधों पर टिकी थीं। इस वक्त हम दोनों एक-दूसरे के इतने करीब थे कि हमारी धड़कनें आपस में टकरा रही थीं। रुद्र की गहरी आँखें सीधे मेरी आँखों में झांक रही थीं, जैसे वह इस सादगी भरे चेहरे के पीछे छिपे उस नकाबपोश चेहरे को ढूंढने की कोशिश कर रहा हो जो उस रात उसे चकमा देकर भाग गई थी।
"तुम हमेशा इतनी लापरवाह क्यों रहती हो, मायरा?" रुद्र ने बहुत ही धीमी और भारी आवाज़ में पूछा।
मेरा दिल इतनी तेज़ी से धड़कने लगा कि मुझे अपनी ही सांसें भारी लगने लगीं। दुश्मनी के इस खेल में पहली बार मुझे अपने कदम डगमगाते हुए महसूस हुए। क्या मैं अपने दुश्मन के करीब आ रही थी, या यह रुद्र की कोई नई चाल थी?
तभी रुद्र की नज़र मेरी कलाई पर गई, जहाँ उस रात कलाई मरोड़े जाने की वजह से एक हल्का सा नीला निशान (injury mark) अभी भी बाकी था। रुद्र की आँखें पल भर में सुलग उठीं। उसने मुझे नीचे उतारा और मेरी कलाई को कसकर पकड़ लिया।
"यह निशान... यह तुम्हें कहाँ से लगा मायरा?" रुद्र ने शक भरे लहजे में पूछा।