प्यार खेल नहीं
एपिसोड 1 — वह रात जब सब कुछ बिखर गया
मुंबई।
एक ऐसा शहर जो कभी सोता नहीं।
यहाँ दिन में भी भीड़ होती है और रात में भी। यहाँ की सड़कें कभी खाली नहीं होतीं, यहाँ की हवा में हमेशा एक शोर रहता है — गाड़ियों का, लोगों का, ज़िंदगी का। लेकिन इसी शोर के बीच कभी-कभी एक ऐसी चीख़ दब जाती है जो किसी को सुनाई नहीं देती। एक ऐसा दर्द जो किसी को नज़र नहीं आता।
और आज — इसी मुंबई की एक छोटी सी चाल में — एक परिवार हमेशा के लिए टूटने वाला था।
धारावी की गलियाँ शाम के वक़्त और भी तंग लगती हैं।
जहाँ एक तरफ बच्चे खेल रहे होते हैं, औरतें दरवाज़े पर बैठकर बातें करती हैं, मर्द थके-हारे काम से लौटते हैं — वहीं एक कमरे से आज ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ें आ रही थीं।
राजेश का घर।
कमरा छोटा था। दीवारें पुरानी और सीलन भरी। एक कोने में टूटा हुआ पंखा था जो घड़घड़ाता हुआ चलता था। रसोई के नाम पर बस एक स्टोव और कुछ बर्तन। लेकिन इस छोटे से घर में राजेश ने अपनी पूरी दुनिया बसाई थी।
आज वह दुनिया उजड़ रही थी।
सपना — चौबीस-पच्चीस साल की एक औरत — अपना सामान बैग में ठूँस रही थी। उसके चेहरे पर गुस्सा था, आँखों में एक ठंडी चमक थी जो किसी को भी डरा दे।
"बस हो गया!" उसने बैग का ज़िप खींचते हुए कहा। "मैं अब एक दिन भी इस नरक में नहीं रह सकती।"
राजेश दरवाज़े के पास खड़ा था। उसके हाथ काँप रहे थे। आँखें लाल थीं — शायद रोने से, शायद गुस्से से।
"सपना।" उसकी आवाज़ में गिड़गिड़ाहट थी। "एक बार सोचो। बच्चे हैं हमारे। तीन-तीन बच्चे।"
"तो क्या हुआ?" सपना ने पलटकर देखा। उसकी आवाज़ में ज़रा भी नरमी नहीं थी। "मैंने क्या सोचकर यह ज़िंदगी चुनी थी? यह चाल? यह गरीबी? यह टूटा हुआ पंखा? मैं इसके लिए नहीं बनी राजेश।"
"तो किसके लिए बनी हो?" राजेश की आवाज़ टूट गई।
"रमन के लिए।" सपना ने बिना झिझक कहा। "वह मुझे वह ज़िंदगी देगा जो तुम कभी नहीं दे सके। बड़ा घर, गाड़ी, पैसा। मैं उसके साथ जा रही हूँ और उससे शादी करूँगी।"
राजेश के पाँव जैसे ज़मीन में धँस गए।
यह वही सपना थी जिसके लिए उसने अपने माँ-बाप को छोड़ा था। अपना घर छोड़ा था। अपने भाई-बहनों को छोड़ा था। जब घरवालों ने इस शादी से मना किया था तो उसने सबसे नाता तोड़ लिया था। उसने सोचा था — प्यार सब कुछ होता है। प्यार से सब कुछ होता है।
लेकिन आज उसे पता चल रहा था कि प्यार खेल नहीं होता — और यह खेल उसने हार दिया था।
तभी कमरे के एक कोने से आवाज़ें आईं।
"मम्मी।"
तीन छोटी-छोटी आवाज़ें। तीन छोटे-छोटे बच्चे।
छह साल का रणवीर सबसे आगे था। उसकी आँखें बड़ी-बड़ी थीं और उनमें डर था — वह डर जो बच्चों को तब होता है जब वे कुछ समझ नहीं पाते लेकिन महसूस कर लेते हैं कि कुछ बहुत बुरा होने वाला है।
उसके पीछे पाँच साल का आदित्य खड़ा था। उसके गाल पर आँसू थे। वह रो रहा था लेकिन आवाज़ नहीं निकाल रहा था — जैसे उसे डर हो कि ज़ोर से रोया तो माँ और गुस्सा हो जाएगी।
और सबसे पीछे चार साल का दानिश था। उसे शायद पूरी बात समझ नहीं आई थी। लेकिन वह भी रो रहा था — क्योंकि बड़े भाई रो रहे थे, क्योंकि पापा रो रहे थे, क्योंकि घर में कुछ टूट रहा था जो उसे महसूस हो रहा था।
तीनों दौड़कर अपनी माँ के पास आए और उसके पाँव पकड़ लिए।
"मम्मी मत जाओ।" रणवीर ने माँ का दामन थाम लिया। "आप चली जाएँगी तो हमारा क्या होगा? हम कहाँ जाएँगे?"
आदित्य ने माँ की साड़ी पकड़ी और बस इतना कहा — "मम्मी।"
बस एक शब्द। लेकिन उस एक शब्द में पूरी दुनिया का दर्द था।
दानिश तो बस रोता रहा। उसे नहीं पता था कि क्या माँगना है — बस माँ को जाते नहीं देखना चाहता था।
कहते हैं कि माँ का दिल पत्थर नहीं होता। कहते हैं कि औलाद की आँखों के आँसू माँ से देखे नहीं जाते। लेकिन शायद सपना उन माँओं में से नहीं थी।
उसने अपने बच्चों की तरफ एक नज़र देखा — और फिर नज़रें फेर लीं।
उसने राजेश को एक धक्का दिया।
बच्चों की पकड़ छुड़ाई।
और बिना पीछे मुड़े — बिना एक बार भी रुके — वह दरवाज़े से बाहर निकल गई।
बाहर एक चमचमाती गाड़ी खड़ी थी। रमन मुस्कुरा रहा था।
गाड़ी का दरवाज़ा बंद हुआ।
और वह चली गई।
उस दिन के बाद वह घर घर नहीं रहा।
राजेश टूट गया। वह आदमी जो कभी मेहनत करके अपने परिवार का पेट भरता था — वह अब रात को दारू पीकर फुटपाथ पर पड़ा रहता। उसे जीने का मन नहीं था। उसे लगता था कि जो हुआ वह उसकी सज़ा है — क्योंकि उसने भी तो एक बार अपने माँ-बाप को छोड़ा था।
और तीनों बच्चे?
रणवीर, आदित्य और दानिश — यह तीनों उस टूटे हुए कमरे में अकेले बैठे रहते। कभी-कभी पड़ोस की औरत खाना दे जाती। कभी-कभी भूखे सो जाते।
रणवीर सबसे बड़ा था — वह अपने छोटे भाइयों को चुप कराता। उन्हें गले लगाता। कहता — "रो मत। पापा आ जाएँगे।"
लेकिन खुद वह रात को चुपचाप रोता था। जब दोनों छोटे भाई सो जाते — तब।
उस रात जब राजेश दारू पीकर घर के बाहर पड़ा था, धारावी की उस गली में अचानक छह-सात बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ आकर रुकीं।
पूरी गली हैरान हो गई।
इन गलियों में इतनी बड़ी गाड़ियाँ कभी नहीं आती थीं।
एक गाड़ी का दरवाज़ा खुला और एक आदमी बाहर निकला। उम्र तीस के आसपास। कद लंबा। बिज़नेस सूट पहना हुआ। चेहरे पर एक गंभीरता थी जो पैसों से नहीं, बल्कि ज़िंदगी के तजुर्बे से आती है।
यह था विक्रम मेहता।
मुंबई में उसका नाम था। पैसा था। रुतबा था। लेकिन आज वह इस गली में क्यों आया था — यह किसी को नहीं पता था।
विक्रम राजेश के पास आया। उसे देखा — दारू की बोतल हाथ में, कपड़े मैले, आँखें बंद।
विक्रम की आँखें भर आईं।
उसने मन में सोचा — "इसीलिए लोग कहते हैं कि प्यार मत करो। इतना बड़ा आदमी था यह। और एक औरत ने इसे कहाँ लाकर छोड़ दिया।"
उसने अपने आदमियों को इशारा किया। राजेश को उठाया गया और गाड़ी में बिठाया गया।
जब विक्रम गाड़ी में बैठा तो उसने देखा — पीछे की सीट पर तीन बच्चे चुपचाप बैठे थे। तीनों की आँखें लाल थीं। तीनों डरे हुए थे। लेकिन तीनों अपने पापा के पास थे।
"तुम लोग कौन हो?" विक्रम ने धीरे से पूछा।
रणवीर ने सीधे उसकी आँखों में देखा और कहा — "हमारे पापा हैं ये। हमारी मम्मी हमें छोड़कर चली गई।"
आदित्य ने अपनी रोती हुई आँखें पोंछीं और कुछ नहीं बोला।
और दानिश — सबसे छोटे दानिश ने — विक्रम की तरफ देखकर बड़ी मासूमियत से पूछा —
"क्या हमारे पापा ठीक हो जाएँगे? हमारे पापा के अलावा इस दुनिया में हमारा कोई नहीं है।"
विक्रम कुछ देर चुप रहा।
उसके दिल में कुछ हिला।
फिर उसने धीरे से कहा —
"हो जाएँगे बेटा। सब ठीक हो जाएगा।"
गाड़ी धारावी की उन तंग गलियों से निकलकर मुंबई की चौड़ी सड़कों पर आ गई।
रात का अँधेरा था।
लेकिन आगे का सफ़र अभी बाकी था।
और 20 साल बाद — रणवीर, आदित्य और दानिश वह नहीं रहे जो थे।
मुंबई उन्हें जानती थी। मुंबई उनसे डरती थी।
क्योंकि प्यार खेल नहीं — और यह तीनों भाई यह साबित करने वाले थे।
(एपिसोड 2 जल्द आएगा...)