Konichiva my Desi Love - 2 in Hindi Short Stories by Kajal Soam books and stories PDF | कोन्निचिवा: माय देसी लव - 2

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कोन्निचिवा: माय देसी लव - 2


परिदृश्य: जयपुर की हलचल भरी सड़कें और शिवानी का संघर्ष।
जयपुर की दोपहर अपनी पूरी रंगत में थी। हवा में आमेर के किलों की खुशबू और बाज़ारों का शोर घुला हुआ था। शिवानी आज 'सीतापुरा इंडस्ट्रियल एरिया' से अपने सपनों के कुछ नमूने (Samples) लेकर वापस लौट रही थी। उसके कंधे पर एक बड़ा सा फैब्रिक बैग था, जिसमें उसके हाथ से बनाए गए डिज़ाइन्स और कुछ खास राजस्थानी 'गोटा-पत्ती' का काम किया हुआ कपड़ा था।
शिवानी के कदम थके हुए थे, पर आँखों में जीत की चमक थी। उसने अभी-अभी एक बड़े एक्सपोर्ट हाउस को अपना पोर्टफोलियो दिखाया था। हालाँकि, उन्होंने उसे यह कहकर टाल दिया कि "शादी के बाद लड़कियाँ काम छोड़ देती हैं, हम तुम पर दांव क्यों लगायें?" यह बात उसे अंदर तक चुभ गई थी।
शिवानी (अपनी छोटी बहन यामी से, जो रास्ते में उसके साथ थी): "यामी, देख रही है दुनिया की सोच? उन्हें लगता है कि मेरी डिग्री सिर्फ शादी के बायोडाटा में एक लाइन बढ़ाने के लिए है। किसी को ये समझ नहीं आता कि ये सुई-धागा मेरी पहचान है। पर मैं हार नहीं मानूँगी। अगर मुझे मौका मिला, तो मैं दिखा दूँगी कि जयपुर की ये पारंपरिक कला इंटरनेशनल रैम्प पर कैसे आग लगाती है!"

यामी ने उसका हाथ थामते हुए कहा, "दीदी, आप फिक्र मत करो। पर अभी जल्दी घर चलो। पापा का पारा चढ़ा हुआ है। जापान वाले मेहमान एयरपोर्ट से निकल चुके हैं और आप यहाँ सड़कों पर कपड़ों के थान लिए घूम रही हो।"

शिवानी ने एक गहरी सांस ली। "मेहमान... मेहमान! पता नहीं क्यों ये सब मेरी लाइफ में इस वक्त आ रहे हैं जब मुझे अपने करियर पर ध्यान देना चाहिए।"

दृश्य 2: जयपुर की सड़कों पर निहाल की उलझन
उधर, निहाल अपनी माँ हेमा जी के साथ एक किराये की चमचमाती एसयूवी (SUV) में जयपुर की सड़कों पर था। निहाल खुद गाड़ी चला रहा था। उसे लगा था कि जापान में ऊँची और जटिल सड़कों पर गाड़ी चलाना मुश्किल है, पर जयपुर की 'बेतरतीब' गलियों ने उसे पसीने छुड़ा दिए थे। एक तरफ से ऑटो आ रहे थे, तो दूसरी तरफ से अचानक कोई गाय सड़क के बीचों-बीच बैठ जाती थी।
निहाल (अपनी टूटी-फूटी हिंदी और इंग्लिश के मिश्रण में): "Mom, India के ये 'Rastar' (रास्ते) बहुत 'Complex' हैं। GPS कह रहा है कि 200 मीटर में लेफ्ट मुड़ें, पर वहाँ तो कोई रास्ता ही नहीं है, सिर्फ एक पुरानी दीवार है! मुझे समझ नहीं आ रहा कि आखिर जाना कहाँ है।"
हेमा जी बगल वाली सीट पर बैठी मुस्कुरा रही थीं। "बेटा, यहाँ GPS से ज़्यादा लोगों के बताए पते काम आते हैं। तुम किसी से पूछ क्यों नहीं लेते? वैसे भी विनोद भाई साहब हमारा इंतज़ार कर रहे होंगे। हम वैसे ही बहुत लेट हो गए हैं।"

निहाल ने चिढ़ते हुए अपनी टाई ढीली की। उसे गर्मी और ट्रैफिक से उलझन हो रही थी। तभी उसकी नज़र सड़क किनारे तेज़ी से पैदल जा रही दो लड़कियों पर पड़ी। एक लड़की ने सिर पर दुपट्टा बांधा हुआ था और हाथ में बड़ा सा बैग था। जैसे ही निहाल की गाड़ी उनके पास से गुजरी, उसे अचानक अपनी माँ के फोन में देखी गई वो फोटो याद आ गई।

उसने ब्रेक मारा। निहाल के दिमाग में बिजली की तरह कौंधा—'क्या ये वही लड़की है?' उसने शीशे से पीछे मुड़कर देखा। फोटो वाली वो बेबाक आँखें बिल्कुल वैसी ही थीं। निहाल ने अपनी माँ को आँखों ही आँखों में चुप रहने का इशारा किया। उसके मन में एक शरारत सूझी। वह देखना चाहता था कि यह लड़की, जो फोटो में इतनी 'कॉन्फिडेंट' दिख रही थी, असल जिंदगी में कैसी है।

दृश्य 3: 'पति' या 'पता'? — एक मज़ेदार शुरुआत
निहाल ने गाड़ी को धीरे से शिवानी के पास ले जाकर रोका और कांच नीचे किया। शिवानी अपनी धुन में यामी को अपने फैशन डिज़ाइन्स के बारे में समझा रही थी, उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि सामने खड़ा यह 'विदेशी' दिखने वाला शख्स कौन है।

निहाल ने अपना गला साफ किया और पूरी मासूमियत के साथ अपनी सबसे खराब हिंदी का इस्तेमाल किया।
निहाल: "Excuse me! क्या आप इस... इस... 'पति' को जानती हैं? मुझे कहाँ जाना है, क्या आप बता सकती हैं?"

शिवानी 'पति' शब्द सुनते ही ठिठक गई। उसने अपनी बात बीच में ही रोकी और निहाल को ऊपर से नीचे तक देखा। निहाल ने बढ़िया सूट पहना था, महंगा चश्मा लगाया था, पर उसकी जुबान? शिवानी अपनी हँसी नहीं रोक पाई। आसपास खड़े लोग भी मुस्कुराने लगे।

शिवानी (हंसते हुए): "पति? अरे भाई साहब! आप 'पते' (Address) की बात कर रहे हैं न? पति तो घर के अंदर होता है, ऐसे बीच सड़क पर लावारिस नहीं घूमता और न ही किसी अजनबी लड़की से अपना एड्रेस पूछता है! लगता है आपकी हिंदी को 'रिपेयर' (Repair) करने की सख्त ज़रूरत है। कौन से मैकेनिक से सीखी है ऐसी भाषा?"

यामी ने धीरे से शिवानी को कोहनी मारी, "दीदी, देखो कितनी बड़ी गाड़ी है। और ये आंटी भी कितनी सुंदर लग रही हैं। लगता है ये वाकई विदेश से आए हैं।"
शिवानी ने निहाल के हाथ से वो कागज़ लिया जिस पर उसके घर का एड्रेस लिखा था। जैसे ही उसने पता पढ़ा, उसके माथे पर बल पड़ गए। यह तो उसके अपने ही मोहल्ले का, उसके अपने घर का पता था!

शिवानी (मन में): "ओह तेरी! तो ये वही 'जापानी मुंडा' है जिसका इंतज़ार पापा सुबह से कर रहे हैं?"
उसने निहाल की तरफ देखा, जो अभी भी बड़ी मासूमियत से उसे देख रहा था। शिवानी ने सोचा कि अगर इसे अकेले छोड़ दिया, तो ये पूरे जयपुर में 'पति' ढूंढता फिरेगा।

शिवानी: "सुनिए मिस्टर पति... मेरा मतलब है मिस्टर जापानी! ये पता तो मेरे ही घर की तरफ जाता है। मैं और मेरी बहन भी वहीं जा रहे हैं और हम पहले ही लेट हैं। अगर आप हमें आगे तक छोड़ दें, तो मैं आपको सही 'पते' पर पहुँचा दूँगी। और हाँ, रास्ता मैं बताऊँगी, आप बस स्टीयरिंग संभालिये।"
निहाल ने मन ही मन अपनी जीत की मुस्कान दबाई। "Sure, please come in।"

शिवानी और यामी गाड़ी की पिछली सीट पर बैठ गईं। निहाल ने गाड़ी चलाना शुरू किया। वह बार-बार आईने (Rear-view mirror) में शिवानी को देख रहा था। शिवानी बाहर की तरफ देख रही थी, पर वह भी जानती थी कि निहाल उसे देख रहा है। हेमा जी पीछे मुड़कर शिवानी को देख रही थीं और उनके चेहरे पर एक संतुष्टि थी। उन्हें लग रहा था कि निहाल की पसंद और शिवानी की बेबाकी का मेल बड़ा दिलचस्प होने वाला है।

निहाल (मन में): "फोटो से भी ज़्यादा दिलचस्प है ये। जापानी सादगी और जयपुर का तीखापन... मजा आएगा!"