Haweli se Daftar Tak - 10 - Last Part in Hindi Motivational Stories by prachi Gurjar books and stories PDF | हवेली से दफ्तर तक - 10 (अंतिम अध्याय )

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हवेली से दफ्तर तक - 10 (अंतिम अध्याय )

                  अध्याय 10: वापसी

छह महीने बाद, गौरी की पहली बड़ी जीत मिली। एक अनपढ़ महिला जिसका दहेज़ ज़ब्त कर लिया गया था, गौरी ने उसे वापस दिलवाया। कानून का इस्तेमाल करके, सिस्टम को जो सब सोचते हैं कि फ़ेल है, उसे ही काम में लगाया।

अखबार में फिर से उसका नाम आया। इस बार बड़े अक्षरों में:

“नई अफ़सर, नया न्याय: गौरी धरमचंद का पहला केस”

और इस बार, धरमचंद की हवेली में एक औरत अखबार पढ़ रही थी।

माँ।

माँ ने अखबार को हाथों में ले कर देखा, गौरी की तस्वीर, और रो पड़ी। “मेरी बेटी। मेरी साहसी बेटी।”

बुआ कुछ नहीं कह रहीं, बस ख़ामोशी में अपना मुँह ढाँपे बैठीं।

धरमचंद अपने कमरे में थे, अखबार पढ़ रहे थे। उन्होंने हर शब्द को एक दो तीन बार पढ़ा, और हर बार उनकी आँखों में कुछ गिरता था।

उस रात, धरमचंद ने माँ को बुलाया। “तुम्हें पता चल गया, गौरी कहाँ है?”

“पता तो बहुत पहले चल गया, पर तुमसे सुनते थे कि अब वह हमारे लिए मर गई है।”

“मैंने ग़लत कहा था?” धरमचंद की आवाज़ काँप रही थी। “मैंने अपनी बेटी को ग़लत समझा। उसका सपना ग़लत नहीं था। मैं ग़लत था।”

माँ कुछ नहीं बोली, बस धरमचंद को देखती रही।

“अगर वह आए, तो क्या कहूँ?” धरमचंद ने पूछा।

माँ ने जवाब दिया, “वही कहना जो दिल में है। बाकी सब फ़िज़ूल है।”

एक महीने बाद, एक मामला गौरी के आए जो सीधा हवेली से जुड़ा था। एक महिला, जो सेठ धरमचंद के सहायक की थी, उसका दहेज़ छीन लिया गया था, और अब वह न्याय माँग रही थी।

गौरी ने मामला सुना। फिर पूछा, “यह घटना कहाँ हुई?”

जब नाम सुना, तो उसका हाथ काँप गया।

अपने ही घर में, अपने ही बाप के सहायक को ये अत्याचार हुआ। और गौरी को पता भी नहीं था।

वह रात भर नहीं सोई। अगली सुबह, उसने एक फ़ैसला लिया जो उसकी पूरी जीवन को बदल देगा।

घर जाने का समय। गौरी ने एक सफ़ेद कार में बैठी, हवेली की तरफ़। रास्ते भर उसके दिल तेज़ चल रहा था।

सात साल। सात साल से वह उस दरवाज़े के पार नहीं गई थी। सात साल, जो उम्र के बराबर महसूस होता था।

हवेली के दरवाज़े पर गाड़ी रुकी। सामने वही बड़ा, भारी दरवाज़ा, जिसके पीछे से वह कभी निकली थी, खाली हाथ, पर दिल से भरा हुआ।

नौकर ने गौरी को देखा, पहचान गया। “बेटा! तुम? तुम सब सही हो?”

गौरी ने सिर्फ़ हाँ में सिर हिलाया।

अंदर, धरमचंद बैठे थे, अखबार पढ़ रहे थे। जैसे ही गौरी का छाया दिख गया, उनके हाथ से अखबार गिर गया।

दोनों एक दूसरे को देखते रहे, लंबे समय तक। कोई शब्द नहीं, सिर्फ़ सवाल और जवाब आँखों में।

“बेटा,” धरमचंद की आवाज़ टूट गई। “तुम?”

गौरी ने आगे बढ़ कर माँ के पैर छुए। फिर बाउजी के।

धरमचंद के हाथ कँपते हुए गौरी के सिर पर गए। “मैंने तुम्हें ग़लत समझा। मैंने तुम्हें हराया। मैंने तुम्हारे सपनों को कुचला। क्षमा करना, बेटा।”

गौरी के आँसू बहने लगे। “बाउजी, मैं इसलिए आई हूँ क्योंकि न्याय देना मेरा काम है। और मैंने सीखा है कि न्याय सिर्फ़ दूसरों के लिए नहीं, घर के लिए भी होता है।”

“तुम हवेली में रहोगी?” माँ ने पूछा, रोते हुए।

“नहीं, माँ। मैं यहाँ ठहर नहीं सकती। पर मैं आऊँगी। बार बार। और बाउजी,” गौरी ने धरमचंद की तरफ़ सीधे देखा, “आपके सहायक की औरत को न्याय दिलवाऊँगी। भले ही उसका मतलब आपके पास की फ़ाइलें खोलनी पड़ें।”

धरमचंद ने कोई विरोध नहीं किया। बस सिर हिलाया।

“यही तो मैं चाहता हूँ, बेटा। यही तो मैं चाहता हूँ।”

अंतिम दृश्य:

एक साल बाद।

लाइब्रेरी का उद्घाटन। गौरी के आदेश से, उसी ज़िले में, पाँच नई पुस्तकालय खोली गई थीं। उनमें से एक का नाम रखा गया था, “आरव स्मारक पुस्तकालय।”

उद्घाटन के दिन, गौरी सफ़ेद साड़ी में खड़ी थी, और उसके साथ धरमचंद, माँ, और आरव की माँ।

उसने रिबन काटा, और अंदर गई। वही पुरानी जगह, पर अब नई किताबें, नई रोशनी।

दीवार पर एक तख़्ती:

“इस पुस्तकालय को समर्पित किया जाता है आरव को, जिसने जीवन की सबसे कठिन परिस्थितियों में भी सपना नहीं छोड़ा। यह हर उस लड़के और लड़की के लिए है जो बताया जाता है कि वे नहीं बन सकते, पर बन ही जाते हैं।”

लाइब्रेरियन ने गौरी से पूछा, “पहली किताब कौन सी खोलेंगी?”

गौरी ने सोचा, फिर “भारतीय संविधान” खोली।

उसी बेंच पर बैठ गई, जहाँ आरव के साथ बैठती थी। धरमचंद भी बैठ गए, पहली बार, अपनी बेटी के साथ, किताबें पढ़ने।

बाहर, शहर चलता रहा।

पर इस पुस्तकालय में, सिर्फ़ चुप्पी थी।

अच्छी चुप्पी।

वह चुप्पी जो सपनों की होती है।

अंतिम पंक्तियाँ:

गौरी की डायरी का आख़िरी पन्ना:

“आज मैं अपने सपने की कुर्सी पर बैठी हूँ। पर मैं जानती हूँ कि यह कुर्सी सिर्फ़ मेरी नहीं है। यह आरव की है, जो नहीं रहा इसे देखने के लिए। यह हर उस लड़की की है जिसे बताया जाता है कि उसका सपना गलत है। यह हर उस माँ की है जो अपनी बेटी को पंख दिखाना चाहती है, पर समाज पंजर दिखाता है।

बाउजी आज मेरे साथ पढ़ रहे हैं। माँ हँसते हुए बैठीं हैं। आरव की माँ मेरे बगल में हैं, और मुझ पर गर्व के साथ देख रहीं हैं।

मैंने सोने का पिंजरा तोड़ दिया। और उसी सोने से अपनी कलम बनाई।

अब मैं लिखती हूँ।

न सिर्फ़ अपने लिए, बल्कि सब के लिए।

क्योंकि न्याय सिर्फ़ कानून नहीं है।

न्याय एक सपना है, जो हर इंसान को जीने का हक़ देता है।”

किताब खत्म होती है, पर गौरी की कहानी नहीं।

क्योंकि असली कहानी तो उन हजारों लड़कियों की है, जिन्हें गौरी का न्याय अब तक मिल चुका है।

और जो अभी भी मिलना बाकी है।

THE END

“हवेली से दफ़्तर तक” एक ऐसी यात्रा है जहाँ सपने सिर्फ़ दिखते नहीं, जीते भी हैं।