Black magic या काला जादू एक प्राचीन मान्यता है, मनुष्य समाज में रहता है, तो समाज की मान्यता और श्रद्धा अंधश्रद्धा का उस पर भी प्रभाव होता है। समाज के इस प्रभाव को collective Consciousness यानी सामूहिक चैतन्य का प्रभाव कहते है, जिसकी सीधी असर मनुष्य की पसंद नापसंद और इच्छाओं पर होती है, जिसका प्रभाव सार्वजनिक होता है। कुछ नारे जैसे "हिंदू एकता या मुस्लिम समाज खतरे में है।"
इसका प्रभाव पूरे समाज पर होता है, राजनीति, सांप्रदायिकता ,मीडिया और मार्केटिंग में Collective Social Consciousness " का बहुत उपयोग किया जाता है, पुराने जमाने में पंडित पुरोहित या फकीर चमत्कारों और साक्षात्कारों की बाते इसी तरीके से लोगों तक पहुंचाते थे, मानसिक स्वास्थ्य और मनोविज्ञान के बारे में बहुत कम जानकारी होने से , मानसिक स्वास्थ्य की तकलीफों को भी काला जादू, तंत्र,मंत्र,भूत पिशाच का उपद्रव बताया जाता था। पुरखों में अगर कोई बुरी मृत्यु को प्राप्त हुआ हो तो उसकी अतृप्त इच्छा के नाम पर या सकारात्मक एवं नकारात्मक ऊर्जा के नाम पर आस्था और श्रद्धा का व्यापार होता था, जो आज भी चल रहा है।
अज्ञान, भय, लोभ और इच्छाओं से प्रभावित पढ़े लिखे और समझदार लोग भी भ्रामक मान्यताओं का शिकार होते है।
मनोविज्ञान तीन तरह की मानसिक समस्याओं को समझाता है।
(१) तनाव
(२) चिंता
(३) वर्तन पर आधारित बीमारियां Phycosis या behaviour Disorder
कहते है।
ब्लेक मैजिक या काला जादू एक मान्यता है, और यह मान्यता इंसान के वर्तन या व्यहवार को प्रभावित करती है, एक बार यह मान्यता घर कर जाए तो इसका अपना एक पैटन बनता है। एक हँसता खेलता व्यहवारिक और समझदार इंसान अचनक नजर दोष, सकारात्मक ऊर्जा,नकारात्मक ऊर्जा के प्रति बहुत सावधान हो जाता है।
और इसी से यंत्रों की और तंत्र ,मंत्र पर कार्य करने वाले तांत्रिक और ओझा की दुकानें चलती है।
आप की अपनी मान्यताएं ही आपके व्यहवार और वर्तन को प्रभावित करती है, आपका अपना दिमाग कहानियां गढ़ता है, घटनाओं को जोड़कर अर्थ निकालता है। और खुद ही उसमें फंस जाता है, फिर कभी कभी खुद से बाते करना, किसी और की आवाज निकालना, अजीब हरकते करना ,ज्यादा खाना, ज्यादा सोना, उदास रहना यह बाते आम हो जाती है, और आपके साथ जो रहते है, वह आपके इस बदले हुए व्यहवार को देख कर परेशान हो जाते है, आपको तांत्रिक, पंडित और मनोचिकित्सक दोनों के पास ले जाते है, कभी कभी किसी एक या दोनों के सामूहिक प्रयत्नों से आपको थोड़ी मदद मिलती है या कभी कभी आपका स्वास्थ्य और बिगड़ जाता है।
आप अपने आपे से बहार निकल जाते हो फिर आप औसत सामाजिक जीवन के लायक नहीं रहते।
इस स्थिति में आपको समाज या परिवार से सहानुभूति और तिरस्कार दोनों प्राप्त होते है।
आपकी अपनी मान्यताओं में ही भूत,प्रेत, आत्मा,पिशाच, भैरव, जगदंबा,हनुमान और अन्य उपद्रव होते है। इनका बहार कही भी कोई अस्तित्व नहीं है।
अपनी मान्यताओं को कैसे बदले इस विषय में सोचे, और कम से कम अपने आप को खुद ठीक करने की और कदम बढ़ाए क्यों की आपके अंतर को आप ही बिगाड़ सकते हो और आप ही ठीक कर सकते हो, किसी दूसरे का प्रभाव,चाहे वह डॉक्टर हो, या पंडित ओझा आपके साथ कुछ समय तक ही रहता है, आप को खुद ही खुद की मदद हेतु तैयारी करनी पड़ती है, हा, कुछ किस्सो में जब कोई आपे से पूरी तरह बहार हो जाता है तो डॉक्टर की सहायता जरूरी है परन्तु तांत्रिक ओझा तो सिर्फ और सिर्फ पाखंड है।