Do Patiyo ki Ladli Patni - 64 in Hindi Women Focused by Sonam Brijwasi books and stories PDF | दो पतियों की लाडली पत्नी - 64

Featured Books
  • વડનગર પુરાતત્વ મ્યુઝિયમ

    વડનગર હાટકેશ્વર મંદિર વિશે અત્રે લખી ગયો છું. ટૂંકમાં ફરી કહ...

  • રોકાણ - 5

    ભાગ ૫ — એક અધૂરું સપનુંડોક્ટરનો ફોન મૂક્યા પછી રમેશભાઈ થોડા...

  • Imege Time Mashin

    સોમનાથના દરિયા કિનારે અદ્રશ્ય થયેલી 'ટાઈમ-મશીન' વાન...

  • શૂન્યની બહાર - 11

    ભાગ 11 — પ્રથમ વિષય“હું નક્ષત્રનો પ્રથમ વિષય હતી.”નિષાના શબ્...

  • આનંદનગર : પ્રકરણ ૩૦

    પ્રકરણ ૩૦: દ્વારકાની યાદો અને આનંદનગરમાં પાવન 'લાલાના હિ...

Categories
Share

दो पतियों की लाडली पत्नी - 64

एक दिन करण की तबीयत अचानक बहुत बिगड़ गई…
तेज़ बुखार, कमजोरी और शरीर में दर्द था।डॉक्टर को बुलाया गया…

जांच के बाद डॉक्टर ने साफ कहा—
इन्हें टाइफाइड है… इन्हें पूरी तरह आराम चाहिए और किसी भी तरह का ज़्यादा संपर्क या थकान नहीं होनी चाहिए।

ये सुनकर श्रेया घबरा गई। डॉक्टर के जाने के बाद घर में खामोशी छा गई। करण बेड पर लेटा था…कमज़ोर सा, आँखें आधी बंद। श्रेया उसके पास बैठी थी…उसका हाथ पकड़े हुए। उसकी आँखों में डर साफ दिख रहा था।

श्रेया (धीमे) बोली - 
आप ठीक हो जाओगे ना…?

करण ने हल्के से सिर हिलाया।

करण बोला - 
हाँ…

लेकिन असल में वो बहुत कमजोर था। डॉक्टर की बात साफ थी उसे आराम और दूरी दोनों चाहिए थी…पर श्रेया…वो उससे दूर रह ही नहीं पाई। वो पूरे दिन उसके पास बैठी रहती…कभी उसके सिर पर पट्टी रखती…कभी दवा देती…कभी बस उसका हाथ पकड़े रहती।

रात में भी…वो उसके पास ही लेट जाती…और धीरे से उसे अपनी बाँहों में ले लेती।

करण कमजोर आवाज़ में बोलता—
श्रेया… डॉक्टर ने मना किया था…

श्रेया (नरमी से) बोली - 
चुप रहो… आराम करो…

उसने उसे और करीब खींच लिया…

श्रेया बोली - 
मैं दूर रहूँगी तो आप ठीक कैसे होंगे?

करण कुछ नहीं बोल पाया…उसकी आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगीं…और श्रेया उसे संभाले रही…पूरी रात…जैसे वो सिर्फ एक मरीज नहीं था…बल्कि उसकी दुनिया था…और वो उसे छोड़ना नहीं चाहती थी…॥

कुछ दिनों बाद करण की तबीयत धीरे-धीरे ठीक होने लगी…उसकी कमजोरी कम हो गई थी और वह फिर से पहले जैसा महसूस करने लगा था। श्रेया अब भी उसकी बहुत care करती थी…पर अब डर थोड़ा कम हो गया था।

एक शाम…घर में सुकून का माहौल था। करण सोफे पर बैठा था…और श्रेया उसके पास ही चाय लेकर आई।
तभी फोन बजा…

स्क्रीन पर नाम आया— कबीर
करण ने कॉल उठाया।

कबीर की आवाज़ आई—
भैया… अब तबीयत ठीक है ना आपकी?

करण हल्का सा मुस्कुराया…

करण बोला - 
हाँ… अब ठीक हूँ।

कबीर ने राहत की सांस ली।

कबीर बोला - 
श्रेया आपको परेशान तो नहीं कर रही?

ये सुनते ही श्रेया ने तुरंत करण को घूरा। करण हल्का सा हँस पड़ा…

करण बोला - 
नहीं… अब तो वही मेरा ख्याल रखती है।

कबीर भी मुस्कुरा दिया।

कबीर बोला - 
अच्छा है…

फिर थोड़ी देर रुककर बोला—
मैं जल्दी वापस आ जाऊंगा…

श्रेया ने ये बात सुनकर हल्की सी खुशी महसूस की…
पर उसने कुछ कहा नहीं। करण ने उसकी तरफ देखा…

और धीरे से बोला—
ठीक है… अपना ध्यान रखना।

कॉल कट हो गई। कमरे में फिर से सन्नाटा छा गया।
श्रेया चुपचाप बैठी रही…

फिर धीरे से बोली—
कबीर जी को बहुत याद आ रही है…

करण ने सिर हिलाया।

करण बोला - 
हाँ…

थोड़ी देर बाद करण ने उसका हाथ पकड़ लिया।

करण बोला - 
हम तीनों जब साथ होते हैं… घर पूरा लगता है…

श्रेया हल्का सा मुस्कुराई…

श्रेया बोली - 
हाँ…

उस पल दोनों को ही एहसास था…कि भले ही दूरी हो जाती है…पर उनका रिश्ता हमेशा उन्हें फिर से जोड़ लेता है…॥

समय धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था…घर का माहौल अब बदल चुका था। करण और श्रेया के बीच अब वो दूरी नहीं थी जो पहले डर और झिझक की वजह से थी…
अब उनके बीच एक समझ थी… एक भरोसा था।
दोनों एक-दूसरे के साथ और सहज हो गए थे…
छोटी-छोटी बातों में भी अपनापन झलकने लगा था।

श्रेया अब पहले से ज्यादा खुलकर मुस्कुराती थी…
और करण अब पहले से ज्यादा शांत और स्थिर हो गया था। दोनों के बीच धीरे-धीरे एक रिश्ता गहराता जा रहा था…जो अब सिर्फ साथ रहने का नहीं…बल्कि एक जिम्मेदारी और अपनापन बन चुका था।

एक शाम…श्रेया किचन में थी और करण पास ही बैठा उसे देख रहा था।

श्रेया (हल्की मुस्कान के साथ) बोली - 
अब आप मुझे पहले से ज्यादा समझने लगे हो…

करण ने धीरे से उसकी तरफ देखा।

करण बोला - 
शायद…

श्रेया बोली -
शायद नहीं… पक्का…

करण हल्का सा मुस्कुरा दिया। वो सच था…अब दोनों एक-दूसरे को महसूस करने लगे थे, समझने लगे थे।
उनके बीच भरोसा इतना गहरा हो चुका था…कि अब साथ होना ही आदत बन गया था।

इसी बीच…कबीर अब भी मुंबई में था। काम में व्यस्त… और घर से दूर। उसे अंदाजा भी नहीं था कि घर के अंदर कितना कुछ बदल रहा है…

रात के समय…कबीर अपने कमरे में अकेला लेटा हुआ था…और उसके हाथ में श्रेया की एक तस्वीर थी। वो उसे देखकर हल्का सा मुस्कुराया…

कबीर (धीमे) बोला - 
घर जल्दी आना चाहिए…

और फिर उसने वो फोटो अपने सीने से लगा ली…जैसे दूरी कम करने की कोशिश कर रहा हो…पर उसे क्या पता था…कि घर में हालात धीरे-धीरे एक नए मोड़ पर पहुँच रहे थे…और रिश्तों की ये उलझन…अब और भी गहरी होती जा रही थी…॥

वहीं इसी बीच करण और श्रेया रातों को बहुत करीब आ जाते थे। और रात भर एक दूसरे के बन जाते थे। वो जैसे किसी नशे में डूब जाते थे। वो दोनों एक दूसरे के करीब आने से खुद को रोक नहीं पाते थे। श्रेया सिसकियां लेती थी करण अपना काम और जेंटल कर देता। और ये उनके बीच बहुत बार हो चुका था। 

कुछ दिनों बाद घर का माहौल थोड़ा अलग सा हो गया था…श्रेया पिछले दो-तीन दिन से ठीक महसूस नहीं कर रही थी। उसे बार-बार उल्टियाँ हो रही थीं…और शरीर भी बहुत कमजोर लग रहा था। करण ने जब ये देखा तो वह तुरंत चिंतित हो गया।

करण (हल्के घबराकर) बोला - 
श्रेया… ये सब कब से हो रहा है?

श्रेया ने पहले टालने की कोशिश की…लेकिन कमजोरी बढ़ती जा रही थी। फिर डॉक्टर को बुलाया गया…कुछ टेस्ट के बाद…

डॉक्टर ने मुस्कुराकर कहा—
बधाई हो… ये प्रेग्नेंसी है।

एक पल के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया। श्रेया की आँखें थोड़ी नम हो गईं…और करण कुछ सेकंड तक बस उसे देखता रहा। फिर धीरे-धीरे उसके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आ गई…

करण (धीमे) बोला - 
हम…

श्रेया ने हल्का सा सिर हिलाया…

श्रेया बोली - 
हाँ…

करण ने उसका हाथ पकड़ लिया…उस पल दोनों के चेहरे पर खुशी थी…पर साथ ही एक हल्की सी चिंता भी थी…क्योंकि सब कुछ अचानक बदल गया था।

करण (धीरे) बोला - 
कबीर…

ये नाम आते ही माहौल थोड़ा गंभीर हो गया। श्रेया की मुस्कान हल्की पड़ गई…वो कुछ नहीं बोली। करण ने गहरी सांस ली…

करण बोला - 
उसे कैसे बताएंगे…

कमरे में फिर खामोशी छा गई…खुशी तो थी…पर उसके साथ एक सवाल भी था…कि जब कबीर वापस आएगा…तो यह सच रिश्तों को किस मोड़ पर ले जाएगा…॥