आज मन काफी उदास है। मुझे प्रयागराज के एक छोटे से कमरे में रहते हुए लगभग तीन साल हो गए हैं। इस बंद कमरे में रहते-रहते अब मन में बार-बार यही सवाल उठता है कि आखिर और कब तक? कब तक सरकारी नौकरी के इस अंतहीन मृगतृष्णा के पीछे दौड़ा जाए? कब तक अपनी ऊब और छटपटाहट को इस चारदीवारी में कैद रखा जाए? और सबसे बड़ा सवाल—कब तक घर वालों के पैसों पर रोटी तोड़ी जाए? कुछ समझ नहीं आता।
ऐसे सवाल अब आए दिन मेरे मन में उठने लगे हैं, या शायद यूं कहें कि उन्होंने मेरे भीतर अपना एक स्थायी घर बना लिया है। ये सवाल बिना समय देखे, बिना इजाज़त मांगे अचानक मेरे सामने आकर खड़े हो जाते हैं, और अफ़सोस कि मेरे पास इनका कोई सही उत्तर नहीं होता। हाल ही में पहली बार मैंने सरकारी नौकरी के अलावा कोई दूसरा काम खोजने की हिम्मत की। मैं कमरे से बाहर निकला और डरते-डरते, मन में ढेरों सवाल लिए लोगों से पूछने लगा, "क्या आपके पास मेरे लिए कोई काम है?" हर तरफ से एक ही रूखा जवाब मिलता—"नहीं है।"
इन्हीं मानसिक उलझनों और आत्मग्लानि के चलते मैंने घर से पैसे लेना भी बंद कर दिया है। लेकिन अब संकट यह है कि अगर घर से पैसे न आएं, तो रुपए आएं कहां से? बाहर कोई काम भी नहीं मिल रहा और कमरे का किराया भी एक महीने से दूसरे महीने पर टलता जा रहा है। मैंने काम की तलाश में कई ऑनलाइन ग्रुप्स खोजे, इंस्टाग्राम पर न जाने कितने लोगों को मैसेज किए। मानो काम के लिए गिड़गिड़ाते हुए मैंने उनसे कहा कि "मैंने हिंदी साहित्य से एम.ए. किया है, अगर कोई भी काम हो तो कृपया मुझे दे दीजिए।" इसके अलावा, अपनी पढ़ाई के लिए मैंने कुछ लोगों से जो कर्ज़ लिया था, मुझे उसका भी भुगतान करना था।
कमरे का किराया समय पर न दे पाने के कारण मुझे मकान मालिक के सामने झुकने की आदत हो गई है। उसे जब भी अपनी किसी ज़रूरत के लिए किसी व्यक्ति की तलाश होती, वह मुझे बुला लेता और मैं चाहकर भी उसे 'ना' नहीं कह पाता था। उसने कई बार मुझे काम दिलाने के अलग-अलग बहाने बनाए और अपना काम कराता रहा, लेकिन मेरे लिए काम का कोई जरिया नहीं ढूंढा।
इसी बीच, ऑनलाइन माध्यम से मुझे एक पिज़्ज़ा आउटलेट में काम मिला। वहां बात पक्की हुई और उन्होंने मुझे बुला लिया। मुझे भी लगा कि चलो कुछ तो सहारा मिला, बस समस्या यह थी कि वह जगह मेरे कमरे से काफी दूर थी। मेरे पास इतने पैसे भी नहीं थे कि मैं मकान मालिक का पुराना किराया चुकाकर उस आउटलेट के पास कोई नया कमरा ले सकूं। मजबूरन, मैं रोज़ शाम छह बजे वहां जाता और रात के दो बजे काम खत्म करके निकलता था। साधन न होने के कारण रात के 3 बजे तक पैदल चलते हुए अपने कमरे पर पहुंच पाता।
एक दिन मैंने अपने एक दोस्त से साइकिल मांगी। उसने दी भी, लेकिन बदकिस्मती से उसी रात रास्ते में वह खराब हो गई। अगले दिन से दोस्त ने साइकिल देने से मना कर दिया। फिर क्या था, दोबारा पैदल आने-जाने का सिलसिला शुरू हो गया। कुछ ही दिनों में इस हाड़-तोड़ मेहनत और मानसिक तनाव के कारण मैं बीमार पड़ गया और काम पर नहीं जा सका। यही वजह रही कि होटल प्रबंधन ने मेरा हिसाब किए बिना ही मुझे नौकरी से निकाल दिया।
अब मेरे सामने दूसरा कोई विकल्प नहीं था मैं कमरे में लौटकर वहां रखी भगवान की मूर्तियों के सामने जितना रोया जा सकता था रोया। वैसे भी, जब भी मैं अकेला होता हूं, अक्सर रो लिया करता हूं। मेरे मन में बार-बार यह यक्ष प्रश्न कौंधता है कि हमें काम क्यों नहीं मिल रहा? इतनी बेरोज़गारी क्यों है? हम ऐसे क्यों हैं कि अपना कोई छोटा-मोटा काम भी शुरू नहीं कर सकते?
धीरे-धीरे मुझे यह कड़वी हकीकत समझ में आने लगी कि जो किताबें हमने सरकारी नौकरी के लिए पढ़ी हैं, उनका प्राइवेट सेक्टर में कोई खास महत्व नहीं है। इसीलिए या तो काम मिलता ही नहीं, और अगर मिल भी जाए तो वेतन बेहद कम होता है। प्राइवेट सेक्टर को जिस तरह के 'स्किल्ड' लोगों की ज़रूरत होती है और जिन्हें वे अच्छा पैकेज देते हैं, वे छात्र बड़े और नामी संस्थानों से पढ़े होते हैं।
लेकिन जो छात्र एक साधारण सरकारी स्कूल से दसवीं-बारहवीं करने के बाद, गांव के किसी कॉलेज से बी.ए. करता है और फिर एक बड़े शहर में आकर अपनी जवानी के सबसे अनमोल साल सरकारी नौकरी की तैयारी की भट्टी में झोंक देता है, उसे कौन काम देगा? उसके पास सिर्फ दो ही रास्ते बचते हैं—या तो उसकी सरकारी नौकरी लग जाए, या फिर वह कहीं मजदूरी करे या घर लौट जाए। इसके अलावा कोई तीसरा रास्ता दिखाई नहीं देता।
ऊपर से ये बड़ी-बड़ी कोचिंग संस्थाएं अपने व्यावसायिक स्वार्थ के लिए लड़कों/लड़कियों को दिलासा देती रहती हैं—"इस साल नहीं हुआ तो अगले साल होगा, इसमें नहीं तो किसी और परीक्षा में होगा।" सरकारें भी समय पर नौकरियां नहीं निकाल पातीं और न ही युवाओं की प्रतिभा के लिए अलग-अलग प्लेटफॉर्म दे पाती हैं। नतीजा यह होता है कि ये कोचिंग संस्थान और व्यवस्था मिलकर युवाओं को सिर्फ तैयारी का ढोंग और नौकरी का एक झूठा ख्वाब बेचते रहते हैं।
इसी उदास और हताश मन के साथ मैंने एक बार फिर जॉब के लिए बात की। वह एक '10-मिनट फास्ट डिलीवरी' देने वाली मशहूर कंपनी थी। मैं अपना रिज्यूम लेकर वहां गया। उन्होंने मेरा इंटरव्यू इस तरह लिया जैसे वे मेरी उम्मीद से ज्यादा वेतन देंगे। मेरा चयन हो गया और मैंने उनकी तीन दिनों की ट्रेनिंग भी ज्वाइन कर ली। सब कुछ ठीक लग रहा था, लेकिन जब जमीनी हकीकत से सामना हुआ तो पैरों तले जमीन खिसक गई। चूंकि वह स्टोर नया-नया खुला था, इसलिए वेयरहाउस से आने वाले ट्रकों को खाली करने का भारी काम भी वे हमीं से कराने लगे। मेरे पूरे ग्रुप के लड़के, जिन्होंने मेरे साथ ज्वाइन किया था, इस शारीरिक शोषण को ज्यादा दिन नहीं झेल पाए और हम सबने एक हफ्ते के भीतर वह काम भी छोड़ दिया।
मैंने इंस्टाग्राम, फेसबुक और न जाने कितने अनजान लोगों को संदेश भेजे कि मुझे किसी उचित काम की आवश्यकता है, लेकिन कहीं से भी कोई ठोस सहायता प्राप्त नहीं हुई। वह समय ऐसा था जब मन का भटकाव इतना गहरा चुका था कि मुझे कमरे के पंखे को देखकर भी डर लगने लगता था। डर लगता था कि कहीं मेरी इस पंखे से नजदीकियां न बढ़ जाएं और उसके बाद मैं इस दुनिया को दोबारा कभी न देख पाऊं।
मुझे लिखना पसंद था, उस कठिन दौर में भी मैं लिख रहा था और आज भी लिखता हूं। यह लेखन अब सिर्फ मेरी आदत या शौक नहीं, बल्कि इस अंतहीन अंधेरे भंवर के खिलाफ मेरा एक मौन विद्रोह है। यह मेरी वो उम्मीद है जो मुझे पंखे की तरफ देखने से रोकती है और दोबारा जीने का हौसला देती है। मैं लिखता रहूंगा; क्योंकि जब तक मेरे पास मेरे शब्द हैं, मैं हारा नहीं हूं।
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एक कमरे में विनोद और वेदना के संग जीना कैसा होता है?
वर्षों तक एक ही जगह घुटते रहना… आखिर कैसा होता है?
आंतरिक उत्कर्ष के बिना, सामाजिक मूल्यों का बोझ ढोना कैसा होता है?
आदमी जब अभाव के उस चरम से गुजरता है,
जहाँ शौच तक के लिए ‘पाँच रुपये’ कम कराने की जद्दोजहद हो—
सोचो, वह दौर कैसा होता है?
सचमुच, बोध के बिना जीना कितना अजीब है!
मन में द्वंद्व है, विचलन है, जिज्ञासा है,
पर कहीं ठहराव नहीं; और हो भी, तो किसके आसरे?
जहाँ ठहराव है, वहाँ न वृद्धि है, न सत्य, न खोज,
मन बिना उद्देश्य बस भागता है… निरंतर भागता जाता है।
न इसे पदार्थ में चैन है, न कल्पनाओं में सुकून,
यह अंतहीन खोज की डगर पर बस चलते रहना चाहता है।
-कपिल तिवारी “यथार्थ”