1926 ki Amavas ki wo Khouffnak raat - 4 in Hindi Horror Stories by RAAHULL SHARMA books and stories PDF | 1926 की अमावस की वो खौफनाक रात - 4

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1926 की अमावस की वो खौफनाक रात - 4

समय धीरे-धीरे आगे बढ़ा। रात के ठीक 2:00 बजे, जब पूरा महल, सारे पहरेदार, सैनिक और दरबारी गहरी और बेफिक्र नींद में सो रहे थे, तब देवपुर राजमहल के इतिहास का सबसे अकल्पनीय और भयावह मंज़र शुरू हुआ।


अचानक, सोए हुए सैनिकों के कमरों और पहरेदारों की चौकियों से एक साथ तड़पने और छटपटाने की दबी-दबी आवाज़ें आने लगीं।


सन्नाटे को चीरती हुई मौत की यह मूक चीखें रोंगटे खड़े करने वाली थीं। जो सैनिक सोए हुए थे, वे सोते ही रह गए... और जो जाग रहे थे, उनकी आँखें खौफ से फटी की फटी रह गईं।


हर एक सैनिक, हर एक पहरेदार और महल के हर एक मर्द के पेट के ठीक बीचों-बीच... अचानक हवा में से एक पुरानी, जंग लगी हुई भारी तलवार प्रकट हुई और उनकी खाल को चीरती हुई पेट के आर-पार हो गई!


'शशश... छपाक!'


वही जंग लगी तलवार, जिससे रूपमती ने अपने प्राण त्यागे थे, अब एक साथ सैकड़ों सैनिकों के पेट में धंसी हुई थी। किसी को संभलने का मौका तक नहीं मिला।


 पूरे महल के फर्श पर खून की नदियां बहने लगीं। रूपमती का श्राप शुरू हो चुका था—उसने कहा था कि वह इस महल के हर एक मर्द को मार डालेगी, और उसने अपनी शुरुआत राजा की सबसे बड़ी ताकत, उसके सैनिकों से की थी।


सैनिकों का खात्मा करने के बाद, रूपमती की तड़पती हुई रूह हवा में तैरती हुई सीधे मंत्री बुक्का सोलंकी के शयनकक्ष में पहुंची।


 बुक्का सोलंकी अपनी पत्नी के बगल में बड़े आराम से गहरी नींद सो रहा था। उसकी पत्नी को भनक तक नहीं लगी, जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने उसका मुंह और आंखें मूंद दी हों।


 तभी, हवा में वही जंग लगी भारी तलवार लहराई और 'छपाक...' की भयानक आवाज़ के साथ सीधे बुक्का सोलंकी के पेट के आर-पार हो गई। सोलंकी के मुंह से एक मूक चीख निकली और उसके पापों का अंत हो गया।



रूपमती की आत्मा अब काल बन चुकी थी। वह इस महल के भीतर किसी भी मर्द को छोड़ने के मूड में नहीं थी। 


उम्र का कोई पैमाना नहीं था—चाहे कोई 100 साल का बुजुर्ग हो, 50 साल का दरबारी, 35 साल का सैनिक, 16 साल का किशोर या फिर महज 1 दिन पहले जन्मा नवजात बालक ही क्यों न हो—वह हर उस शख्स को मौत की नींद सुलाती जा रही थी।

जिसके भीतर पुरुष का अंश था। वह इस महल में अब किसी मर्द का साया भी बर्दाश्त नहीं करना चाहती थी।



इसके बाद, वह रूह सीधे महाराज देववर्धन के भव्य कक्ष में दाखिल हुई। राजा बिना किसी चिंता के, मखमली बिस्तरों पर बड़े आराम से सो रहा था।


 उसे अंदाजा भी नहीं था कि उसके पापों का घड़ा भर चुका है और पूरा महल लाशों के घर में तब्दील हो चुका है।


रूपमती राजा के बिस्तर के पास खड़ी हो गई। उसकी सफेद खूनी आँखें राजा को घूर रही थीं। सबसे पहले, वह राजा के सपने में दाखिल हुई।


सपने में राजा ने देखा कि चारों तरफ धुंध है और रूपमती खून से लथपथ उसके सामने खड़ी है। उसकी भयानक गूंजती आवाज़ राजा के कानों में फटने लगी—"उठ देववर्धन... उठ राजा!


 तूने मेरा हंसता-खेलता जीवन नष्ट कर दिया, मेरे बूढ़े माता-पिता को अनाथ और बेसहारा बना दिया... और तू यहाँ चैन की नींद सो रहा है? तू चैन से नहीं जी सकता! देख, आज मैं तेरा अंत करने आई हूँ।


 तूने सिर्फ मेरे इस नश्वर शरीर को मारा था, लेकिन तू मेरी आत्मा को नहीं मार सकता! अब इस महल पर सिर्फ मेरा कब्जा होगा, और तेरा कोई भी वारिस इस गद्दी पर नहीं बैठ पाएगा!"


सपने में ही रूपमती ने वही जंग लगी तलवार हवा में उठाई और पूरी ताकत से राजा के पेट में घोंप दी।
"आह...!"


जैसे ही राजा की आँखें खुलीं, वह सपना हकीकत बन चुका था! सचमुच, वही भारी और जंग लगी तलवार उसके पेट के आर-पार धंसी हुई थी।


 राजा के मुंह से खून का फव्वारा छूटा, लेकिन रूपमती के जादू के कारण उसके हलक से कोई आवाज़ बाहर नहीं आ सकी। 


वह तड़पता रहा, पर बगल में सोई महारानी रुक्मिणी को इस खूनी खेल की भनक तक नहीं लगी। राजा देववर्धन ने तड़प-तड़प कर अपने प्राण त्याग दिए।


महल के सभी पुरुषों—चाहे वह 10 साल का बच्चा हो या 40 साल का मर्द—सबका अंत करने के बाद रूपमती की आत्मा आगे बढ़ ही रही थी कि तभी अचानक उसके कानों में एक नन्ही सी किलकारी गूंजी।


"उअँ... उअँ... आहाहा..."


उसने मुड़कर देखा। सामने पालने में महारानी रुक्मिणी का 3 महीने का छोटा राजकुमार लेटा हुआ था। वह बालक दिखने में बेहद खूबसूरत और तेजस्वी था। 


जैसे ही रूपमती की डरावनी, सफेद आँखों वाली रूह उस बच्चे के करीब पहुंची, वह मासूम बच्चा डरा नहीं। बल्कि वह अपनी भोली सी मुस्कान के साथ हंसने लगा और अपने नन्हे-नन्हे हाथ हवा में उठाकर रूपमती को अपने पास बुलाने का इशारा करने लगा।


रूपमती ने उस बच्चे को मारने के लिए भी हवा में तलवार उठाई। तलवार की नोक बच्चे के पेट की तरफ बढ़ी... लेकिन ठीक उसी पल, रूपमती के कदमों के साथ-साथ उसकी रूह भी कांप उठी।


उसे गुज़रा हुआ वक्त याद आ गया। उसे याद आया कि कैसे उसने इस नन्हे राजकुमार को अपने हाथों से गोद में खिलाया था, उसे लोरियां सुनाई थीं। 


यह उस महारानी रुक्मिणी का बेटा था, जो रूपमती को दासी नहीं बल्कि अपनी छोटी बहन मानती थी, जिसने उसे हमेशा बेइंतहा प्यार और सम्मान दिया था।


 महारानी की ममता और उस मासूम बच्चे की निश्छल हंसी के आगे रूपमती के भीतर का खौफनाक प्रतिशोध पल भर में पिघल गया।


उसकी आँखों से खून के आंसू बह निकले। उसने तलवार को धीरे से पीछे खींच लिया। वह समझ गई कि यह बच्चा निर्दोष है और इसकी माँ का उस पर बहुत बड़ा कर्ज है।


 रूपमती ने उस 3 महीने के छोटे राजकुमार को जिंदा छोड़ दिया। वह पूरे महल में इकलौता जीवित मर्द बचा था।