समय जैसे पंख लगाकर उड़ गया…पूरा नौ महीने का सफर कब गुजर गया, किसी को पता ही नहीं चला।
घर में अब एक अलग ही माहौल था…खुशी भी थी और बेचैनी भी। उस दिन सुबह से ही श्रेया को तेज़ दर्द शुरू हो गया था…वो धीरे-धीरे सहम रही थी…और उसकी हालत देखकर करण तुरंत समझ गया।
करण (घबराकर) बोला -
श्रेया… ये दर्द…
श्रेया ने किसी तरह सिर हिलाया…उसकी आँखों में दर्द साफ दिख रहा था। कबीर भी वहीं था…और दोनों भाई एकदम तनाव में आ गए। बिना देर किए…
दोनों उसे लेकर अस्पताल भागे।
हॉस्पिटल के रास्ते में…गाड़ी की स्पीड बढ़ी हुई थी…श्रेया पीछे बैठी थी…और दोनों भाई उसके दोनों तरफ बैठे थे। करण का चेहरा सख्त था…पर आँखों में चिंता साफ झलक रही थी। कबीर बार-बार पीछे मुड़कर उसे देख रहा था…।
कबीर (धीमे, बेचैन होकर) बोला -
सब ठीक होगा ना…
करण ने उसकी तरफ देखा…और सिर्फ सिर हिला दिया।
अस्पताल पहुँचते ही…स्टाफ तुरंत श्रेया को अंदर ले गया।
स्टाफ बोला -
Patient in labor…
ये सुनते ही दोनों भाई बाहर रुक गए…और दरवाज़ा बंद हो गया। अंदर से श्रेया की दर्द भरी आवाज़ कभी-कभी बाहर आ रही थी…और बाहर…करण और कबीर दोनों खड़े थे…बिल्कुल चुप…
लेकिन दोनों के चेहरे पर एक ही बात थी—
डर…और बेबसी…करण ने मुट्ठी भींच ली…
करण (धीमे) बोला -
काश मैं उसके दर्द को कम कर पाता…
कबीर ने नीचे देखा…
कबीर बोला -
वो बहुत स्ट्रॉन्ग है…
दोनों भाई वहीं खड़े रहे…हर गुजरते पल के साथ
उनकी बेचैनी और बढ़ती जा रही थी…॥
कुछ घंटे बाद हॉस्पिटल के कमरे में एक अलग ही सन्नाटा था…बस मशीनों की हल्की आवाज़ और फिर अचानक…एक बच्चे के रोने की आवाज़ गूंज उठी।
दोनों भाई दरवाज़े की तरफ भागे…
नर्स ने मुस्कुराते हुए नवजात बच्चे को बाहर लाकर कहा—
बधाई हो… लड़का हुआ है…
क्षण भर के लिए दोनों के चेहरे पर राहत और खुशी एक साथ आ गई। कबीर की आँखें नम हो गईं…और करण ने हल्की सी मुस्कान के साथ साँस ली।डॉक्टर और नर्स बच्चे को अंदर से बाहर लेकर आए…
और करण ने धीरे से उसे लिया। वो एक पल उसे देखता रहा…फिर बिना कुछ बोले…उसने बच्चे को कबीर की गोद में रख दिया। कबीर एकदम चौंक गया…
कबीर (धीमे) बोला -
भैया…
करण ने उसकी तरफ देखा…उसकी आँखों में एक गहरी समझ थी।
करण (शांत आवाज़ में) बोला -
मुझसे ज्यादा इसका हक तेरा है, कबीर…
कबीर कुछ नहीं बोल पाया…
करण आगे बोला—
अगर तुम उस वक्त space ना देते…
तो आज ये बच्चा हमारी गोद में नहीं होता…
कमरे में सन्नाटा छा गया…कबीर ने बच्चे को देखा…
उसका हाथ हल्का सा काँप रहा था…
कबीर (धीमे) बोला -
भैया… मैं…
पर शब्द रुक गए…उसने बच्चे को और कसकर पकड़ लिया…उसकी आँखों से एक बूंद गिर गई…करण ने उसके कंधे पर हाथ रखा…
और हल्के से बोला—
अब सब ठीक है…
दरवाज़े के पीछे श्रेया आराम कर रही थी…और अंदर इस पल में…तीनों की ज़िंदगी का एक नया अध्याय शुरू हो चुका था…॥
अस्पताल के कमरे में हल्की-सी शांति थी…श्रेया बेड पर आराम से लेटी हुई थी… चेहरे पर थकान थी, पर आँखों में सुकून भी। बाहर से थोड़ी-थोड़ी आवाज़ें आ रही थीं…लेकिन कमरे के अंदर एक अलग ही अपनापन था। कबीर धीरे से अंदर आया…उसकी गोद में नवजात बच्चा था।
उसने बहुत संभालकर बच्चे को पकड़ा हुआ था…जैसे उसे डर हो कि कहीं उसे चोट न लग जाए। श्रेया ने बच्चे को देखा…उसकी आँखों में आँसू और मुस्कान
साथ-साथ आ गए।
श्रेया (धीमे) बोली -
इधर लाओ…
कबीर मुस्कुराया और धीरे से आगे बढ़ा…और बच्चा उसके पास रख दिया। श्रेया ने उसे अपनी बाहों में ले लिया…और आँखें बंद कर लीं… जैसे वो पल को महसूस कर रही हो।
थोड़ी देर बाद…दरवाज़ा फिर खुला…करण अंदर आया। वो सीधे श्रेया के पास आया…और उसके बगल में कुर्सी खींचकर बैठ गया। करण कुछ पल उसे देखता रहा…
फिर धीरे से बोला—
कैसी हो अब?
श्रेया ने हल्की मुस्कान दी…
श्रेया बोली -
अब ठीक हूँ…
कबीर वहीं खड़ा था…बच्चे को देख रहा था…उसकी आँखों में एक अजीब-सी शांति थी…और साथ में हल्का सा भावुकपन भी। करण ने धीरे से बच्चे की तरफ देखा…और फिर श्रेया की तरफ।कमरे में कोई जल्दी नहीं थी…कोई आवाज़ नहीं थी…बस एक नई ज़िंदगी की हल्की-सी खुशबू थी…और तीनों के बीच एक नया संतुलन…जो अब और भी मजबूत हो चुका था…॥
कुछ दिन बाद तीनों घर लौट आए थे…घर में फिर से वही अपनापन लौट आया था, लेकिन अब सबकी जिम्मेदारियाँ बदल चुकी थीं।
रात का समय था…हल्की-हल्की ठंडक थी और घर में सन्नाटा फैला हुआ था।
श्रेया अभी भी थोड़ा कमजोर थी…और बच्चा गोद में आने के बाद उसकी नींद भी टूट-टूटकर आ रही थी।
करण बेडरूम में खड़ा था…बच्चे को धीरे-धीरे गोद में लिए हुए।
वो हल्की आवाज़ में बोला—
श्रेया… तुम दूसरे कमरे में कबीर के साथ सो जाओ…
श्रेया ने चौंककर उसकी तरफ देखा।
करण ने आगे कहा—
तुम अभी कमजोर हो… रात भर उठ-उठकर परेशान हो जाओगी…और ये रात में रोता है…
उसने बच्चे की तरफ देख कर हल्के से मुस्कुराया।
करण बोला -
मैं संभाल लूँगा…
फिर उसने बहुत शांत स्वर में कहा—
मेरा बच्चा…
उसके इस शब्द में एक अजीब सा अपनापन था…पर साथ ही एक जिम्मेदारी भी। कबीर जो पास ही खड़ा था, चुपचाप सुन रहा था… करण ने उसकी तरफ देखा।
उसकी नजरें साफ थीं जैसे वो कहना चाहता हो कि अब वक्त है थोड़ा space देने का…कबीर ने हल्का सा सिर हिलाया…उसके चेहरे पर समझ थी, और थोड़ी सी भावुकता भी। श्रेया कुछ पल चुप रही…
फिर धीरे से बोली—
और आप…?
करण हल्का सा मुस्कुराया।
करण बोला -
मैं यहीं हूँ…तुम दोनों आराम करो…
उसने धीरे से बच्चा पालने में रखा…और कमरे की लाइट हल्की कर दी। फिर वह पीछे हट गया…लेकिन उसकी आँखों में एक सुकून था…कि वो सिर्फ पिता ही नहीं…बल्कि पूरे घर की चुपचाप जिम्मेदारी उठाने वाला इंसान बन चुका है…॥
रात काफी देर हो चुकी थी…घर में हर तरफ सन्नाटा था, बस एक कमरे से बच्चे के रोने की आवाज़ बार-बार गूंज रही थी। करण कमरे में अकेला बैठा था…गोद में बच्चा लिए हुए। वो उसे बार-बार शांत करने की कोशिश कर रहा था…हल्के से थपकियाँ देता, धीरे-धीरे झुलाता…
करण (धीमे, थककर भी प्यार से) बोला -
शांत हो जा बेटा… अब तो सो जा…
कुछ देर बच्चा चुप हो जाता…फिर जैसे ही करण की आँखें झपकतीं…फिर से रोने लगता। करण हल्की सी सांस छोड़ता…और फिर से उसे संभालने लगता।
उधर दूसरे कमरे में…श्रेया कबीर की बाहों में लेटी थी…
पर दोनों की आँखों में नींद नहीं थी। बच्चे की रोने की आवाज़ बार-बार उनके दिल को बेचैन कर रही थी।
श्रेया (धीमे) बोली -
वो अकेले कैसे संभाल रहे होंगे…
कबीर चुप रहा…
फिर धीरे से बोला—
भैया हमेशा ऐसे ही हैं…
दोनों कुछ देर चुप रहे…फिर श्रेया धीरे से उठी…और कबीर के साथ कमरे के बाहर झाँकने लगी।अंदर करण अब भी जाग रहा था…आँखों में थकान साफ दिख रही थी…पर उसने उन्हें देखते ही हल्के से मुस्कुरा दिया।
करण (धीमे, मना करते हुए) बोला -
तुम लोग जाओ… मैं संभाल लूँगा…
श्रेया बोली -
आप सो नहीं रहे हो…
करण ने हल्की सी हँसी के साथ जवाब दिया—
कोई बात नहीं…
वो बच्चे को फिर से झुलाने लगा…
और धीरे से बोला—
देखो… ये बिल्कुल अपनी माँ पे गया है…
श्रेया हल्की सी मुस्कुरा दी…पर उसकी आँखें नम हो गईं। कबीर चुपचाप खड़ा था…और करण को देख रहा था। उसके चेहरे पर एक ही बात थी प्यार… और गहरा सम्मान। करण अकेला था उस रात…पर उसने किसी को भी अपने जिम्मे से दूर नहीं किया…और उसी खामोशी में…वो एक पूरा परिवार संभाल रहा था…॥
धीरे-धीरे रात और गहरी हो गई…बच्चा भी अब थककर आखिरकार सो गया था। करण ने राहत की सांस ली…
और बहुत संभलकर उसे पालने में लिटा दिया।उसके चेहरे पर थकान साफ थी…आँखें भारी हो रही थीं…
वो कुर्सी पर बैठ गया और सिर पीछे टिका दिया। कुछ ही सेकंड में उसकी आँखें बंद होने लगीं…
तभी दरवाज़ा धीरे से खुला…श्रेया अंदर आई…और उसके हाथ में एक गिलास दूध था। वो चुपचाप उसके पास बैठ गई।
श्रेया (धीमे) बोली -
आपने कुछ खाया भी नहीं…
करण ने आँखें खोलने की कोशिश की…पर थकान इतनी थी कि वो बस उसे देख पाया।
करण (धीमे) बोला -
ठीक हूँ…
श्रेया ने उसका हाथ पकड़ लिया…
श्रेया बोली -
आप हमेशा ‘ठीक हूँ’ ही बोलते हो…
करण हल्का सा मुस्कुराया…
करण बोला -
आदत है…
उसी समय कबीर भी अंदर आ गया…वो चुपचाप बच्चे को देखता रहा…फिर करण की तरफ देखा।
कबीर (धीमे) बोला -
भैया… आप सो जाओ…
करण ने सिर हिला दिया…
करण बोला -
तुम दोनों जाओ…
श्रेया ने तुरंत मना कर दिया—
नहीं… हम यहीं रहेंगे…
कबीर भी उसके पास बैठ गया।तीनों कुछ पल चुप रहे…कमरे में सिर्फ बच्चे की हल्की साँसों की आवाज़ थी।
फिर कबीर ने धीरे से कहा—
भैया… आपने आज पूरे दिन अकेले सब संभाला…
करण ने उसकी तरफ देखा…
करण (धीमे) बोला -
ये मेरा काम है…
श्रेया ने उसकी तरफ झुककर उसका सिर अपने कंधे पर रख लिया…
श्रेया बोली -
नहीं… ये हमारा काम है…
करण कुछ नहीं बोला…बस आँखें बंद कर लीं। उस पल कमरे में एक अजीब सा सुकून था…तीनों के बीच कोई दूरी नहीं थी…बस एक थकान थी… और एक गहरा अपनापन…और उस रात…परिवार का हर इंसान एक-दूसरे के लिए जी रहा था…॥
कमरा अभी भी शांत था…बच्चा धीरे-धीरे सो रहा था और हल्की-हल्की साँसें ले रहा था। करण कुर्सी पर बैठा था… थकान उसके चेहरे पर साफ झलक रही थी।
श्रेया उसके पास ही खड़ी थी… और कबीर चुपचाप सामने। कुछ पल कोई नहीं बोला…बस खामोशी भारी होती जा रही थी। फिर कबीर ने धीरे से बोलना शुरू किया…
कबीर (भावुक होकर) बोला -
भैया…
करण ने उसकी तरफ देखा…कबीर ने अपनी आँखें थोड़ी नीचे कीं… और आवाज़ भारी हो गई—
कबीर बोला -
मम्मी-पापा के जाने के बाद...एक आप ही थे…
वो थोड़ा रुका…उसकी आँखें नम हो चुकी थीं।
कबीर (धीमे) बोला -
जिसने मुझे माँ जैसा प्यार दिया…पिता का साया दिया…और भाई जैसा सहारा भी…
करण एकदम चुप हो गया…उसके चेहरे पर भाव बदलने लगे…जैसे पुरानी यादें एक साथ लौट आई हों।
श्रेया भी चुपचाप कबीर को देख रही थी…
कबीर आगे बोला—
मैं अक्सर भूल जाता हूँ…कि मैं अकेला नहीं था…
उसकी आवाज़ टूट गई…
कबीर बोला -
आप हमेशा मेरे साथ थे…
करण ने धीरे से अपनी आँखें बंद कर लीं…उसके अंदर भी एक भारीपन उतर आया था। वो उठा… और कबीर के पास आकर खड़ा हो गया।
करण (धीमे, लेकिन मजबूत आवाज़ में) बोला -
तू मेरा छोटा भाई नहीं है कबीर…
कबीर ने उसकी तरफ देखा…करण ने उसके कंधे पर हाथ रखा—
करण बोला -
तू मेरी जिम्मेदारी है…और मेरी ताकत भी…
कबीर की आँखों से आँसू गिर गए…वो बिना कुछ बोले आगे बढ़ा, और करण से कसकर लिपट गया।श्रेया चुपचाप यह सब देख रही थी…उसकी आँखें भी नम थीं। उस पल कमरे में कोई दूरी नहीं थी…न भाई के बीच… न दिलों के बीच…बस एक रिश्ता था…जो दर्द से होकर और मजबूत बन चुका था…॥
सुबह की हल्की धूप कमरे में फैल चुकी थी…घर में एक शांत, सुकून भरा माहौल था। श्रेया कमरे में बैठी थी…
और अपने बच्चे को गोद में लेकर दूध पिला रही थी।
उसके चेहरे पर एक अलग ही अपनापन था…जैसे सारी थकान उसी पल में मिट गई हो।
थोड़ी दूरी पर…रसोई में करण और कबीर साथ खड़े थे…और नाश्ता बनाने में लगे हुए थे।करण सब्जी काट रहा था…और कबीर चाय बना रहा था। कभी-कभी दोनों के बीच हल्की-हल्की बात हो जाती…
कबीर (हल्की मुस्कान के साथ) बोला -
भैया… आप इतना धीरे क्यों काट रहे हो?
करण बिना देखे जवाब देता—
तू बनाकर दिखा ले…
कबीर हँस पड़ता। किचन में पहली बार इतना normal माहौल था…जैसे पुरानी सारी उलझनें कुछ देर के लिए पीछे रह गई हों। इधर श्रेया बच्चे को प्यार से देख रही थी…और उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।
वो खुद से बुदबुदाई—
अब सब कितना अच्छा लग रहा है…
किचन से करण की आवाज़ आई—
खाना तैयार है…
कबीर बोला -
और चाय भी…
श्रेया हल्की मुस्कान के साथ उठी…और बच्चे को संभालते हुए बाहर आई। तीनों फिर एक साथ टेबल पर बैठ गए…खाना खाते हुए भी एक अलग ही warmth थी…न कोई तनाव, न कोई दूरी…बस एक परिवार…जो धीरे-धीरे अपने नए रूप में ढल रहा था…॥