Illustrated Life of Guru Gobind Singh - 2 in Hindi Motivational Stories by Sapna Badh books and stories PDF | गुरु गोविंद सिंह का सचित्र जीवन - 2

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गुरु गोविंद सिंह का सचित्र जीवन - 2

चौथे गुरू रामदास जी 1574में गुरू गद्दी पर विराजमान हुए। सिख शक्ति को केंद्रित करने के लिए उन्होंने अमृतसर शहर की स्थापना 1577में‌ जो कि आज कल श्री अमृतसर के नाम से प्रसिद्ध है। (अमृत सरोवर) अमृतसर बनवाया जिसमें डूबकी लगाकर इंसान अपनी क्षुद्रता और हीन भावना को भूल जाता है। यही अमृतसर बाद में सिखों का प्रमुख केन्द्र बना।

गुरू रामदास जी ने आनन्द कारज( सिख विवाह पद्धति) की पंरपरा आरंभ की और वेद मंत्रो के स्थान पर उच्चारण की जाने वाली रचना लावां की सृजना की।

पांचवें गुरू अर्जुन देव जी ने अपने गुरू काल में सिख मत को हिन्दू विचारधारा से प्रथक करके एक न‌ई दिशा प्रदान की। उन्होंने सार्वजनीन ,सब के साझें सरोवर के बीच सर्वजनीन सबके साझे मंदिर 

(हरमिंदर साहिब) की नींव हिन्दू परम्परा के विपरित,  उस वक्त के प्रसिद्ध सूफी संत पीर साईं मियां से डलवाई।इस धर्म मंदिर के चारों दिशाओं में चार दरवाजे जो चारों वर्णो( ब्रह्माण, क्षेत्रिय, वैश्य और शूद्रों ) और चारों धर्मों। हिन्दू, मुसलमा,सिख और ईसाई ) के लिए खुले रहते हैं।

सिख मत को प्रमाणित रूप देने के लिए पहले गुरूओओं और बारहवी सदी के शेख फरीद से लेकर उस वक्त तक टीलों फकीरों, हिन्दू भक्तों और शुद्र होने के कारण अपमानित किए गए, महापुरुषोन 

की उन वाणियों को जो गुरूओं के सिद्धांतों के अनुरूप थी, आदि ग्रंथ में सम्पादिक किया।

सबके साझे सरोवर के बीच चारों वर्णों के लिए,सब के साझे मंदिर के अंदर सब की साझी वाणी के स्वरूप आदि ग्रंथ की स्थापना, सारी मानवता की एकता की प्रतीक बन गई।

यह बात उस वक्त शासक को अच्छी नहीं लगी। बादशाह जहांगीर ने अपनी आत्मकथा,तौजिके 

जहांगीर में गुरू घर को झूठ की दुकान ( दुकाने बातिल )लिखा।इसको बंद करने के लिए श्री गुरु अर्जन देव जी का वध (शहीद ) करवा दिया । गुरू अर्जुन देव जी की शहादत सिख धर्म मे एक ऐतिहासिक मोड़ का कारण बनी।

छठे गुरू हरगोबिंद सिंह जी ने गुरू पिता के अन्तिम आदेश के अनुसार शस्त्र धारण किए ।

मीरी पीरी के प्रतीक दो तलवारों  धारण करके सिख धर्म मे भक्ति एवं समन्वय कर दिया। सिखों की स्वतंत्र अस्तित्व के प्रतीक श्री अकाल तख्त साहिब को हरि मंदिर के सामने स्थापित करके, धर्म और राजनीति के अटूट संबंध को प्रकट कर दिल्ली तख्त को चुनौती दी।

सिख शक्ति को संगठित करके एक ऐसी सेना तैयार की जिसने तत्कालीन मुगल शासकों से लोहा लेकर उनके मन में जगे हुए अजेय होने के भ्रम को तोडा़ ।

सातवे गुरू हरिराय जी ने शासन के प्रभाव में आकर गुरूवाणी के गलत अर्थ लगाने के कारण, अपने बड़े पुत्र रामराय को सिख पंथ से बहिष्कृत कर दिया और बाणी गुरू गुरू है बाणी,के सिद्धांत 

को परिपक्व किया।

आठवे गुरू हरिकृष्ण जी ने अपने बाल काल में ही अपने बड़े भाई के स्थान पर गुरू गद्दी के उत्तराधिकारी होने के दांव के विरुद्ध राज दरबार में उपस्थित होने से इंकार करके गुरू घर की श्रेष्ठता और उच्चता कायम की।

नवें गुरू श्री तेग बहादुर जी ने मानव जाति के अधिकार तथा धार्मिक स्वतंत्रता के लिए अपना शीश बलिदान करके औरंगजेब के सारे हिन्दूसतान को दारुल इस्लाम बनाने के स्वप्न को भंग कर दिया।

सिखों के दसवे गुरू गोविन्द सिंह जी ने अपने सिख धर्म के,,,,,।


क्रमशः ✍️