उधर दिल्ली से अग्निश चट्टोपाध्याय और मंत्री दिग्विजय सिंह भी विशेष विमान से सीधे उसी स्थान पर पहुँचे।
वहाँ का नज़ारा दिल दहला देने वाला था। कोलकाता के तीन सबसे रसूखदार इंसान, जिनके एक इशारे पर शहर थम जाता था, आज एक-दूसरे के सामने बेबस खड़े थे।
अग्निश ने अपने बेटे को खोया था।
दिग्विजय का बेटा कोमा में ज़िंदगी और मौत की जंग लड़ रहा था।
अब्दुल हकीम की बेटी अब इस दुनिया में नहीं रही थी।
अब्दुल हकीम ने नम आँखों और कड़कती आवाज़ में अग्निश से पूछा,
"अग्निश! यह क्या हो रहा है? मेरा और तुम्हारा व्यापारिक मुकाबला हो सकता है, दिग्विजय से राजनैतिक मतभेद हो सकते हैं, पर हमारे बच्चों ने किसी का क्या बिगाड़ा था?"
दिग्विजय सिंह ने सिर झुकाकर कहा, "हकीम साहब, हम तीनों को एक-दूसरे के खिलाफ लड़ाया गया है। मेरे बेटे का नाम इस्तेमाल किया गया ताकि अग्निश मुझसे भिड़ जाए, और नजीमा को इसलिए मारा गया ताकि हम सच तक न पहुँच सकें।"
अग्निश ने हुगली के बहते पानी की ओर देखते हुए कहा, "हम तीनों के पास पैसा है, पावर है, और हथियार हैं। लेकिन हमारा दुश्मन हमसे ज़्यादा शातिर है।
वह हमारे घरों के अंदर तक पहुँच चुका है और हमें पता भी नहीं चला। वह हमें सिर्फ मारना नहीं चाहता, वह हमें तिल-तिल कर मिटाना चाहता है।"
तीनों के मन में एक ही सवाल कौंध रहा था— "वो कौन है जो हम तीनों के साम्राज्यों को एक साथ श्मशान बनाना चाहता है?
" तभी अग्निश की नज़र दूर खड़ी एक काली गाड़ी पर पड़ी, जो उन्हें ही देख रही थी और जैसे ही उनकी नज़र पड़ी, वह गाड़ी तेज़ी से ओझल हो गई।
मौत का सिलसिला और आखिरी गवाह
हुगली नदी के किनारे ठंडी हवाएँ चल रही थीं, लेकिन वहाँ खड़े तीनों दिग्गजों के मन में आग लगी थी। तभी अग्निश ने अपनी गहरी आवाज़ में अब्दुल हकीम की आँखों में झाँकते हुए पूछा—
"हकीम, जब तुम दुबई में थे, तब तुम्हारे घर की रखवाली तुम्हारा सबसे वफादार नौकर रुस्तम कर रहा था। उसी ने मुझे बताया था कि नजीमा को कुछ नकाबपोश लोग सरकारी गाड़ियों में किडनैप करके ले गए हैं।
वह कहाँ है? मुझे उससे फिर से बात करनी है, क्योंकि वही आखिरी इंसान था जिसने उन अपहरणकर्ताओं को देखा था।"
अब्दुल हकीम के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। उसने हैरान होकर कहा, "किडनैप? नजीमा का अपहरण हुआ था और मुझे खबर तक नहीं दी गई?
अग्निश, अगर तुम्हें यह सब पता था तो तुमने मुझे फोन क्यों नहीं किया?"
अग्निश ने कड़वाहट से जवाब दिया, "मुझे लगा यह दिग्विजय की चाल है, और तुम भी इसमें मिले हुए हो। पर छोड़ो उन बातों को, बस इतना बताओ कि रुस्तम कहाँ है?"
अब्दुल हकीम का चेहरा सफेद पड़ गया। उसने कांपते हुए स्वर में कहा, "रुस्तम... रुस्तम ने तो परसों रात खुदकुशी कर ली।"
अग्निश के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। "क्या? परसों? परसों शाम को तो मैं उससे मिलकर दिल्ली निकला था! वह डरा हुआ ज़रूर था, पर आत्महत्या जैसा कुछ नहीं था उसके मन में।"
हकीम ने सिर झुकाकर कहा, "पुलिस ने बताया कि मेरे बंगले से तुम्हारे जाने के कुछ ही घंटों बाद, रुस्तम ने अपने कमरे में पंखे से लटककर फांसी लगा ली।
कमरे से एक सुसाइड नोट भी मिला है जिसमें उसने लिखा कि वह नजीमा बीवी की हिफाजत न कर पाने के गम में अपनी जान दे रहा है।"
अग्निश ने दांत पीसते हुए कहा, "झूठ! यह आत्महत्या नहीं है। रुस्तम को मार दिया गया क्योंकि वह जानता था कि नजीमा को ले जाने वाली वो सरकारी गाड़ियाँ किसकी थीं। हकीम, दिग्विजय... समझो इस बात को, दुश्मन हमारे साथ शतरंज खेल रहा है।
उसने पहले भवनीश को मारा, फिर रुस्तम को खत्म किया, और अंत में नजीमा की भी जान ले ली। वह एक भी ऐसा इंसान ज़िंदा नहीं छोड़ रहा जो उसका चेहरा बेनकाब कर सके।"
अग्निश का गुस्सा अब सातवें आसमान पर था। अपने बेटे को खोने का गम और एक के बाद एक मिटते हुए गवाहों ने उसे पागल कर दिया था। उसने घूमकर दिग्विजय सिंह की आँखों में आँखें डालीं और उसकी छाती पर उंगली रखकर दहाड़ उठा।
अग्निश का तांडव: सत्ता पर प्रहार
"दिग्विजय सिंह! बस बहुत हुआ!" अग्निश की आवाज़ हुगली के शांत पानी में बिजली की तरह गूँजी।
"आखिर इस शहर में हो क्या रहा है? तुम्हारी पुलिस क्या कर रही है? खाकी वर्दी पहनकर क्या सिर्फ तमाशा देख रहे हैं सब? सरेआम गुंडे और बदमाश दिनदहाड़े लोगों को उठा रहे हैं, कत्ल कर रहे हैं, और तुम यहाँ हाथ पर हाथ धरे बैठे हो! पहले मेरा बेटा गया, फिर नजीमा, और अब वो नौकर रुस्तम... आखिर ये सिलसिला कहाँ रुकेगा?"
दिग्विजय सिंह ने कुछ कहना चाहा, लेकिन अग्निश ने उसे बोलने का मौका नहीं दिया।
"तुम्हारी नाक के नीचे सरकारी गाड़ियों का इस्तेमाल किडनैपिंग के लिए हो रहा है! अगर तुम एक मंत्री होकर अपने शहर के रईसजादों और गवाहों को सुरक्षा नहीं दे सकते, तो लानत है तुम्हारी इस कुर्सी पर! अगर तुम इतने ही लाचार हो, तो इस्तीफा दो और घर जाकर बैठ जाओ! राजनीति तुम्हारे बस की बात नहीं रही।"
अग्निश का चेहरा गुस्से से लाल था। उसने आगे बढ़कर दिग्विजय के कोट का कॉलर पकड़ लिया, "याद रखना दिग्विजय, अगर पुलिस ने अगले 24 घंटों में कोई ठोस सुराग नहीं दिया,
तो फिर मैं अपने तरीके से इंसाफ करूँगा। और उस वक्त अगर तुम्हारी पुलिस मेरे आड़े आई, तो अंजाम तुम सोच भी नहीं सकते।"
दिग्विजय सिंह खामोश खड़े थे। उनकी आँखों में भी एक अजीब सा डर था, क्योंकि उन्हें अहसास हो गया था कि जो ताकत इन वारदातों को अंजाम दे रही है, वह शायद उनके अपने ही महकमे के अंदर कहीं गहरी जड़ें जमा चुकी है।
अब्दुल हकीम ने बीच-बचाव करते हुए कहा, "अग्निश, शांत हो जाओ! दिग्विजय को कोसने से कुछ नहीं होगा। हमें उस भेड़िये को ढूँढना है जो हम सबके बीच में है।"
जैसे ही अग्निश और दिग्विजय सिंह के बीच तनातनी बढ़ रही थी, तभी भारी कदमों की आहट सुनाई दी।
कोलकाता के पुलिस कमिश्नर अजय सिंह भाटी अपने लाव-लश्कर के साथ वहाँ पहुँचे। उनके चेहरे पर थकान और तनाव साफ झलक रहा था।
कमिश्नर का बयान: एक अदृश्य दुश्मन
कमिश्नर भाटी ने पास आकर तीनों दिग्गजों को सलाम किया और गंभीर स्वर में बोले, "सर, मैं जानता हूँ आप लोग गुस्से में हैं और आपका गुस्सा जायज़ है।
लेकिन यकीन मानिए, मेरी पूरी फोर्स दिन-रात एक कर रही है। हम इस केस की बहुत ही बारीकी से जांच करेंगे
कमिश्नर अजय सिंह भाटी के पास ऐसा क्या 'बारीकी से जांच' का सुराग है जो वह तीनों दिग्गजों को बताने वाले हैं? क्या उन्हें उस काली गाड़ी का कोई सुराग मिला है जो हुगली नदी के किनारे खड़ी थी?