अब मुझे यकीन हो गया है कि अगला नंबर हम दोनों का ही है। शायद हम इस घाटी से कभी बाहर नहीं निकलेंगे।"
सृष्टि: (धीमी आवाज़ में) "पता है राम, अब मुझे डर नहीं लग रहा। डर तब लगता है जब कुछ बचने की उम्मीद हो। अब जब उम्मीद ही नहीं रही, तो डर कैसा?
बस एक अफ़सोस है... माँ का वो लॉकेट। उन्होंने कहा था यह मेरी रक्षा करेगा, पर यह तो खुद काला पड़ गया।"
तभी, उस खामोशी को चीरते हुए एक आवाज़ आई। वह आवाज़ ज़मीन के नीचे से नहीं, बल्कि उनके अपने ही दिमाग के अंदर से आ रही थी।
"पाँच की भेंट... सातों की गिनती... दो रूहें बाकी... प्यास अधूरी..."
अचानक, पूरे मैदान में हज़ारों मोमबत्तियाँ अपने आप जल उठीं। लेकिन उनकी रोशनी पीली या सफेद नहीं, बल्कि खूनी लाल थी।
शैतानी घाटी: सौरभ का छलावा
मैदान में जलती हज़ारों खूनी लाल मोमबत्तियों की रोशनी ने पूरे मंज़र को नरक जैसा बना दिया था। तभी, उस धुंधली और लाल रोशनी को चीरते हुए एक आकृति उनकी तरफ बढ़ती दिखी।
वह कोई डरावना साया नहीं था, बल्कि वह सौरभ था! वही चेहरा, वही कपड़े, और वही मुस्कान... जैसे उसे कुछ हुआ ही न हो।
सृष्टि की आँखें फटी की फटी रह गईं। वह अपना होश खोने लगी थी।
सृष्टि: (कांपती आवाज़ में) "सौरभ? तुम... तुम ज़िंदा हो? हमने तो देखा था कि उस जलती हुई बस ने तुम्हें... तुम वापस कैसे आए?"
सौरभ की आँखों में एक अजीब सी चमक थी। उसने अपना हाथ सृष्टि की तरफ बढ़ाया। उसकी आवाज़ बहुत ही कोमल और सम्मोहक थी।
सौरभ (छलावा): "सृष्टि... वो सब एक बुरा सपना था। देखो, मैं तुम्हारे सामने हूँ। तुम यहाँ इस अँधेरे में क्या कर रही हो?
देखो राम से कितनी दूर खड़ी हो तुम। मेरे पास आओ... भगवान ने कितनी फुर्सत से तुम्हें बनाया है, मेरी बाहों में आओ सृष्टि!
मैं कब से तुम्हें इस घाटी में ढूंढ रहा था। आओ ना, हम यहाँ से साथ चलेंगे।"
सृष्टि के कदम अपने आप सौरभ की तरफ बढ़ने लगे। उसे लग रहा था कि शायद जो उसने देखा था वो सिर्फ़ एक वहम था और यही उसका असली सौरभ है।
वह एक मदहोशी की हालत में उसकी तरफ खिंची जा रही थी।
राम: (ज़ोर से चिल्लाते हुए) "सृष्टि! रुको! अपने कदम पीछे हटाओ!"
राम ने झपटकर सृष्टि का कंधा पकड़ा और उसे पीछे खींचा। राम की आँखें सौरभ के उस चेहरे को गहराई से परख रही थीं।
राम: "सृष्टि, होश में आओ! यह सौरभ नहीं है। ध्यान से देखो, इसकी आँखों में कोई पलक नहीं झपक रही! और देखो... इसके पैर ज़मीन को नहीं छू रहे, यह ज़मीन से दो इंच ऊपर हवा में तैर रहा है!
यह वही शैतान है जो सौरभ का रूप धरकर तुम्हें उस खाई में ले जाना चाहता है!"
सौरभ (गुस्से में): "राम! तू हमारे बीच में मत आ! तू हमेशा से हम दोनों के बीच दीवार बना रहा है। सृष्टि, इसकी बात मत सुनो, यह पागल हो गया है। देखो, मैं वही तुम्हारा सौरभ हूँ।"
राम ने देखा कि जैसे-जैसे सौरभ का यह साया गुस्से में आ रहा था, उसके चेहरे की खाल धीरे-धीरे फटने लगी थी और अंदर से वही सड़ी हुई मिट्टी और बाल दिखाई देने लगे थे।
राम: "सृष्टि! इसकी आवाज़ पर ध्यान मत दो! अपनी जेब में हाथ डालो, देखो क्या तुम्हारी माँ का वो लॉकेट अभी भी ठंडा है?
अगर वह गर्म हो रहा है, तो समझो मौत तुम्हारे पास खड़ी है!"
सृष्टि ने जैसे ही अपने गले के उस धुंधले लॉकेट को छुआ, वह अंगारे की तरह दहक रहा था।
उसकी तपन ने सृष्टि का होश ठिकाने ला दिया। वह झटके से पीछे हट गई।
सृष्टि: (चीखते हुए) "तुम सौरभ नहीं हो! तुम वो राक्षस हो जिसने उसे मारा है!"
सौरभ का वह सुंदर चेहरा अचानक एक भयानक चीख के साथ फटने लगा। उसकी आवाज़ अब भारी और डरावनी हो गई थी।
छलावा: "प्यास... अधूरी... सा-त की गि-न-ती... तुम बच नहीं सकते!"
शैतानी घाटी: अपनों का छलावा और टूटता विश्वास
सृष्टि जैसे ही सौरभ के उस फटने वाले चेहरे को देख कर पीछे हटी, तभी अँधेरे को चीरती हुई एक और आवाज़ आई।
वह आवाज़ मधुर थी, सजीली थी और सृष्टि के दिल के सबसे करीब थी।
अनामिका: "सृष्टि! रुको! दूर मत जाओ!"
सृष्टि ने मुड़कर देखा, वहाँ अनामिका खड़ी थी। वही अनामिका जिसे उसने कुछ देर पहले उस भयानक पेड़ पर लटकते देखा था।
पर यहाँ वह बिल्कुल वैसी ही थी जैसी ट्रिप की शुरुआत में थी—सुंदर, हंसमुख और शांत।
अनामिका: "सृष्टि, तुम राम की बातों में क्यों आ रही हो? क्या तुम अपनी सबसे अच्छी दोस्त पर भरोसा नहीं करोगी?
राम तुम्हें गुमराह कर रहा है। देखो, सौरभ बिल्कुल ठीक है, मैं ठीक हूँ... हम सब ज़िंदा हैं!"
सृष्टि का सिर चकराने लगा। एक तरफ राम था जिसने उसे हमेशा बचाया, और दूसरी तरफ उसकी वो सहेली जिसके साथ उसने बचपन बिताया था।
अनामिका: "सृष्टि, असली शैतान यह राम है! इसने ही अपनी 'पवित्र चुनरी' का ढोंग करके हमें एक-एक करके गायब किया है।
यह तुम्हें भी मार डालना चाहता है ताकि अकेले बच सके। इसकी आँखों में देखो, तुम्हें सिर्फ नफरत दिखेगी!"
तभी वहाँ विनोद भी प्रकट हो गया। उसके चेहरे पर वही पुरानी शरारत थी।
विनोद: "हाँ सृष्टि! देखो राम कैसे कांप रहा है। यह डर नहीं है, यह इसकी हार है क्योंकि हमने इसका सच जान लिया है।
सौरभ के पास जाओ सृष्टि, वही तुम्हारा सच्चा प्यार है। राम ने ही सौरभ को गुस्सा दिलाकर उसका चेहरा वैसा बनाया ताकि तुम डर जाओ।
यह सब इसका जादू है!"
सृष्टि पागलों की तरह कभी राम को देखती, तो कभी अपने उन दोस्तों को जो एक-एक करके अँधेरे से बाहर आ रहे थे।
तभी वहाँ कालू ड्राइवर भी खड़ा हो गया, जिसके हाथ में गाड़ी की चाबियाँ थीं।
कालू: "सृष्टि बहन, मैं मरा नहीं हूँ। देखो, बस खड़ी है। हम सब घर जा रहे हैं। बस तुम आ जाओ!"
अंत में मोनिका आगे बढ़ी और उसने सृष्टि का हाथ पकड़ने की कोशिश की।
मोनिका: "आओ मेरी दोस्त! हम कितने दिनों से एक-दूसरे से नहीं मिले? देखो, यहाँ कोई दर्द नहीं है, कोई मौत नहीं है।
राम से दूर हटो, वह तुम्हें निगल जाएगा!"
राम यह सब देखकर सुन्न पड़ गया था।