अंतर्जगत का रूपांतरण और मांसाहार का सच: एक आध्यात्मिक व पर्यावरणवादी दृष्टिकोण ~
जब हम जीवन के सत्यों को गहराई से समझने का प्रयास करते हैं, तो सबसे पहला प्रश्न यही उठता है कि हमारी जीवनशैली और खान-पान का हमारी आंतरिक दुनिया यानी हमारे मानस पर क्या प्रभाव पड़ता है?
भाग 1: हमारी आंतरिक दुनिया (अंतर्जगत) पर प्रभाव 🧠
जन्म से ही मनुष्य के भीतर बहुत ही सुंदर और असीम गुण उपस्थित होते हैं। परंतु समस्या यह है कि वे अपने मूल स्वरूप में स्वतः ही शुद्ध या उज्ज्वल प्रभाव नहीं दिखाते। उन्हें आत्म-चिंतन और आत्मवलोकन के माध्यम से परिष्कृत (शुद्ध) करके एक खास स्तर तक लाना होता है, जहाँ वे हमारे व्यक्तित्व को ऊँचाई दे सकें, हमारी चेतना को उत्कृष्ट बना सकें और हमें महानता की ओर अग्रसर कर सकें।
भारतीय दर्शन और ग्रंथों में मानवीय चेतना की मूल प्रवृत्तियों को 'वृत्ति' कहा गया है। वृत्ति का शाब्दिक अर्थ है—एक वृत्त (सर्किल) की तरह गोल रचना, जिसका न कोई आदि है और न अंत। ये प्रवृत्तियाँ प्रकृति में सदैव उपस्थित रहती हैं, जन्म के साथ हमारे भीतर प्रकट होती हैं और मृत्यु के बाद पुनः इसी प्रकृति में विलीन हो जाती हैं। मुख्य रूप से ये छह वृत्तियाँ हमारे भीतर पाई जाती हैं:
1) काम (वासना/लालसा)
2) क्रोध (आवेश/हिंसा)
3) लोभ (अति-लालच)
4) मोह (खुद को केंद्र में रखना—यह मेरा है, वह मेरे लिए है)
5) मद (अहंकार/घमंड)
6) मात्सर्य (ईर्ष्या/जलन)
अध्यात्म, उत्कृष्ट ग्रंथों के स्वाध्याय और गहरे आत्म-मंथन से इन वृत्तियों का केवल 'शोधन' (Refinement) किया जा सकता है, इन्हें जड़ से समाप्त नहीं किया जा सकता। शोधन करके हम अपनी ऊर्जा को श्रेष्ठता की ओर मोड़ सकते हैं। यदि हम ऐसा नहीं करते, तो मानव जीवन इन्हीं विकारों में फंसकर नष्ट हो जाता है और यही प्रवृत्तियाँ अंततः मनुष्य को आध्यात्मिक और मानसिक मृत्यु की ओर ले जाती हैं।
इन वृत्तियों के समानांतर हमारे भीतर कुछ ऐसे बहुमूल्य गुण भी होते हैं, जो मनुष्य को वास्तव में 'मनुष्य' बनाते हैं:
• दया और करुणा का अंतर: दया में हम दूसरे के दुःख को केवल बाहरी तौर पर समझते हैं और कहते हैं—"यह आपका दुःख है, यदि मैं आपकी कोई सहायता कर सकूं तो बताइए।" अर्थात् दुःख उसका ही रहता है, हम बस एक मददगार होते हैं। इसके विपरीत, करुणा में हम दूसरे के दुःख को अपना दुःख बना लेते हैं। हम महसूस करते हैं कि जो आज उसके साथ हो रहा है, वह मेरे साथ भी हो सकता है। दया में हम कहते हैं—"देखो, बेचारे के साथ क्या हुआ!", जबकि करुणा में सामने वाले की पीड़ा देखकर हमारा अपना हृदय भी तड़प उठता है और हम उस दुःख को जड़ से खत्म करने में जुट जाते हैं।
• प्रेम: प्रेम वास्तव में मन का किसी व्यक्ति वस्तु की ओर झुकाव मात्र नहीं है, बल्कि यह अशांति और दुःख से दूर, सत्य और परम शांति की ओर चेतना का निरंतर, अबाध प्रवाह है।
• अहिंसा: केवल किसी को न मारना ही अहिंसा नहीं है। खुद को उस सत्य और बोध से वंचित रखना जो जानने योग्य है, अपनी उच्चतम संभावना को साकार न करना , सबसे बड़ी हिंसा है। इसके विपरीत, स्वयं को बेचैनी से चैन की और ले जाना ही सच्ची अहिंसा है।
• सच्चाई (सत्य): वह जो त्रिकाल में कभी असत्य नहीं हो सकता। इसी सत्य के गर्भ से बोध, शांति और परमानंद का जन्म होता है।
• समर्पण: जो वस्तु या संसार हमारे पास सदा रहना ही नहीं है, उसे जबरदस्ती पकड़कर रखने की मूर्खता न करना ही समर्पण है।
जब चेतना का पतन शुरू होता है...
जब हम अपने स्वाद या स्वार्थ के लिए किसी जीव की जान लेते हैं (जिसमें भोजन के लिए पशुओं को काटना भी शामिल है), तो हमारे भीतर के ये सुंदर तत्व धीरे-धीरे नष्ट होने लगते हैं। भले ही हम खुद छुरी न चला रहे हों, लेकिन यदि अंततः वह जीव हमारे लिए ही काटा जा रहा है, तो हम उस हिंसा के बराबर के भागीदार हैं। इसके परिणामस्वरूप हमारे भीतर दो बड़े बदलाव आते हैं:
क) प्रकृति और परिवेश के प्रति हिंसा का बढ़ना
हमारे भीतर का सुंदर गुण 'अहिंसा' धीरे-धीरे विकृत होकर हिंसा में बदलने लगता है। यह हिंसक स्वभाव पहले बेजुबान जानवरों पर, फिर अन्य मनुष्यों पर, स्वयं पर और यहाँ तक कि निर्जीव वस्तुओं पर भी प्रकट होने लगता है। एक प्रसिद्ध दार्शनिक पुस्तक में उल्लेख मिलता है कि यदि आप निर्जीव वस्तुओं के प्रति भी हिंसक व्यवहार करते हैं (जैसे गुस्से में चीजें पटकना या तोड़ना), तो समय के साथ वह आक्रोश आपके अवचेतन का हिस्सा बन जाता है और आपके पूरे व्यक्तित्व को दूषित कर देता है।
ख) प्रेम, दया और करुणा का संकुचित होना
जब आप एक नन्हीं सी बेजुबान जान से प्रेम नहीं कर सकते, तो कोई भी उच्च चेतना वाला व्यक्ति आपसे श्रेष्ठ प्रेम की अपेक्षा कैसे कर सकता है? जो प्रकृति से प्रेम नहीं कर सकता, उसका मनुष्य से प्रेम करना कैसे संभव है? सच्चा प्रेम तो सार्वभौमिक होता है; जब वह जागता है, तो पूरी सृष्टि के लिए जागता है। यदि हम किसी जीव की तड़प और उसकी आँखों के प्राणों को महसूस नहीं कर पा रहे हैं, तो हमारे मनुष्य होने का क्या लाभ? इस प्रकृति रूपी घर में यदि मनुष्य सबसे समझदार है, तो यह उसका परम कर्तव्य है कि वह घर के अन्य छोटे और मूक सदस्यों (पशु-पक्षियों) का ध्यान रखे, न कि उन्हें खा जाए।
'पशु-बलि' का वास्तविक अर्थ ~ हमारे प्राचीन ग्रंथों में जहाँ 'पशु-बलि' की बात कही गई है, उसका यह अर्थ कतई नहीं था कि हम निर्दोष जानवरों का गला काटें। ईश्वर, जिसने खुद जीवों को जीने के लिए बनाया है, वह भला अपनी ही संतानों की हत्या से कैसे प्रसन्न हो सकता है? वास्तव में, ग्रंथों में 'पशु-बलि' एक प्रतीकात्मक (Symbolic) शब्द था। इसका अर्थ था—मनुष्य के भीतर बैठी 'पशु-वृत्ति' (क्रोध, अज्ञान, वासना) को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देना और यह संकल्प लेना कि—"हे प्रभु! मैं अपने भीतर के इस पशुत्व की बलि देता हूँ।" परंतु मनुष्यों ने अपनी जीभ के स्वाद के लिए इसका अनर्थ कर दिया।
हमारा चालाक मन इन आंतरिक बदलावों को कभी हमारे सामने प्रकट नहीं होने देता; क्योंकि मन पुराने ढर्रों और आदतों में ही मजे लेता है। वह खुद को बदलने की मेहनत से बचना चाहता है और अहंकार को सुरक्षित रखता है। यदि हमें अपनी चेतना को आगे ले जाना है, तो मन के इस जाल से बाहर आना ही होगा।
भाग 2: बाहरी दुनिया (पृथ्वी और पर्यावरण) पर इसका प्रभाव 🌍
आइए अब बात करते हैं कि हमारे भोजन की मांग का इस बाहरी दुनिया यानी हमारी पृथ्वी पर क्या वैज्ञानिक और विनाशकारी प्रभाव पड़ता है।
क्या हमें अनुमान भी है कि एक पैकेट 'नॉन-वेज' को हमारे घर की प्लेट तक पहुँचने के लिए किस खौफनाक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है? जब हम मांस खाने की मांग (Demand) बाजार में बढ़ाते हैं, तो बाजार इस विशाल मांग को पूरा करने के लिए अत्यंत क्रूर और कृत्रिम तरीके अपनाता है:
1) कृत्रिम गर्भाधान की क्रूरता: बकरी, मुर्गी, गाय, भैंस या सूअर जैसे मादा जीवों को दवाओं और इंजेक्शनों के सहारे जबरदस्ती बार-बार गर्भवती (Pregnant) किया जाता है ताकि वे लगातार संतानें और दूध पैदा कर सकें। किसी मां को व्यावसायिक लाभ के लिए इस असहनीय दर्द और यातना से गुजारना कहाँ की मानवता है?
2) नर शिशुओं की नृशंस हत्या: इस प्रक्रिया में जो 'नर बच्चे' (Male offsprings) पैदा होते हैं, वे मांस या दूध उद्योग के लिए सीधे तौर पर उपयोगी नहीं होते। मुर्गियों के छोटे-छोटे नर चूजों को, जो अभी ठीक से चल भी नहीं पाते, या तो जिंदा मिक्सी (Grinders) में पीस दिया जाता है या जिंदा जला दिया जाता है। भेड़ों के छोटे बच्चों के सींगों को गर्म लोहे से जला दिया जाता है ताकि वे बड़े होकर हमला न कर सकें।
3) डेयरी और मांस उद्योग का गठजोड़: हम दूध के लिए जिन गायों-भैंसों को जबरदस्ती गर्भवती करते हैं, उनके पैदा होते ही उनके बच्चों को उनकी मां से दूर कर दिया जाता है। यदि बच्चा नर है, तो उसे भूखा रखकर या धूप में बांधकर तड़पा-तड़पा कर मार दिया जाता है या कत्लखाने भेज दिया जाता है। मां का वह दूध, जो प्रकृति ने उस नन्हे बच्चे के लिए बनाया था, उसे हम छीन लेते हैं। इसलिए दूध और मांस का व्यापार हमेशा साथ-साथ चलता है। (आज इसके विकल्प के रूप में सोया मिल्क, कोकोनट मिल्क और आल्मंड मिल्क जैसे बेहतरीन वनस्पति-आधारित विकल्प मौजूद हैं)।
पर्यावरणीय विनाश (Ecological Destruction)
वैश्विक रिपोर्ट्स और पर्यावरण विज्ञान के अनुसार, मांस उत्पादन सीधे तौर पर पृथ्वी के विनाश का कारण बन रहा है:
• वनों की कटाई और ग्लोबल वार्मिंग: अरबों जानवरों को पालने के लिए भारी मात्रा में चारे और घास की आवश्यकता होती है। इस चारे को उगाने (Graze land) के लिए दुनिया के विशाल जंगलों (जैसे अमेज़न के रेनफॉरेस्ट) को बेरहमी से काटा जा रहा है। पेड़ों के कटने से 'ग्लोबल वार्मिंग' (वैश्विक तापन) बढ़ रही है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं और समुद्र का जलस्तर बढ़ने से कई द्वीप डूबने की कगार पर हैं।
• भूखमरी और संसाधनों का कुप्रबंधन: विज्ञान का नियम (Trophic Level) कहता है कि 1 किलोग्राम मांस तैयार करने में जितने एकड़ जमीन, पानी और हजारों किलोग्राम अनाज की खपत उस जानवर को बड़ा करने में होती है, उतनी ही जमीन में हम सीधे कई गुना अधिक अनाज उगाकर इंसानों का पेट भर सकते हैं। आज भी दुनिया में लगभग 14 करोड़ लोग भूखे सोते हैं; क्योंकि हमारी जमीन का एक बहुत बड़ा हिस्सा इंसानों के लिए अन्न उगाने के बजाय, कत्लखानों के जानवरों को मोटा करने में बर्बाद हो रहा है।
• जल और वायु प्रदूषण: कत्लखानों से निकलने वाले खून, मलमूत्र और सड़ती हुई हड्डियों से भारी मात्रा में खतरनाक गैसेस (जैसे मीथेन) निकलती हैं, जो वायुमंडल को प्रदूषित करती हैं। इनका अपशिष्ट नदियों और भूजल को जहरीला बना रहा है। इसके अतिरिक्त, जबरदस्ती बड़े किए गए इन जानवरों के मांस में जो सिंथेटिक केमिकल्स और हार्मोन्स होते हैं, वे अंततः हमारे शरीर में जाकर गंभीर बीमारियों को जन्म देते हैं।
भाग 3: मांसाहार के झूठे तर्कों का खंडन 🐽🫎
अक्सर लोग अपनी इस आदत को सही ठहराने के लिए तरह-तरह के कुतर्क गढ़ते हैं, जिनका विज्ञान और भूगोल के आधार पर आसानी से खंडन किया जा सकता है:
भ्रम 1: "मांस में प्रोटीन अधिक होता है"
यह तुलनात्मक अज्ञानता है। यदि आप बराबर मात्रा में तुलना करें—10 ग्राम मांस की तुलना 10 ग्राम बादाम, अखरोट, सोयाबीन या कद्दू के बीजों (Pumpkin seeds) से करें, तो आपको ज्ञात होगा कि शाकाहारी स्रोतों में प्रोटीन और आवश्यक पोषक तत्व कहीं अधिक गुणात्मक और सुरक्षित रूप से उपलब्ध हैं। हमारी तुलना करने का तरीका ही दोषपूर्ण है।
भ्रम 2: "यदि हम नहीं खाएंगे, तो जानवरों की संख्या बढ़ जाएगी और संतुलन बिगड़ जाएगा"
यह सबसे मूर्खतापूर्ण तर्क है। प्रकृति का अपना एक बेहद खूबसूरत और स्व-संतुलित 'पारिस्थितिकी तंत्र' (Ecosystem) है। इंसानों के आने से पहले भी लाखों वर्षों तक प्रकृति ने खुद का संतुलन बनाए रखा था। आज यदि पृथ्वी पर किसी प्रजाति की आबादी अनियंत्रित रूप से बढ़ रही है और तबाही मचा रही है, तो वह खुद 'मानव' है। जनसंख्या विस्फोट सबसे बड़ा खतरा है। यदि इस तर्क को सच मान लिया जाए, तो बढ़ती आबादी को रोकने के लिए क्या इंसानों को इंसानों को खाना शुरू कर देना चाहिए? जब बात खुद पर आती है, तो लोग कांप जाते हैं, परंतु बेजुबान जानवरों के मामले में यह कुतर्क देने लगते हैं।
निष्कर्ष:
आप अपनी इस आदत के पक्ष में सैकड़ों बौद्धिक तर्क दे सकते हैं, और उन सभी तर्कों को विज्ञान, भूगोल और अध्यात्म के द्वारा काटा जा सकता है। लेकिन अंततः केवल एक ही ऐसा कुतर्क बचेगा जिसे कोई नहीं काट पाएगा, और वह है—"पृथ्वी बर्बाद होती है तो हो, किसी बेजुबान को तड़पना पड़ता है तो तड़पे, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता; मेरी जीभ का स्वाद और मेरा मन जो चाहेगा, मैं वही करूँगा।" इस हठधर्मिता का कोई इलाज नहीं है। परंतु यदि आपके भीतर करुणा का एक भी अंश जीवित है, तो आपकी अंतरात्मा इस कृत्य को कभी स्वीकार नहीं करेगी। चुनाव हमारा है—हमें इस धरती को एक श्मशान बनाना है या प्रेममय और करुणामय उपवन!
अंत में: कबीर साहब की साखी और अध्यात्म का संदेश ☘️
कबीर, मांस अहारी मानई, प्रत्यक्ष राक्षस जानि।
ताकी संगति मति करै, होइ भक्ति में हानि।।
कबीर, मांस मछलिया खात हैं, सुरापान से हेत।
ते नर नरकै जाहिंगे, माता पिता समेत।।
कबीर, मांस मांस सब एक है, मुरगी हिरनी गाय।।
जो कोई यह खात है, ते नर नरकहिं जाय।।
कबीर, जीव हनै हिंसा करै, प्रगट पाप सिर होय।
निगम पुनि ऐसे पाप तें, भिस्त गया नहिंकोय।।
कबीर, तिलभर मछली खायके, कोटि गऊ दै दान।
काशी करौत ले मरै, तौ भी नरक निदान।।
कबीर, बकरी पाती खात है, ताकी काढी खाल।
जो बकरीको खात है, तिनका कौन हवाल।।
कबीर, अंडा किन बिसमिल किया, घुन किन किया हलाल।
मछली किन जबह करी, सब खानेका ख्याल।।
कबीर, मुला तुझै करीम का, कब आया फरमान।
घट फोरा घर घर दिया, साहब का नीसान।।
कबीर, काजी का बेटा मुआ, उरमैं सालै पीर।
वह साहब सबका पिता, भला न मानै बीर।।
कबीर, पीर सबनको एकसी, मूरख जानैं नाहिं।
अपना गला कटायकै, भिश्त बसै क्यों नाहिं।।
कबीर, जोरी करि जबह करै, मुखसों कहै हलाल।
साहब लेखा मांगसी, तब होसी कौन हवाल।।
कबीर, जोर कीयां जुलूम है, मागै ज्वाब खुदाय।
खालिक दर खूनी खडा, मार मुही मुँह खाय।।
कबीर, गला काटि कलमा भरै, कीया कहै हलाल।
साहब लेखा मांगसी, तब होसी कौन हवाल।।
कबीर, गला गुसाकों काटिये, मियां कहरकौ मार।
जो पांचू बिस्मिल करै, तब पावै दीदार।।
कबीर, कबिरा सोई पीर हैं, जो जानै पर पीर।
जो पर पीर न जानि है, सो काफिर बेपीर।।
कबीर, कहता हूं कहि जात हूं, कहा जो मान हमार।
जाका गला तुम काटि हो, सो फिर काटै तुम्हार।।
कबीर, हिन्दू के दाया नहीं, मिहर तुरकके नाहिं।
कहै कबीर दोनूं गया, लख चैरासी मांहि।।
कबीर, मुसलमान मारै करद सों, हिंदू मारे तरवार।
कह कबीर दोनूं मिलि, जावैं यमके द्वार।।
कबीर, पानी पथ्वी के हते, धूंआं सुनि के जीव।
हुक्के में हिंसा घनी, क्योंकर पावै पीव।।
न भोजन हक्क है, और दोजख देइ।
आपन दोजख जात है, और दोजख देइ।।
~ कपिल तिवारी “यथार्थ”