रोशनी को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके सीने में खंजर उतार दिया हो। जिस आदमी ने उसे हवस का शिकार बनाना चाहा, जिसने उसे जानवर की तरह समझा, अब उसे उसी के साथ पूरी ज़िंदगी बितानी होगी? उसके डॉक्टर बनने का सपना तो जैसे उसी आग में जल गया जो दादी ने किताबों में लगाई थी।
मेहूल ने अपनी दीदी का हाथ कसकर पकड़ लिया। वह 5 साल का बच्चा भी समझ रहा था कि उसकी दीदी की आँखों में मौत का साया नाच रहा है।
रोशनी ज़ोर से चिल्लाई, "नहीं! ये शादी नहीं हो सकती! मुझे डॉक्टर बनना है, मुझे इस दरिंदे के साथ नहीं रहना!"
लेकिन दादी ने उसे एक ज़ोरदार तमाचा जड़ा और कमरे के अंदर धकेल दिया। जमींदार जाते-जाते मुड़ा और ठंडे लहजे में बोला, "तैयार रहना रोशनी... क्योंकि अगर ये शादी नहीं हुई, तो तेरे बापू की उस ज़मीन पर तेरा और तेरे भाई का खून होगा।"
शहनाई का शोर और आज़ादी की दौड़
घर में उत्सव का माहौल:
आँगन में औरतें मंगल गीत गा रही थीं। दादी उमा देवी नए कपड़ों में इतरा रही थीं और बारात के स्वागत के लिए गाँव वालों को निर्देश दे रही थीं। उन्हें लग रहा था कि आज उनकी सारी परेशानियाँ खत्म हो जाएंगी और वह जमींदार की समधन बन जाएंगी। उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि रोशनी के कमरे में क्या चल रहा है।
खिड़की से छलांग:
अंदर कमरे में रोशनी ने अपनी फटी हुई चादर को खिड़की के डंडे से बाँधा। उसने मेहूल को गले लगाया और फुसफुसाते हुए कहा, "मेहूल, डरो मत। अगर आज हम नहीं भागे, तो बापू का सपना मर जाएगा। बस मेरा हाथ मत छोड़ना।" 5 साल के मेहूल ने अपनी नन्ही उंगलियों से रोशनी का हाथ कसकर थाम लिया। रोशनी ने अपने बापू के उस खून से सने कागज़ को अपनी कमर में खोंस लिया और खिड़की से नीचे उतर गई।
खेतों का रास्ता और बारात का आगमन:
जैसे ही वे पिछवाड़े से निकले, उन्हें दूर से ढोल और पटाखों की आवाज़ सुनाई दी। बारात गाँव की सरहद पर पहुँच चुकी थी। वीर प्रताप घोड़े पर सवार था, उसके माथे की पट्टी अब सेहरे के पीछे छिपी थी, लेकिन उसकी आँखों में अब भी वही दरिंदगी थी।
रोशनी और मेहूल ऊँचे-ऊँचे गन्ने के खेतों के बीच छिपते हुए भाग रहे थे। पैरों में जूते नहीं थे, काँटे चुभ रहे थे, पर आज़ादी की तड़प उस दर्द से बड़ी थी।
4. दादी का चिल्लाना:
तभी घर से एक चीख सुनाई दी। दादी कमरे में रोशनी को तैयार करने गई थीं, पर कमरा खाली था। "भाग गई! कुलच्छनी भाग गई!" दादी का चिल्लाना सुनकर बारात रुक गई और जमींदार के लठैत टॉर्च लेकर खेतों की तरफ दौड़े।
जमींदार उसके आदमी रोशनी की तलाश में निकल जाते हैं खेतों में देखते हैं गांव का कोना-कोना छान मार देते हैं तलाश करते करते वह नदी की और जाते हैं
मौत और ज़िंदगी के बीच - नदी का किनारा
1. घेराव:
रोशनी और मेहूल भागते-भागते नदी के किनारे पहुँच गए। सामने विशाल और गहरी नदी बह रही थी, जिसका शोर अंधेरी रात में और भी भयानक लग रहा था। पीछे मुड़कर देखा तो मशालों की रोशनी और गाड़ियों की हैडलाइट्स पास आ रही थीं। कुछ ही पलों में जमींदार के लठैत, दादी और घोड़े पर सवार वीर प्रताप ने उन्हें घेर लिया।
2. दादी का क्रूर चेहरा:
दादी हाँफते हुए आगे आईं और चिल्लाईं, "कहाँ जाएगी भागकर? देख ले, अब तो आगे मौत है और पीछे हम। चुपचाप लौट आ, वरना ठाकुर साहब के पैर भी नहीं छू पाएगी तू!"
वीर प्रताप ने घोड़े से उतरकर अपनी कमर से बेल्ट निकाली और उसे हाथ में लपेटते हुए बोला, "बहुत दौड़ाया तूने मुझे... अब देख मैं तेरा और इस छोकरे का क्या हाल करता हूँ।"
3. रोशनी का साहस और अंतिम फैसला:
रोशनी ने देखा कि मेहूल डर के मारे रो रहा है। उसने मेहूल को अपनी पीठ पर मज़बूती से बाँधा। उसकी आँखों में अब डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी शांति थी। उसने वीर प्रताप की तरफ देखा और गरजी—
"साहब! आप मेरी देह को तो ज़ंजीरों में जकड़ सकते हैं, पर मेरे सपनों को नहीं। मैं आपके घर की दासी बनने से बेहतर इस नदी की गोद में सोना पसंद करूँगी। अगर भगवान ने चाहा, तो मैं फिर लौटूँगी... पर आज आपकी गुलामी मंज़ूर नहीं!"
वह खौफनाक छलांग:
इससे पहले कि कोई लठैत उन्हें पकड़ पाता, रोशनी ने अपनी आँखें बंद कीं, बापू और माँ का नाम लिया और मेहूल को कसकर पकड़ते हुए उस गहरी, काली नदी के तेज़ बहाव में छलांग लगा दी।
"छपाक!" की आवाज़ हुई और दोनों पानी की लहरों में ओझल हो गए।
मंज़र नदी के ऊपर:
वीर प्रताप और उसके आदमी किनारे पर खड़े होकर टॉर्च मारते रहे, पर दूर-दूर तक पानी की लहरों के अलावा कुछ नहीं दिखा। दादी ज़मीन पर बैठकर छाती पीटने लगीं, पर इस बार शायद अफ़सोस में नहीं, बल्कि जमींदार को जवाब देने के डर से।
जमींदार ने ठंडे स्वर में कहा, "खेल खत्म हुआ। इस बहाव में कोई नहीं बच सकता। चलो यहाँ से।"
लेकिन
नदी के दूसरी तरफ, कई किलोमीटर दूर, रोशनी का हाथ एक पुराने पेड़ की जड़ से टकराता है। वह पूरी तरह बेदम हो चुकी है,
उफनती लहरें और छिन गया सहारा
होश और सन्नाटा:
रोशनी की जब आँखें खुलीं, तो उसके कानों में सिर्फ नदी के पानी का शोर था। उसने अपनी उंगलियों को उस पेड़ की जड़ में धँसा रखा था जो उसे डूबने से बचा रही थी। उसका पूरा शरीर ठंडे पानी से सुन्न पड़ चुका था। बड़ी मशक्कत के बाद वह घिसटते हुए किनारे की रेतीली ज़मीन पर आई।
वह खाली आंचल:
हाँफते हुए, रोशनी ने मुस्कुराने की कोशिश की कि चलो, वे बच गए। उसने अपनी पीठ की तरफ हाथ बढ़ाया ताकि वह मेहूल