बर्बाद इश्क
एपिसोड 15 — जब सपना बनी हथियार
मुंबई में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो ज़िंदगी से इतने टूट जाते हैं कि दुश्मन उन्हें आसानी से इस्तेमाल कर लेते हैं।
सपना ऐसी ही थी।
टूटी हुई। अकेली। और अब — ज़ाफ़र की नज़र में।
💥 ज़ाफ़र का नया जाल
सुबह के नौ बजे।
सपना के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया।
उसने खोला।
सामने एक अजनबी था।
"सपना जी?"
"हाँ।"
"मेरा नाम करीम है। ज़ाफ़र साहब ने भेजा है।"
सपना ने उसे देखा।
"ज़ाफ़र? मैं नहीं जानती किसी ज़ाफ़र को।"
"जानती होंगी अब।" करीम ने कहा। "अंदर आ सकता हूँ?"
सपना ने रास्ता नहीं दिया।
"क्या काम है?"
"आपके बेटे — रणवीर मेहता। उनसे जुड़ा काम है।"
सपना का चेहरा बदला।
"मेरा उनसे कोई—"
"आप माँ हैं उनकी।" करीम ने कहा। "यह रिश्ता नहीं बदलता।"
सपना ने एक पल सोचा।
फिर रास्ता दिया।
करीम अंदर आया।
बैठा।
"ज़ाफ़र साहब ने सुना है कि आप — मुश्किल में हैं। पैसे नहीं। बीमारी है।"
"तो?"
"तो — एक छोटा सा काम करिए। पाँच लाख मिलेंगे।"
सपना ने उसे देखा।
"कौन सा काम?"
"बस — अपने बेटे रणवीर को एक बार मिलने बुलाइए। अकेले। एक जगह। बस इतना।"
सपना का चेहरा पीला पड़ गया।
"यह — यह तो—"
"धोखा?" करीम ने कहा। "नहीं जी। बस एक मुलाकात। ज़ाफ़र साहब बात करना चाहते हैं रणवीर से। शांति से।"
"झूठ बोल रहे हो।"
करीम ने मुस्कुराया।
"सपना जी — आपके पास option क्या है? पैसे नहीं। कोई नहीं। और वह बेटे — जो हैं — वह माफ़ नहीं करेंगे।"
सपना चुप रही।
"पाँच लाख। बस एक फ़ोन।"
करीम उठा।
"सोच लीजिए। कल सुबह तक जवाब चाहिए।"
और चला गया।
सपना वहीं बैठी रही।
दिल में — एक जंग थी।
वह रात।
सपना सो नहीं पाई।
उसके दिमाग़ में करीम के शब्द थे।
"पाँच लाख। बस एक फ़ोन।"
और दानिश के शब्द भी थे।
"जाइए। मुंबई छोड़ दीजिए।"
और रणवीर के।
"वह आदमी बीस साल में ठीक हुआ है। आप उनकी ज़िंदगी में वापस नहीं आएंगी।"
सपना ने आँखें बंद कीं।
ज़िंदगी में बहुत ग़लतियाँ की थीं।
एक और करनी थी?
लेकिन — पाँच लाख।
और अकेलापन।
और यह टूटा हुआ कमरा।
सपना ने फ़ैसला किया।
💥 रणवीर — जब सपना ने फ़ोन किया
अगली सुबह।
रणवीर नाश्ते में था।
फ़ोन बजा।
अनजान नंबर।
"हाँ।"
"रणवीर।" सपना की आवाज़।
रणवीर का हाथ रुक गया।
"क्या है?"
"मुझे — मुझे तुमसे मिलना है। ज़रूरी है। अकेले।"
"क्यों?"
"बेटा — एक बात है। बहुत ज़रूरी।"
रणवीर ने एक पल सोचा।
कुछ था उस आवाज़ में — जो अजीब था।
"कहाँ?"
सपना ने एक जगह बताई।
रणवीर ने सुना।
"ठीक है। दो घंटे में।"
फ़ोन बंद।
रणवीर ने सलीम को बुलाया।
"वह जगह — पहले चेक करो।"
एक घंटे में सलीम वापस आया।
"भाई — वह जगह — ज़ाफ़र के आदमी हैं वहाँ। पाँच-छह।"
रणवीर ने सुना।
आँखें बंद कीं।
सपना ने धोखा दिया।
फिर।
उसने एक लंबी साँस ली।
आदित्य और दानिश को बुलाया।
"सपना ने ज़ाफ़र से हाथ मिलाया।"
दानिश ने मेज़ पर मुक्का मारा।
"कमीनी।"
"दानिश।" आदित्य ने कहा।
"भाई — उसने फिर धोखा दिया। अपने ही बेटे को।"
रणवीर चुप रहा।
"भाई — क्या करना है?" आदित्य ने पूछा।
रणवीर ने कहा — "जाएँगे। लेकिन — अपनी तैयारी के साथ।"
वह मुलाकात
उस जगह।
एक पुराना गोदाम।
रणवीर आया।
अकेला नहीं था — लेकिन दिखा अकेला।
आदित्य और दानिश पीछे से आए थे।
सलीम के आदमी चारों तरफ़ थे।
सपना एक कोने में खड़ी थी।
रणवीर ने उसे देखा।
वह नज़र — वह नज़र सपना बर्दाश्त नहीं कर पाई।
सिर झुक गया।
"रणवीर — मैं — मुझे नहीं पता था—"
"पता था।" रणवीर ने कहा।
तभी पीछे से आवाज़ आई।
ज़ाफ़र आया।
"रणवीर मेहता।" उसने कहा। "अकेले आए। अच्छा किया।"
"तुमने उसे इस्तेमाल किया।" रणवीर ने कहा।
"उसने ख़ुद आने दिया।"
रणवीर ने एक पल सपना को देखा।
सपना की आँखों में आँसू थे।
"ज़ाफ़र।" रणवीर ने कहा। "आख़िरी बार कह रहा हूँ। यह बंद करो।"
ज़ाफ़र हँसा।
"बंद करूँ? रणवीर — मैंने तुम्हारी माँ को पाँच लाख में ख़रीदा। तुम्हारे बाप को ढूँढा। तुम्हारी उन लड़कियों को—"
"बस।"
रणवीर की आवाज़ बिल्कुल शांत थी।
ज़ाफ़र के आदमी आगे बढ़े।
और तभी।
चारों तरफ़ से रणवीर के आदमी निकले।
ज़ाफ़र का चेहरा बदला।
"यह — यह—"
"तुमने सोचा था कि माँ का नाम सुनकर मैं अंधा हो जाऊँगा।" रणवीर ने कहा। "ग़लती हुई।"
जो हुआ अगले कुछ मिनटों में।
ज़ाफ़र के आदमियों ने हथियार उठाए।
लेकिन रणवीर के आदमी ज़्यादा थे।
आदित्य और दानिश पीछे से आए।
ज़ाफ़र भागने की कोशिश की।
लेकिन सलीम ने रोका।
ज़ाफ़र रणवीर के सामने था।
"रणवीर — बात करते हैं—"
"बात हो चुकी।" रणवीर ने कहा।
उसने सलीम को इशारा किया।
"पुलिस को दे दो।"
ज़ाफ़र चौंका।
"क्या?"
"हाँ।" रणवीर ने कहा। "मारूँगा नहीं। लेकिन — तुम्हारे जो काम हैं — वह पुलिस के पास हैं। जाओ।"
ज़ाफ़र को ले जाया गया।
गोदाम ख़ाली हो गया।
बस रणवीर और सपना रहे।
सपना ज़मीन पर बैठी थी।
"रणवीर — मैंने—"
"जानता हूँ।" रणवीर ने कहा।
"माफ़ करो।"
रणवीर ने उसे देखा।
"माफ़ी — माफ़ी मैं नहीं दे सकता। वह — बहुत मुश्किल है।"
सपना ने सिर झुकाया।
"लेकिन — एक काम करूँगा।"
सपना ने ऊपर देखा।
रणवीर ने सलीम को इशारा किया।
सलीम ने एक लिफ़ाफ़ा आगे किया।
"यह — पैसे हैं। मुंबई छोड़ो। कहीं और जाओ। शांति से रहो।"
सपना ने लिफ़ाफ़ा देखा।
"रणवीर — मैंने तुम्हारे साथ—"
"जो हुआ — हुआ।" रणवीर ने कहा। "लेकिन — तुम मेरी माँ हो। चाहे मैं माना न माना। मरने नहीं दूँगा।"
सपना फूट-फूटकर रोई।
रणवीर खड़ा रहा।
उसने उसे गले नहीं लगाया।
लेकिन रुका रहा।
जब तक वह रोती रही।
बाहर।
आदित्य और दानिश खड़े थे।
दानिश ने पूछा — "भाई — क्या हुआ अंदर?"
रणवीर ने बताया।
दानिश चुप रहा।
फिर कहा — "पैसे दिए उसे?"
"हाँ।"
"क्यों भाई?"
रणवीर ने उसे देखा।
"क्योंकि — अगर हम भी वैसे हो गए जैसी वह थी — तो फ़र्क़ क्या रहा?"
दानिश ने एक पल सोचा।
फिर सिर हिलाया।
"ठीक किया।"
आदित्य ने कहा — "बाबा को?"
"नहीं।" रणवीर ने कहा। "कभी नहीं।"
तीनों गाड़ी में बैठे।
मुंबई की सड़कें थीं।
और तीनों के दिल में — एक पुराना बोझ — थोड़ा और हल्का हुआ।
उसी शाम।
नायरा की बेकरी में।
रणवीर आया।
नायरा ने देखा।
चेहरे पर थकान थी।
उसने चुपचाप चाय बनाई।
रखी।
रणवीर ने पिया।
"आज मुश्किल था।"
"हाँ।" नायरा ने कहा।
"माँ—" रणवीर रुका।
नायरा ने उसे देखा।
उसने पूरी बात बताई।
नायरा चुप रही।
सब सुनती रही।
जब रणवीर ख़त्म हुआ तो बोली —
"तुमने सही किया।"
"पैसे देना?"
"हाँ। और — रुकना। जब वह रो रही थी।"
रणवीर ने उसे देखा।
"तुम — कभी जज नहीं करती।"
"क्यों करूँ?" नायरा ने कहा। "तुम्हारी ज़िंदगी तुम्हारी है।"
रणवीर ने उसका हाथ थामा।
पहली बार।
बिना सोचे।
नायरा ने हाथ नहीं हटाया।
दोनों वहीं बैठे रहे।
चाय ठंडी हो गई।
लेकिन किसी
को परवाह नहीं थी।
ज़ाफ़र पकड़ा गया था।
सपना चली गई थी।
लेकिन मुंबई में — एक नया ख़तरा पैदा हो रहा था।
ज़ाफ़र का बड़ा भाई — इमरान।
जो ज़ाफ़र से भी ख़तरनाक था।
बर्बाद इश्क — जारी है।
(एपिसोड 16 जल्द आएगा...) 🔥