कविताओं का संग्रह- भाग:2
लेखिका
प्राची गुर्जर
लेखिका की ओर से …….
कुछ कविताएँ लिख दी जाती हैं,और कुछ समय के साथ धीरे-धीरे हमारे भीतर उतरती हैं।यह भाग उन कविताओं का है,जो ख़ामोशी में जन्मीं और अनुभवों की रोशनी में शब्द बन गईं।
-प्राची गुर्जर …
#.11:
“मुझे पसंद है टूटना..."
मुझे पसंद है खिड़की का वो कोना,
जहाँ धूप आती है, पर रुकती नहीं।
बस मेरे कंधे को छूकर चली जाती है,
जैसे कोई पुराना खत पढ़कर रख दिया हो।
मुझे पसंद है अधूरे काम,
मेज़ पर बिखरी हुई किताब,
आधा लिखा हुआ कागज़,
कलम की खुली हुई टोपी।
बताते हैं कि मैं अभी ज़िंदा हूँ,
कि अभी कुछ बाकी है।
मुझे पसंद है बारिश के बाद की मिट्टी,
जो कुछ नहीं बोलती,
बस साँस लेती है।
और मैं उसके साथ साँस लेती हूँ।
मुझे पसंद है अपने हाथों को देखना,
इनमें लकीरें कम, कहानियाँ ज़्यादा हैं।
कहीं चाय का दाग, कहीं कलम की स्याही,
सब सबूत हैं कि मैंने जीने में कंजूसी नहीं की।
लोग कहते हैं मैं खोई रहती हूँ,
मैं कहती हूँ मैं मिली हुई हूँ।
खुद से, इस पल से, इस सांस से।
मुझे पसंद है टूटना,
क्योंकि टूटने के बाद ही पता चलता है
कि मैं कितनी मज़बूत थी।
प्राची गुर्जर …….
#.12:
मेरे दोस्त…..
कितने दोस्त हैं तुम्हारे?
हाँ दोस्त... दोस्ती सबको पसंद है...
मुझे भी है।
पर मेरी दोस्ती मतलबी लोगों से नहीं।
मेरी दोस्ती है अंधेरों से
जो मुझे उजालों तक ले जाने के क़ाबिल बना रहे हैं।
जो गिराते हैं, ताकि उठना सिखा सकें।
जो डराते हैं, ताकि हिम्मत पहचान सकूँ।
मुझे बैठना पसंद है अपनी ख़ामोशी के साथ
वो मेरी पक्की सहेली है।
क्योंकि वो शोर नहीं करती, सिर्फ़ सुनती है...
मेरे एहसास, मेरे आँसू, मेरी वो बातें
जो लफ़्ज़ों से कहने लायक़ नहीं।
वो डाँटती नहीं, बस समझती है।
मैं रोज़ अपने ख़ास दोस्त 'अकेलेपन' के साथ बैठकर खाना खाती हूँ।
वो हर निवाले पर मुझे रिश्तों की अहमियत समझाता है।
बताता है कि भीड़ में भी इंसान कितना तन्हा हो सकता है,
और तन्हाई में भी कोई कैसे तुम्हारा अपना बन जाता है।
मेरे दोस्तों का कोई रूप नहीं, कोई रंग नहीं...
अदृश्य हैं वो सब।
पर रहते हैं मेरे अंदर, मेरी साँसों में, मेरी रग-रग में।
हर क़दम पर मुझे संभालते हैं,
जब दुनिया धक्का देती है, तो यही मुझे थाम लेते हैं।
लोग पूछते हैं, "तुम अकेली क्यों रहती हो?"
मैं हँस कर कहती हूँ, "अकेली कहाँ... मेरे साथ मेरी पूरी महफ़िल है।"
मेरा दर्द मेरा दोस्त है…..जो मुझे मज़बूत बनाता है।
मेरी रातें मेरी दोस्त हैं …..जो मुझे सपने बुनना सिखाती हैं।
मेरा सब्र मेरा दोस्त है …..जो मुझे टूट कर बिखरने नहीं देता।
और हाँ,
जब सब छोड़ जाएँ,
तो यही अदृश्य दोस्त कंधे पर हाथ रख कर कहते हैं….
"चल... अभी सफ़र बाक़ी है। हम हैं ना तेरे साथ।"
तो मेरी दोस्ती आम नहीं...
वो ख़ास है, बेमिसाल है।
क्योंकि मेरे दोस्त दिखते नहीं,
पर ज़िंदगी के हर मोड़ पर मिल जाते हैं।
प्राची गुर्जर …..
#.13:
ख़ामोश जवाब……
ज़रूरी नहीं हर सवाल का जवाब हो...
कोई जवाब न होना भी जवाब हो सकता है।
और अगर तुम पूछो कि "कहाँ तक जाना है?"
तो मैं फिर चुप हो जाऊँगी।
क्योंकि कुछ मंज़िलों के नाम नहीं होते,
बस एक एहसास होता है
कि रुकना नहीं है।
मैंने सपनों को अब ताले में नहीं रखा,
ना दीवारों पर टाँगा है।
मैंने उन्हें अपनी थकान में बोया है,
अपनी नींद में सींचा है।
वो अब दिखते नहीं,
पर उगते ज़रूर हैं
हर उस सुबह में,
जब मैं गिर कर भी उठ जाती हूँ।
लोग कहते हैं “बड़ा सोचो",
मैं कहती हूँ "सच्चा सोचो"
क्योंकि बड़े सपने अक्सर दुनिया के लिए होते हैं,
और सच्चे सपने... सिर्फ़ अपने लिए।
तो मेरा जवाब यही है
कि मैं जवाब नहीं दूँगी।
मैं बस चलती रहूँगी,
उस रास्ते पर जो अनजान है,
उन पैरों से जो थके हैं,
उस उम्मीद से जो ज़िद्दी है।
एक दिन जब पहुँच जाऊँगी,
तो तुम ख़ुद देख लेना...
मेरी ख़ामोशी क्या कह रही थी।
क्योंकि कुछ कहानियाँ
सुनाई नहीं जातीं,
वो एक रोज़ सब को ख़ुद सुन जाती है ।
प्राची गुर्जर …..
#.14:
उम्मीदें…..
मेरी कई उम्मीदें थीं
दोस्तों से, अपनों से, खुद के सपनों से...
कभी बेफिक्र होकर, बिना सोच-विचार,
मैं उन उम्मीदों के पीछे भागा करती थी।
न परवाह थी लोगों की, न समाज की, न किसी तंज की...
बस इतना मालूम था कि "जो होगा, देखा जाएगा"।
फिर वक़्त ने आँखें खोलीं।
कुछ सपने गिरे, कुछ अपने बिखरे,
कुछ दोस्तों ने रास्ते बदले, कुछ मैंने।
जिन बातों पर हँसा करती थी, उन्हीं बातों ने रुलाया।
जिस "देखा जाएगा" पर ऐतबार था,
उसने ही आईना दिखाया।
और अब जब देखने की बारी आई,
जो हुआ उससे... अब मैं बहुत फ़िक्र करती हूँ।
न जाने, न चाहते हुए भी,
मुझे परवाह रहती है लोगों की, समाज की, और हर एक तंज की।
मुझे अब मालूम है बेपरवाह होने की कीमत
वो हँसी से नहीं, नींदों से चुकाई जाती है।
अब हर कदम से पहले, करती हूँ मैं बहुत सोच-विचार।
न जाने अब उम्मीदें चल पड़ी हैं किसी अलग दिशा में
जो मेरी नज़रों से ओझल है,
और अब मैं उनके पीछे भाग रही हूँ,
थके हुए पैरों से, पर ज़िद्दी हौसलों के साथ।
मैं अब भी भागती हूँ,
बस अब गिरने से डरती हूँ।
पहले उड़ती थी, अब संभल-संभल कर चलती हूँ।
शायद बड़े होना यही है
कि सपने वही रहते हैं,
बस उन तक पहुँचने के रास्ते बदल जाते हैं।
और हम, उन रास्तों पर चलते-चलते,
खुद को थोड़ा-थोड़ा खो कर,
फिर से पा लेते हैं।
और शायद उम्मीदें भागती नहीं,
हमारे साथ बड़ी हो जाती हैं।
बचपन में दौड़ती थीं, अब साथ चलती हैं,
हाथ थामे, धीरे-धीरे... पर रुकती नहीं।
प्राची गुर्जर…..
#.15:
"सच का स्वाद"
मैं सोचती हूँ...
सच इतना कड़वा क्यों होता है?
कि सही होकर भी उसे
कोई पीना नहीं चाहता।
मैं उलझन में हूँ...
सच अगर सही है,
तो उससे आँख मिलाने से
हर कोई क्यों कतराता है?
क्या हो...
अगर हर ज़ुबान पर
सिर्फ कड़वा सच उगने लगे?
क्या रिश्ते तब भी मिठास से जी पाएँगे,
या अपने ही हाथों से
रेत की तरह फिसल जाएँगे?
क्या तब ईमान ज़िंदा रहेगा,
या झूठ के घूँघट में
हर कोई सादिक़ बना रहेगा?
शायद सच कड़वा इसलिए है,
क्योंकि उसमें चीनी मिलाने की इजाज़त नहीं।
और झूठ मीठा इसलिए लगता है,
क्योंकि उसे हम अपने हाथों से घोलते हैं।
पर मैं कहती हूँ,
कड़वी दवा ही मर्ज़ मिटाती है,
और मीठा ज़हर...
सिर्फ़ मौत बाँटता है।
प्राची गुर्जर …..
#.16:
"घर और इंसान"
सबको महलों में रहने का शौक है,
पर टूटे घर की छत पर
कोई खड़ा होना नहीं चाहता।
छज्जे से उगता सूरज सबको अच्छा लगता है,
पर टूटी खिड़की से जो चाँदनी झाँकती है,
उसको कोई अपनाना नहीं चाहता ।
मैं घर की बात नहीं कर रही,
ये तो इंसान की बात है।
सबको सफल लोगों से रिश्ता चाहिए,
पर जो हार गया हो,
उसका हाथ कोई नहीं पकड़ता।
टूटी दीवारों पर भी धूप आती है,
दरारों से भी उजाला अंदर आता है।
पर लोगों की नज़र सिर्फ चमकते शीशों पर रहती है,
नींव में लगी सीलन को कोई नहीं देखता।
जीत का आँगन भरा रहता है,
हार की दहलीज़ पर सिर्फ सन्नाटा होता है।
सबको रोशन नाम चाहिए,
पर बुझे दिए को जलाना
कोई अपना काम नहीं समझता।
मैं कहती हूँ,
महल भी एक दिन गिर जाते हैं,
फ़र्क़ बस इतना है
मिट्टी के घर आँधी से टूटते हैं,
और इंसान के घर...
अक्सर अपनों की आँखों से बिखरते हैं।
प्राची गुर्जर ……
#.17:
"किनारा"
हर बढ़ता कदम मुझे खुद से दूर ले जा रहा है...
आगे तो बढ़ रही हूँ, पर क्या यही वो राह है
जिस पर चलने को कभी मेरा जी चाहता था?
नहीं रहना था मुझे अर्श पर,
निशान तो चाहिए थे मुझे अपने ही फ़र्श पर।
मगर ज़िंदगी की भाग-दौड़ में
मैं उन कदमों से कदम मिलाने लगी,
जो कभी मेरे थे ही नहीं...
क्यों काट रही हूँ मैं वो फसल,
जिसके बीज मैंने कभी बोये ही नहीं?
क्यों सवार हूँ मैं उस कश्ती पर,
जो भटक गई है समुंदर की लहरों में?
क्योंकि रास्ते बदल गए,
और मैं खुद को भूल गई।
पर दूर कहीं एक किनारा नज़र आता है...
शांत, मौन, समुंदर के शोर से जुदा।
क्या जी सकती हूँ मैं उस शांत किनारे पर?
क्या लौट सकती हूँ मैं वापस... खुद तक?
हाँ। क्योंकि किनारा कहीं बाहर नहीं,
वो तेरे ही अंदर सोया है।
जिस दिन तू रुकेगी,
और लहरों का शोर सुनने के बजाय
अपनी साँस की आहट सुनेगी...
उस दिन कश्ती खुद मुड़ जाएगी,
और हर कदम तुझे तुझ तक ले जाएगा।
तू अर्श की नहीं, अपने फ़र्श की है
और तेरा निशान वहीं बनेगा।
प्राची गुर्जर ….
#.18:
“मौत का दूसरा नाम”
मौत का दूसरा नाम क्या है…?
शायद अँधेरा
वो जो रोशनी को निगल जाए
और दिल के भीतर
हर रास्ता बंद कर दे…
कभी कभी,
मौत इंतज़ार भी होती है
लंबा, सर्द, और बेरहम
वो जो जीते जी इंसान को
धीरे धीरे अंदर से खा जाता है…
कुछ लोग कहते हैं
मौत अंत है
पर मेरे लिए,
वो उन तमाम लम्हों का
आख़िरी हिसाब है
जिन्हें हमने जिया नहीं…
सिर्फ़ सहा है।
प्राची गुर्जर …….
#.19:
"ठहरा हुआ पल"
कभी-कभी यूँ ही इंतज़ार अच्छा लगता है,
जैसे शाम को ढलता सूरज सच्चा लगता है।
ना किसी के आने की जल्दी,
ना किसी के जाने का डर।
बस एक ख़ाली कुर्सी,
एक कप चाय, और थोड़ा सा सब्र।
हवा में कोई आहट ढूँढना,
दरवाज़े को यूँ ही तकना।
घड़ी की टिक-टिक सुनना,
और पलकों को धीरे से झपकना।
ये इंतज़ार मोहब्बत का नहीं,
ये तो ख़ुद से मिलने का है।
जो बीत गया उसको शुक्रिया,
जो आएगा उसपे यकीन रखने का है।
कभी-कभी रुक जाना भी ज़रूरी है,
भागती दुनिया में ठहरना ज़रूरी है।
इंतज़ार सज़ा नहीं होता हमेशा,
कभी-कभी ये दुआ सा लगता है।
प्राची गुर्जर…..
#.20:
“सफेद बालों वाला इश्क़……”
मुझे पसंद है बुज़ुर्ग जोड़ों को साथ देखना,
उनकी मोहब्बत से सीखना….. तो उसी पे लिखा है।
मैं देखती हूँ उन्हें कहीं छज्जे पे बैठे,
वो अख़बार पढ़ते हैं, ये स्वेटर बुनती हैं।
बीच-बीच में नज़रें मिलती हैं,
बिन बोले ही सारा दिन गुज़र जाता है।
कोई शोर नहीं, कोई दिखावा नहीं,
बस एक कप चाय, दो हिस्सों में बांटी जाती है।
मैं देखती हूँ उन्हें किसी बगीचे में,
धीमी चाल से, पर क़दम मिलाकर चलते।
वो लाठी थामे हैं, पर इनका हाथ नहीं छोड़ते,
ये फूल तोड़ें तो वो मना नहीं करते।
बेंच पर बैठकर घंटों ख़ामोश रहते,
फिर भी लगता है बातें हज़ार करते।
मैं देखती हूँ उन्हें ट्रेन के बाद भी,
स्टेशन पर उतरते ही वो भीड़ में ढूँढते हैं।
"संभल के" कहना अब आदत हो गई है,
पचास साल बाद भी फ़िक्र नई सी लगती है।
वो टिकट रखती हैं, ये पैसे गिनते हैं,
सफ़र ख़त्म हो, पर हमसफ़र नहीं बदलते हैं।
मैं देखती हूँ उन्हें मंदिर की सीढ़ियों पर,
वो चढ़ नहीं पाते तो ये हाथ बढ़ाती हैं।
प्रसाद में पहला निवाला उसे खिलाती हैं,
दुआ में पहले उसका नाम लगाती हैं।
लोग कहते हैं इश्क़ जवानी में होता है,
मैं कहती हूँ इश्क़ तो बुढ़ापे में पूरा होता है।
कभी वो रूठे तो ये चश्मा साफ़ करती हैं,
कभी ये खाँसे तो वो पानी ले आते हैं।
ना गुलाब, ना तारीफ़, ना वादे बड़े-बड़े,
बस एक-दूजे की दवाई वक़्त पे याद दिलाते हैं।
मुझे पसंद है बुज़ुर्ग जोड़ों को साथ देखना,
क्योंकि उन्होंने सिखाया मोहब्बत उम्र नहीं देखती,
मोहब्बत बस निभाना देखती है।
प्राची गुर्जर…..
यदि इन कविताओं में कहीं आपको अपना दुःख, अपनी मुस्कान या अपना मौन मिला हो,तो मेरा लिखना सफल हुआ।
-प्राची गुर्जर