Ek Nazar, Ek Kahaani - 1 in Hindi Love Stories by nupur shah books and stories PDF | एक नज़र, एक कहानी - 1

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एक नज़र, एक कहानी - 1

"कुछ मुलाकातें ज़िंदगी बदल देती हैं... और मेरी ज़िंदगी की वह मुलाकात एक शादी के समारोह में हुई थी।"
मैं उससे पहली बार एक शादी के समारोह में मिली थी। वह लड़के वालों की तरफ़ से आया था और मैं भी अपने परिवार के साथ लड़के वालों की तरफ़ से ही वहाँ पहुँची थी। शादी का हॉल बहुत ही खूबसूरती से सजाया गया था। चारों ओर रंग-बिरंगी रोशनियाँ जगमगा रही थीं। फूलों की खुशबू पूरे माहौल को और भी सुहाना बना रही थी। हर कोई अपने रिश्तेदारों से मिल रहा था, हँसी-मज़ाक कर रहा था और शादी की खुशियों में शामिल था।
मैं अपने परिवार के साथ हॉल के अंदर दाखिल हुई। जैसे ही मैंने अंदर कदम रखा, मेरी नज़र एक लड़के पर पड़ी। उसी पल उसने भी मेरी तरफ़ देखा और हमारी नज़रें एक-दूसरे से टकरा गईं। पता नहीं क्यों, लेकिन उस एक पल में मुझे ऐसा लगा जैसे समय कुछ क्षणों के लिए थम गया हो। आसपास इतने लोग थे, फिर भी मेरी नज़र सिर्फ़ उसी पर ठहर गई।
उसकी आँखें हल्के भूरे-भूरे (ग्रे) रंग की थीं। उन आँखों में एक अलग ही चमक थी, जिसने मुझे अपनी ओर खींच लिया। उसने हल्के नीले रंग की शर्ट और काले रंग की पैंट पहनी हुई थी। वह बहुत ही आकर्षक लग रहा था। मैं चाहकर भी अपनी नज़रें उस पर से हटा नहीं पा रही थी। ऐसा पहली बार हुआ था कि किसी अनजान इंसान को देखकर मेरे दिल में इतनी अजीब-सी हलचल हुई हो।
मैं जहाँ भी जाती, मुझे लगता कि उसकी नज़रें मेरा पीछा कर रही हैं। कई बार मैंने खुद को समझाया कि शायद यह सिर्फ़ मेरा वहम है, लेकिन जब भी मैं उसकी तरफ़ देखती, वह भी मुझे ही देखता हुआ नज़र आता। मुझे उसका नाम तक नहीं पता था। मैं यह भी नहीं जानती थी कि वह कहाँ से आया है। फिर भी न जाने क्यों, ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कोई अनजाना रिश्ता हमारे बीच चुपचाप बन रहा हो।
थोड़ी देर बाद हम सब अपने-अपने रिश्तेदारों से मिलने में व्यस्त हो गए। मैं और मेरा परिवार खाने के काउंटर की तरफ़ चले गए। वहाँ तरह-तरह के व्यंजन सजे हुए थे। सब लोग हँसते-बोलते हुए खाना खा रहे थे। मैं भी सबके साथ थी, लेकिन मेरा ध्यान बार-बार उसी की तरफ़ चला जाता था। जब भी वह कहीं दिखाई देता, मेरा दिल एक पल के लिए तेज़ी से धड़कने लगता।
खाना खाने के बाद हम दूल्हा-दुल्हन को शुभकामनाएँ देने और उनके साथ तस्वीरें खिंचवाने मंच पर गए। सब लोग अपनी-अपनी यादों को तस्वीरों में कैद कर रहे थे। मैंने भी मुस्कुराकर तस्वीरें खिंचवाईं, लेकिन मेरे मन में एक ही सवाल बार-बार आ रहा था—क्या यह मेरी उससे पहली और आख़िरी मुलाकात है?
कुछ ही देर बाद हमें वहाँ से निकलना था। जैसे-जैसे बाहर जाने का समय करीब आ रहा था, मेरे मन में एक अजीब-सी उदासी बढ़ती जा रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे कोई अधूरी बात पीछे छूट रही हो। बाहर निकलने से पहले मैंने एक बार पीछे मुड़कर देखा। वह अब भी वहीं खड़ा था। इस बार फिर हमारी नज़रें मिलीं। मैं हल्का-सा मुस्कुराई और फिर अपने परिवार के साथ वहाँ से चली गई।
पूरे रास्ते उसके चेहरे की वही एक झलक मेरे मन में घूमती रही। मुझे उसका नाम नहीं पता था, उसके बारे में कुछ भी नहीं पता था, लेकिन फिर भी ऐसा लग रहा था जैसे वह मेरी यादों का हिस्सा बन चुका हो।
मुझे लगा था कि यह हमारी पहली और आख़िरी मुलाकात थी... लेकिन किस्मत ने हमारे लिए कुछ और ही लिख रखा था।
क्रमशः...