The Weight of Wings in Hindi Women Focused by Amardeep Kumar books and stories PDF | पंखों का बोझ - 4

Featured Books
Categories
Share

पंखों का बोझ - 4

The Weight of Wings
                          पंखों का बोझ                 

                        एक नई खिडकी



हर सुबह जब संजना अपने कमरे का दरवाजा खोलकर बाहर कदम रखती, तो वो ताजगी — जो नींद के आखिरी पल में होती है — पल भर में गायब हो जाती. सामने माता- पिता के वही थके हुए चेहरे, वही पुरानी उम्मीदें.
वो सत्रह साल की थी. कुछ महीनों में अठारह की होने वाली थी. और उम्र का यह पडाव अपने साथ एक ऐसा बोझ लेकर आ रहा था जिसका नाम किसी ने नहीं बताया था — बस धीरे- धीरे कंधों पर रख दिया था.
बाथरूम में शॉवर से गिरते ठंडे पानी की बूंदें उसके विचारों को और गहरा कर रही थीं. लडकियों की जिंदगी मुश्किल है — यह सब कहते हैं. संजना जानती थी यह सच है. लेकिन वो यह भी जानती थी कि लडके भी उतने ही फँसे हुए हैं — बस उनके पिंजरे का नाम अलग है. उन पर कमाने का बोझ, रोने की मनाही.
काश लोग एक- दूसरे की थकान देख पाते.
अचानक नल बंद हो गया और विचारों की लडी टूट गई.
संजना बाहर आई, तौलिये से खुद को पोंछा और आईने की भाप हटाई. खुद को ध्यान से देखा.
अरे यार! उसने गाल खींचे. मैं तो सच में डार्क होती जा रही हूँ! इस धूप में हालत खराब हो गई है. तुरंत सनस्क्रीन लेनी पडेगी।
आज दुकान से छुट्टी थी.
वो तैयार होकर बाजार निकल गई.
बनारस के बाजार में एक अजीब सी जान होती है. सुबह की चाय की भाप, मंदिरों की घंटियाँ, साइकिल की टिनटिनाहट और किसी दुकानदार की पुकार — सब मिलकर एक ऐसा शोर बनाते हैं जो किसी तरह सुकून देता है.
संजना भीड में चल रही थी, अपनी ही धुन में.
तभी किसी ने कंधे से टक्कर मारी.
अरे सुन!
संजना मुडी.
रिया थी. वही रिया — जिसने result वाले दिन" नब्बे दशमलव आठ! तूने फोड दिया! चिल्लाकर फोन काट दिया था.
तू थी कहाँ इतने दिन? संजना हँसी, एक पल के लिए सब कुछ भूलकर.
यार, कोलकाता गई थी! रिया की आँखें चमक उठीं. क्या जगह है! वहाँ के लडके — लंबे, हैंडसम!
सच में?
हाँ! और कल्चर भी बिल्कुल अलग है। उसने मुँह बनाया. बस एक दिक्कत — हर जगह मछली ही बनती रहती है! मुझे तो लगा लोगों से भी हल्की- हल्की मछली की खुशबू आती होगी!
संजना हँस पडी. तू भी ना, कुछ भी बोलती है!
मजाक कर रही हूँ! लेकिन सच में — वहाँ एक बिहारी लडका मिला मुझे।
क्या बात कर रही है?
शायद कुछ सीरियस हो जाए. रिया ने आँखें नचाईं.
तभी पीछे से एक आवाज आई.
रिया!
दोनों मुडीं. एक लडका आ रहा था — लंबा, कंधे पर bag, headphones गले में लटके हुए. रिया का भाई, आदित्य.
भैया! रिया ने तुरंत मौका देखा. ये मेरी दोस्त है — संजना।
आदित्य ने एक नजर देखा. हाँ. ठीक है।
संजना ने तुरंत मासूम चेहरा बनाया. क्या हुआ? पसंद नहीं आई क्या मैं?
नहीं- नहीं! ऐसा नहीं है—"
तो फिर? संजना ने सिर थोडा झुकाया, आँखें थोडी बडी कीं. मैं इतनी बुरी लग रही हूँ?
आदित्य हकलाया. अरे. मतलब. वो बात नहीं है असल में.
रिया बगल में खडी मुस्कुरा रही थी — वो अच्छी तरह जानती थी कि अब क्या होने वाला है.
वैसे, संजना ने बिल्कुल सहज आवाज में पूछा, आपकी कोई girlfriend तो नहीं है ना?
आदित्य के चेहरे पर एक पल के लिए कुछ गुजरा. उसने संजना को फिर से देखा — और अचानक realize हुआ.
यह मुझे चिढा रही है.
रिया. उसने बहन की तरफ घूमकर कहा.
रिया ने फोन निकाला और स्क्रीन उसकी तरफ घुमाई. उस पर आदित्य की एक पुरानी chat का screenshot था.
आदित्य की आँखें फटी रह गईं.
चलते हैं संजना! रिया ने हँसते हुए हाथ पकडा. भैया को अचानक बहुत जरूरी काम याद आ गया।
संजना ने पलटकर एक बार और देखा. अच्छा भैया, फिर मिलेंगे!
आदित्य कुछ बोल नहीं पाया.
दोनों हँसती हुई आगे बढ गईं.
तू बहुत शैतान है यार, रिया ने कहा.
तेरे भाई ने deserve किया। संजना मुस्कुराई.
कुछ देर और बातें हुईं — वही पुरानी, बेफिक्र बातें जो सिर्फ पुरानी दोस्त ही कर सकती हैं. और फिर रिया का फोन बजा, उसकी माँ थीं.
चल यार, बाद में मिलते हैं. घर आ कभी।
हाँ। संजना ने कहा.
दोनों अलग हो गईं.
संजना फिर अकेली थी.
बाजार की भीड में चलते- चलते उसकी नजर एक दुकान के बाहर रखी पत्रिकाओं के ढेर पर पडी. ऊपर वाली पत्रिका का cover चमक रहा था —
Homestay — घर बैठे कमाई का नया जरिया"
संजना एक पल रुकी.
उसने पत्रिका उठाई. पलटी. कुछ lines पढीं.
अजीब है.
उसने पत्रिका वापस रखी और आगे बढ गई. लेकिन दो कदम चलकर रुक गई. पलटी. फिर से उठाई. दाम देखा.
खरीद ली. Bag में डाल ली. बिना ज्यादा सोचे.
घर के दरवाजे पर पहुँचकर उसने चाबी निकाली.
रुक गई.
घर को देखा — पुरानी हवेली जैसी दीवारें, ऊपर के तीन कमरों की बंद खिडकियाँ जो सालों से नहीं खुली थीं, नीचे पापा की दुकान का बोर्ड —
माँ तारा ट्रेवल्स।
उसका हाथ अनजाने में bag में गया.
पत्रिका निकली.
Cover पर वही headline —
Homestay — घर बैठे कमाई का नया जरिया"
और फिर उसकी नजर ऊपर गई — उन बंद खिडकियों पर.
Click।
उसके दिमाग में कुछ खुला. धीरे से. एक खिडकी की तरह.
मैं. अपने घर को ही Homestay बना सकती हूँ.
वो वहीं खडी रही — दरवाजे पर, अंदर और बाहर के बीच.
तभी अंदर से आवाज आई. पापा की.
कोई पुराना गाना गुनगुना रहे थे — धीमे, बेध्यान से. वो आवाज जो सिर्फ तब निकलती है जब इंसान अकेला हो और उसे खबर न हो कि कोई सुन रहा है.
संजना रुक गई.
उसने कभी नहीं सोचा था कि पापा गाना भी जानते हैं.
पडोस की दादी ने एक बार बताया था — बहुत साल पहले की बात है — कि रवि मिश्रा पहले ऐसे नहीं थे. जवान थे तो बनारस की गलियों में घूमते थे, हँसते थे, अजनबियों से बातें करते थे. इस शहर से उनका कोई पुराना रिश्ता था — जडों का नहीं, किसी और चीज का.
Kiss चीज का — दादी ने कभी पूरा नहीं बताया.
और संजना ने कभी पूछा नहीं.
अंदर से गाना बंद हो गया.
संजना ने पत्रिका फिर से देखी. फिर घर को.
माँ तारा ट्रेवल्स।
एक business को किसी के नाम पर रखना — यह सिर्फ नाम नहीं होता.
एक दिन पूछना था.
लेकिन अभी नहीं.
अभी करने को बहुत कुछ था.