अधूरी किताब – सीजन 3
एपिसोड 28 : कहानियों का भक्षक
पूरा शून्य पुस्तकालय काँप रहा था।
करोड़ों किताबों के पन्ने अपने-आप पलट रहे थे।
हर किताब से शब्द उड़कर हवा में बिखर रहे थे।
सुनहरी रोशनी और काला धुआँ आपस में टकरा रहे थे।
अनन्या, आरव, अरोही, पहली कहानी और सत्यलेखक उस विशाल काली आँख को देख रहे थे जो पुस्तकालय के ऊपर आकाश में उभर चुकी थी।
उस आँख की पुतली लगातार घूम रही थी।
मानो वह किसी को खोज रही हो।
अचानक उसकी दृष्टि अनन्या पर आकर रुक गई।
पूरा वातावरण बर्फ की तरह ठंडा हो गया।
एक भारी आवाज़ गूँजी—
"तो... यही है नई लेखिका।"
अनन्या ने अपने हाथ में पकड़ी पूर्ण कथा को कसकर पकड़ लिया।
"तुम कौन हो?"
उस आवाज़ के साथ पूरी लाइब्रेरी अंधेरे में डूबने लगी।
फिर धीरे-धीरे काले धुएँ से एक विशाल आकृति बनने लगी।
पहले उसके पैर बने।
फिर हाथ।
फिर धड़।
और अंत में...
एक चेहरा।
लेकिन उस चेहरे पर आँखें नहीं थीं।
मुँह नहीं था।
सिर्फ हजारों घूमते हुए अक्षर थे।
वे अक्षर लगातार बदल रहे थे।
कोई भी उन्हें पढ़ नहीं पा रहा था।
सत्यलेखक का चेहरा गंभीर हो गया।
उसने धीरे से कहा—
"शब्दभक्षक..."
आरव ने हैरानी से पूछा—
"यह कौन है?"
सत्यलेखक बोला—
"यह कोई देवता नहीं है।"
"यह कोई राक्षस भी नहीं।"
"यह उन सभी झूठों का जन्म है..."
"...जो सदियों से कहानियों में छिपाए गए।"
पूरा पुस्तकालय सन्नाटे में डूब गया।
अनन्या ने सत्यलेखक की ओर देखा।
"क्या यह पहले लेखक से भी शक्तिशाली है?"
सत्यलेखक ने बिना उसकी ओर देखे उत्तर दिया—
"पहला लेखक कहानियाँ लिख सकता था।"
"मैं सच लिख सकता हूँ।"
"लेकिन..."
उसने गहरी साँस ली।
"यह..."
"लिखी हुई कहानी को ही खा जाता है।"
अनन्या के हाथ काँप उठे।
"मतलब?"
सत्यलेखक ने कहा—
"अगर इसने किसी कहानी को निगल लिया..."
"...तो वह कहानी कभी अस्तित्व में थी ही नहीं।"
आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।
"यानी..."
"लोग..."
"यादें..."
"पूरे संसार..."
"सब गायब हो जाएँगे?"
"हाँ।"
सत्यलेखक बोला।
"ऐसा ही होगा।"
उसी क्षण शब्दभक्षक ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
उसकी उँगलियाँ धुएँ से बनी थीं।
जैसे ही उसने सामने रखी एक पुरानी किताब को छुआ...
वह किताब राख बन गई।
लेकिन सबसे भयावह बात...
उसी पल सबके दिमाग से उस किताब की याद भी मिट गई।
संरक्षक अचानक अपना सिर पकड़कर बैठ गया।
"अभी..."
"यहाँ..."
"एक किताब थी..."
"लेकिन..."
"उसमें क्या था?"
उसे कुछ याद नहीं आ रहा था।
अनन्या घबरा गई।
"इसने..."
"यादें भी मिटा दीं।"
शब्दभक्षक की आवाज़ फिर गूँजी—
"जब कहानी नहीं रहेगी..."
"तो स्मृति भी नहीं रहेगी।"
वह धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा।
जहाँ उसके कदम पड़ते...
वहाँ पूरी-की-पूरी अलमारियाँ गायब हो जातीं।
करोड़ों किताबें धूल बन रही थीं।
अरोही ने चीखकर कहा—
"रोकिए इसे!"
पहली कहानी आगे बढ़ी।
उसने अपने दोनों हाथ फैलाए।
हजारों सुनहरे शब्द हवा में फैल गए।
वे मिलकर एक विशाल दीवार बन गए।
लेकिन...
शब्दभक्षक ने सिर्फ एक बार उस दीवार को छुआ।
और अगले ही पल...
सारी दीवार गायब हो गई।
मानो वह कभी बनी ही नहीं थी।
पहली कहानी पीछे गिर पड़ी।
उसकी शक्ति पहली बार बेअसर हो गई थी।
आरव ने अपनी सुनहरी शक्ति का गोला बनाया।
वह बिजली की तरह शब्दभक्षक की ओर बढ़ा।
लेकिन...
गोला उसके शरीर में समाते ही गायब हो गया।
शब्दभक्षक हल्का-सा हँसा।
"लेखकों की शक्ति..."
"मेरे सामने व्यर्थ है।"
अनन्या अब समझ चुकी थी।
तलवार...
जादू...
या लेखक की शक्ति...
कुछ भी इस पर असर नहीं करेगा।
तभी उसकी नज़र अधूरी किताब पर पड़ी।
वह अपने-आप खुल रही थी।
उसके एक पुराने पन्ने पर धुँधले शब्द चमकने लगे—
"जिसे शब्द नहीं बाँध सकते..."
"उसे मौन बाँध सकता है।"
अनन्या ने वह पंक्ति ज़ोर से पढ़ी।
सत्यलेखक तुरंत उसकी ओर मुड़ा।
उसकी आँखों में पहली बार आशा दिखाई दी।
"यह पंक्ति..."
"मैंने लिखी थी।"
अनन्या ने पूछा—
"इसका क्या अर्थ है?"
सत्यलेखक ने उत्तर दिया—
"शब्दभक्षक शब्दों से जन्मा है।"
"वह हर लिखी हुई चीज़ को खा सकता है।"
"लेकिन..."
"मौन को नहीं।"
अनन्या कुछ समझ नहीं पाई।
"मौन कैसे लड़ सकता है?"
सत्यलेखक ने कहा—
"इस पुस्तकालय में एक जगह है..."
"जहाँ आज तक कोई शब्द नहीं लिखा गया।"
"वहाँ..."
"शब्दभक्षक की शक्ति समाप्त हो जाती है।"
आरव उत्साहित होकर बोला—
"तो हमें वहीं जाना होगा!"
लेकिन सत्यलेखक का चेहरा फिर गंभीर हो गया।
"वहाँ पहुँचना आसान नहीं है।"
"क्यों?"
अनन्या ने पूछा।
सत्यलेखक ने धीरे-धीरे पुस्तकालय के सबसे अँधेरे कोने की ओर इशारा किया।
वहाँ दूर...
एक काला दरवाज़ा दिखाई दे रहा था।
उस पर न कोई नाम था।
न कोई चिन्ह।
सिर्फ एक सफेद हथेली का निशान बना था।
सत्यलेखक बोला—
"वह है..."
मौन कक्ष।
"जो उसके भीतर जाता है..."
"उसे अपनी आवाज़ हमेशा के लिए छोड़नी पड़ती है।"
अरोही सन्न रह गई।
"मतलब..."
"वह फिर कभी बोल नहीं सकेगा?"
सत्यलेखक ने सिर हिलाया।
"हाँ।"
"और उस कक्ष का द्वार..."
"केवल एक लेखक के बलिदान से खुलता है।"
पूरा वातावरण शांत हो गया।
सब एक-दूसरे को देखने लगे।
कौन जाएगा?
अनन्या?
आरव?
सत्यलेखक?
या पहली कहानी?
इसी बीच...
शब्दभक्षक ने फिर एक विशाल कदम आगे बढ़ाया।
अब वह अधूरी किताब से केवल कुछ ही दूरी पर था।
यदि उसने उस किताब को निगल लिया...
तो शायद...
कभी कोई कहानी जन्म ही नहीं ले सकेगी।
और उसी क्षण...
अरोही चुपचाप आगे बढ़ी।
उसने मौन कक्ष की ओर देखा।
फिर पीछे मुड़कर अनन्या को मुस्कुराकर देखा।
और धीमे से बोली—
"इस बार..."
"मेरी कहानी अधूरी नहीं रहेगी।"
यह कहकर उसने मौन कक्ष की ओर पहला कदम बढ़ा दिया।
क्रमशः...