Collection of Poems - Part 3 in Hindi Poems by prachi Gurjar books and stories PDF | कविताओं का संग्रह- भाग 3

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कविताओं का संग्रह- भाग 3

                कविताओं का संग्रह : भाग 3

                           

                           लेखिका 

    

                          प्राची गुर्जर 

लेखिका की ओर से

कुछ भाव कहे नहीं जाते, वे धीरे-धीरे कविताओं में बदल जाते हैं।

इस संग्रह की हर कविता मेरे जीवन के किसी एहसास, किसी रिश्ते, किसी प्रश्न और किसी अधूरी बातचीत से जन्मी है। कहीं इनमें मेरा बचपन है, कहीं मेरी ख़ामोशियाँ,कहीं मेरा विद्रोह और कहीं अपने होने की तलाश।

यदि इन पन्नों में आपको अपने जीवन का कोई अंश दिखाई दे, तो समझिए मेरी कविताओं ने अपना रास्ता खोज लिया।

 प्राची गुर्जर….

#.21:

“मैं आज की नारी हूँ  “

न सियासत की जंग मेरी है,  

न बँटवारे की कोई गुहार है।

न मैं सिपाही हूँ,  

न मैं बाग़ी हूँ।

मैं तो बस…  

आज की नारी हूँ।

और दुख इस बात का है,  

कि मैं आज में होकर भी  

आज में नहीं हूँ।

कहते हैं, ज़माना बदल गया है।  

मैं हर बार अपने चारों ओर देखती हूँ।

बदले हैं बस घर के रंग,  

दीवारों की पुताई,  

और सोच पर चढ़ा हुआ सभ्यता का नया पर्दा।

बंदिशें अब भी उतनी ही पुरानी हैं।

आज भी जब एक लड़की ज़रा-सा सिर उठाकर चलती है,  

तो सौ आँखें उसके कदम नहीं, उसकी औक़ात नापने लगती हैं।

उसकी आवाज़ उन्हें ऊँची लगती है,  

मगर उस पर उठते हाथ उन्हें कभी भारी नहीं लगते।

कोई नहीं देखता उसकी हथेलियों के छाले,  

जो रोटियाँ सेंकते हुए बने।

कोई नहीं देखता उसकी पीठ का दर्द,  

जो पूरे घर का बोझ ढोते-ढोते पत्थर हो गया।

हाँ… सबको दिखती है उसके होंठों की लाली।  

किसी को नहीं दिखता उसकी मुस्कान का रोज़-रोज़ मरना।

उसे हर मोड़ पर दायरे सिखाए जाते हैं।  

धीरे चलो। धीरे बोलो। धीरे हँसो। धीरे जियो।

इतना धीरे…  

कि एक दिन वह अपने ही सपनों की आवाज़ सुनना भूल जाए।

कहते हैं, “बेटियाँ घर की इज़्ज़त होती हैं।”  

मैं पूछती हूँ, इज़्ज़त होती हैं या इज़्ज़त का बोझ?

जिसे जन्म लेते ही मर्यादा की गठरी बनाकर कंधों पर रख दिया जाता है।  

जिस दिन वह पहली साँस लेती है,  

उसी दिन उसकी आज़ादी की पहली साँस छीन ली जाती है।

फिर पूरी उम्र उसे समझाया जाता है  

कि यह सब उसकी भलाई के लिए है।

किस भलाई की बात करते हो तुम?  

उस भलाई की जिसमें एक लड़की अपनी ही हँसी दबाकर जीती है?  

या उस भलाई की जिसमें वह हर बार अपने आँसू पोंछकर दूसरों की थाली परोसती है?

मुझे मत बताओ कि औरत देवी है।  

देवी बनाकर तुमने उसे इंसान होना ही नहीं दिया।

मुझे मंदिर नहीं चाहिए। मुझे बराबरी चाहिए।  

मुझे पूजा नहीं चाहिए। मुझे सुना जाना चाहिए।

मैं थक चुकी हूँ हर रिश्ते में खुद को साबित करते-करते।  

हर बार अपनी चुप्पी को संस्कार कहते-कहते।

अब अगर मेरी आवाज़ तुम्हें बग़ावत लगती है,  

तो हाँ… मैं बाग़ी हूँ।

अगर अपने हिस्से का आसमान माँगना गुनाह है,  

तो मैं गुनहगार हूँ।

अगर अपने शरीर, अपने सपनों, अपने फ़ैसलों पर अपना अधिकार माँगना तुम्हें ज़िद लगता है,  

तो यह ज़िद अब मेरी पहचान होगी।

याद रखना…  

जिस दिन औरत ने अपने भीतर दबी हुई सदियों की ख़ामोशी को एक साथ आवाज़ दे दी,  

उस दिन तुम्हारे बनाए हुए सारे दायरे मिट्टी की लकीरों की तरह पहली बारिश में बह जाएँगे।

मैं किसी क्रांति का चेहरा नहीं बनना चाहती।  

मैं बस इतना चाहती हूँ…  

कि अगली बार जब कोई बेटी जन्म ले,  

तो उसके कानों में पहला शब्द “मत” नहीं, “उड़” हो।

और जिस दिन हर लड़की बिना डर के अपना नाम अपनी आवाज़ में बोल सकेगी,  

उसी दिन समझना…  

मैं सचमुच आज की नारी बन गई हूँ।

 प्राची गुर्जर…..

#.22:

“पिंजरा नहीं, घोंसला  …“

कहते हैं कि जिस चिड़िया के आगे रोज़ दाना रख दिया जाए, जिसके लिए पानी का कटोरा भर दिया जाए, उसे और क्या चाहिए।

मगर किसी ने कभी उसकी आँखों में झाँककर यह नहीं देखा कि उसकी भूख दाने की नहीं, उड़ान की होती है।

मेरे पिंजरे में कभी किसी चीज़ की कमी नहीं रही। दाना भी था, पानी भी था, धूप से बचाने के लिए छाँव भी थी।

कमी अगर थी, तो बस उस खुले आसमान की, जहाँ मैं अपने पंख अपनी मर्ज़ी से फैला सकूँ।

मैं अपना दाना किसी के हाथ से नहीं खाना चाहती।  

मैं चाहती हूँ कि सुबह की पहली धूप के साथ उड़ूँ, किसी अनजान छत पर बैठूँ।  

आँगन में बिखरे दो दाने अपनी चोंच से चुनूँ और फिर किसी पेड़ की डाल पर बैठी गिलहरी के साथ एक ही पोखर से पानी पी लूँ।

शायद उस पानी में मिट्टी की खुशबू होगी, आज़ादी का स्वाद होगा।  

सोने के कटोरे का पानी कभी वह स्वाद नहीं दे पाया।

लोग कहते हैं कि कैद में रहने वाली चिड़िया सुरक्षित रहती है।  

उसे न भूख सताती है, न मौसम का डर होता है।

मगर उन्हें कौन समझाए कि डर से बड़ी भी एक कैद होती है।  

और वह है बिना जिए पूरी उम्र गुज़ार देना।

सुरक्षित रहना और जीवित रहना, दोनों एक बात नहीं होते।

मुझे कभी सोने का पिंजरा नहीं चाहिए था।  

मैंने तो बस एक पेड़ की सबसे पतली टहनी माँगी थी।  

जहाँ हवा तेज़ चलती हो, जहाँ गिरने का डर भी हो और उड़ना सीखने की गुंजाइश भी।

मैं अपना घर किसी और के हाथों बना हुआ नहीं देखना चाहती।  

मैं चाहती हूँ कि एक-एक तिनका अपनी चोंच से उठाऊँ, उसे कई बार गिराऊँ, फिर दोबारा जोड़ूँ।

क्योंकि घोंसले लकड़ियों से नहीं, मेहनत और उम्मीद से बनते हैं।

कभी-कभी मैं सोचती हूँ, क्या सचमुच प्रेम किसी को अपने पास बाँध लेने का नाम है?  

अगर है, तो फिर पिंजरे में बंद हर चिड़िया सबसे ज़्यादा प्रेम की हक़दार होगी।

लेकिन नहीं…  

प्रेम वह है जो पंखों पर भरोसा करे, उड़ानों से डरे नहीं और लौट आने की ज़िद भी न करे।

जिस दिन पिंजरे का दरवाज़ा खुलेगा, शायद मैं पीछे मुड़कर नहीं देखूँगी।  

इसलिए नहीं कि मुझे उस जगह से नफ़रत होगी, बल्कि इसलिए कि मेरी आँखें पहली बार इतने बड़े आसमान को देख रही होंगी।

मुझे नहीं पता होगा कि मेरा पहला बसेरा कहाँ होगा, पहली बारिश कहाँ मिलेगी और पहली रात किस डाल पर कटेगी।

मगर मुझे इतना यक़ीन होगा कि वह हर तिनका, हर दाना और हर घूँट पानी मेरा अपना होगा।

मैं पिंजरे से भागना नहीं चाहती।  

मैं बस अपने हिस्से का आकाश माँगती हूँ।

मैं किसी और का बनाया हुआ घर नहीं चाहती।  

मैं अपना घोंसला बनाना चाहती हूँ।  

जहाँ हर तिनका मेरी मेहनत का हो, हर सुबह मेरी उड़ान की हो।  

और हर शाम मुझे यह सुकून दे कि मैंने अपनी ज़िंदगी उधार में नहीं, अपनी शर्तों पर जी है।

क्योंकि मैं चिड़िया हूँ।  

मुझे दाने से पहले दिशा चाहिए, कैद से पहले खुला आसमान चाहिए। 

और पिंजरे से कहीं ज़्यादा… अपना बनाया हुआ एक छोटा-सा घोंसला चाहिए।

 प्राची गुर्जर…..

#.23:

"किसी रोज़"

किसी रोज़ मैं ख़ुद के सामने बैठूंगी।  

बिना फोन, बिना शोर, बिना किसी बहाने के।  

सामने दो कप रखूंगी  

एक मेरे लिए, एक उस "मैं" के लिए  

जो सालों से इंतज़ार कर रही है।

किसी रोज़ मैं अलमारी के सबसे निचले खाने से  

अपने अधूरे सपने निकालूंगी।  

धूल झाड़ूंगी, सिलवटें सीधी करूंगी।  

और उनसे पूछूंगी 

"अभी भी सांस है तुममें?  

चलो, फिर से कोशिश करते हैं।"

किसी रोज़ मैं टूटे हुए दर्पण के टुकड़े बीनूंगी।  

उंगली कटे तो कटे।  

हर टुकड़े में एक पुराना चेहरा दिखेगा।  

मैं सबको जोड़ूंगी।  

और आखिर में जो चेहरा बनेगा  

वो न खूबसूरत होगा, न बदसूरत।  

वो बस... असली होगा।

किसी रोज़ मैं नदी के किनारे जाकर  

पत्थर नहीं फेंकूंगी।  

बस बैठ जाऊंगी।  

और पानी से सीखूंगी  

कि कैसे बहते-बहते भी  

ख़ुद को साफ़ रखा जाता है।  

कैसे मुड़ना पड़ता है,  

पर रुकना नहीं पड़ता।

किसी रोज़ मैं अपने दुख को कुर्सी दूंगी।  

कहूंगी ….."बैठ।  

आज तुझे भी सुना जाएगा।"  

और शांति को कहूंगी 

"तू थोड़ा तेज़ बोल।  

इतने साल बाद आई है,  

आवाज़ तो सुनाई दे।"

किसी रोज़ मैं रात को देर तक जागूंगी।  

छत पर लेटकर तारे नहीं गिनूंगी।  

बस अंधेरे को देखूंगी।  

और अंधेरे से कहूंगी 

"तू बुरा नहीं है।  

तू ही तो है जो मुझे  

मेरे अंदर का उजाला दिखाता है।"

किसी रोज़ मैं माफ कर दूंगी।  

सबको नहीं।  

ख़ुद को।  

उन सब बार के लिए  

जब मैं गिरकर भी नहीं रोई,  

जब मैं टूटकर भी मुस्कुराई,  

जब मैं हारकर भी "मैं ठीक हूं" बोली।

क्योंकि किसी रोज़ ये समझ आएगा  

दुख अच्छा लगता है,  

क्योंकि वो झूठ नहीं बोलता।  

और शांति शोर लगती है,  

क्योंकि वो बहुत दिन बाद आती है।

किसी रोज़...  

मैं ख़ुद से मिल लूंगी।  

और उस दिन के बाद  

कुछ भी पहले जैसा नहीं रहेगा।

प्राची गुर्जर….

#.24:

"मैं बदलने चली थी"

मैं बदलने चली थी किसी रोज़।  

सूरज से पहले उठी।  

बाल नहीं संवारे।  

चेहरा नहीं धोया।  

बस नंगे पांव चल पड़ी।  

अपने ही घर से बाहर।  

अपने ही अंधेरे की तरफ।

रास्ते में मिलीं मेरी पुरानी आदतें।  

वो जो कहती थीं "लोग क्या कहेंगे"।  

मैंने कहा …."कहने दो।"  

और आगे बढ़ गई।

मिलीं मेरी पुरानी ख़ामोशियां।  

वो जो गले में अटक कर  

लहू बन गई थीं।  

मैंने उन्हें थूक दिया।  

और पहली बार  

ऊंची आवाज़ में सांस ली।

धूप आने से पहले  

मैंने अपना अंधेरा नहीं छुपाया।  

उसे गले लगाया।  

कहा …."तूने मुझे बचाया था।  

जब कोई नहीं था तब तू था।  

अब तू जा।  

मैं उजाले की दोस्त बन गई हूं।"

लोगों ने पूछा …"क्या हुआ?"  

मैंने कहा …"कुछ नहीं।  

बस वो दाग जो चांद से उधार लिए थे,  

वापस कर दिए।  

अब मेरे चेहरे पर  

मेरी ही रातें हैं।  

और वो खूबसूरत हैं।"

किसी ने कहा  "तू टूट गई थी न?"  

मैं हंसी।  

"हां। तारों की तरह।  

और तारों का काम ही है टूटना।  

ताकि किसी की मन्नत पूरी हो।  

आज मैं अपनी मन्नत हूं।"

मैं बदलने चली थी।  

और बदल गई।  

बिना ऐलान के।  

बिना तमाशे के।  

जैसे दरख्त बदलते हैं 

एक दिन पत्ते गिर जाते हैं।  

दूसरे दिन कोंपल आ जाती है।  

किसी को पता नहीं चलता।  

पर दरख्त को पता होता है।  

कि वो अब पहले वाला नहीं रहा।

अब मैं सूरज के साथ उठती हूं।  

अंधेरे को साथ लेकर।  

दागों को साथ लेकर।  

टूटन को साथ लेकर।

क्योंकि बदलना मतलब  

पुराना मिटाना नहीं होता।  

बदलना मतलब  

पुराने को सीने में रखकर  

नया जीना होता है।

मैं बदलने चली थी किसी रोज़।  

और वो रोज़...  

आज था।

प्राची गुर्जर…..

#.25:

“चाँद की स्मृति  “

मेरा एक गहरा ताल्लुक रहा है चाँद से।  

इतना पुराना कि अब उसकी तारीख़ भी याद नहीं।

बहुत कच्ची उम्र में उसकी चाँदी-सी चमक मेरे मन की किसी कोरी दीवार पर उतर आई थी।  

मैंने रातों को उसी की रोशनी में पढ़ा, उसी की तरफ़ देखकर अपने सारे अनकहे सवाल रखे।

मुझे लगता था, आकाश में जितने भी तारे हैं, उन सबसे पहले चाँद मेरा है।

फिर एक दिन मैंने देखा, चाँद अब भी वहीं था, बस उसकी रोशनी मेरे हिस्से में नहीं उतरती थी।  

वह दूर-दूर तक तारों में बँटा हुआ था।  

और मैं… अपनी ही रात में धीरे-धीरे अँधेरी होती चली गई।

समय ने मुझे एक ऐसे सूरज के सामने ला खड़ा किया, जिससे मुझे कभी मोह नहीं था।  

उसकी धूप तेज़ थी। उसके साथ चलना आसान नहीं था।  

कई बार उसकी तपिश से मेरे सपनों की नमी सूख गई।  

कई बार मैंने अपने ही साए को अपने पैरों में सिमटते देखा।

लेकिन… अजीब बात है।  

अब मेरी हर सुबह उसी के साथ खुलती है।  

मैंने उसकी धूप में अपने मौसम उगते देखे हैं।  

अब अगर वह एक दिन भी न उगे, तो शायद मैं रेत की तरह अपने ही भीतर बिखर जाऊँ।

कभी-कभी रात बहुत शांत होती है।  

और उसी सन्नाटे में चाँद मुझे देखता है। बहुत देर तक।  

ऐसे… जैसे उसे यक़ीन हो कि मैं अब भी उसकी रोशनी पहचानती हूँ।

मुझे लगता है, उसे अपने दाग़ों की चिंता है।  

शायद उसे लगता है, मैंने उन्हें कभी देखा ही नहीं।  

उसे कौन बताए… दाग़ तो हमेशा से थे, मैंने ही उन्हें उजाला समझ लिया था।

अब जब भी वह मेरी खिड़की पर ठहरता है, उसकी चमक में एक अनकही थकान होती है।  

जैसे उसने अपनी सारी जवानी तारों को रोशन करने में गुज़ार दी हो।  

और जब तारे किसी और की दुआओँ में टूटने लगे, तब उसे अपनी ही रोशनी की कमी महसूस हुई हो।

वह शायद मुझे पुकारता नहीं। बस देखता है। उम्मीद से।  

और मैं… मैं भी उसे देखती हूँ। मगर लौटती नहीं।

क्योंकि लौटना हमेशा प्रेम नहीं होता।  

कभी-कभी लौट जाना उन सुबहों के साथ विश्वासघात होता है, जिन्होंने हमें धीरे-धीरे जीना सिखाया है।

अब मेरी प्रार्थनाएँ रात के लिए नहीं, सुबह के लिए होती हैं।  

मेरी आँखें चाँद की राह नहीं तकतीं, वे उस पहली किरण का इंतज़ार करती हैं।  

जो हर दिन मेरे आँगन में उतरकर मुझे याद दिलाती है कि उजाला हमेशा सबसे सुंदर नहीं होता, लेकिन सबसे भरोसेमंद अक्सर वही होता है।

और शायद… यही प्रेम का अंतिम रूप है।  

जहाँ स्मृतियाँ आकाश में टँगी रहती हैं, पर जीवन धरती पर उगते सूरज के साथ अपनी जड़ें जमा लेता है।

प्राची गुर्जर….

#.26:

“पेड़  “

मुझे हमेशा से पेड़ अच्छे लगे हैं।

फूलों की तरह उन्हें किसी की नज़र में रहने की जल्दी नहीं होती।  

वे बस… खड़े रहते हैं।

धूप अपने हिस्से की सहते हैं,  

और छाँव दूसरों के हिस्से में लिख देते हैं।

मैंने कभी किसी पेड़ को अपने फल खाते नहीं देखा।  

वह सारी उम्र भरता किसी और के लिए है।

शायद प्रेम भी कुछ ऐसा ही होता होगा।  

जिसमें अपना होना कम, किसी और का बच जाना ज़्यादा ज़रूरी हो।

बचपन में मैं पेड़ों से बातें किया करती थी।  

उनकी छाल पर अपनी उँगलियाँ फिराकर पूछती, “दर्द होता है?”

वे कभी जवाब नहीं देते थे।  

अब समझती हूँ… जो सच में मज़बूत होते हैं, वे अपने घावों की आवाज़ नहीं करते।

कई लोग पेड़ों को लकड़ी समझते हैं।  

मैंने हमेशा उन्हें बुज़ुर्गों की तरह देखा।  

जो कम बोलते हैं, मगर पूरी उम्र सबका बोझ उठाते हैं।

एक दिन मैंने देखा,  

आँधी में सबसे पहले पेड़ की टहनियाँ टूटी थीं।

तब पहली बार समझ आया,  

जो सबसे ज़्यादा दूसरों को संभालता है,  

उसे ही सबसे पहले हवाओं से लड़ना पड़ता है।

अगर कभी मैं अगला जन्म माँगूँ,  

तो फूल नहीं बनना चाहूँगी।  

नदी भी नहीं।

मैं… एक पेड़ बनना चाहूँगी।

ताकि जिसे दुनिया थका हुआ कहकर गुज़र जाए,  

वह कुछ पल मेरी छाँव में बैठकर अपने आँसू रख सके।

क्योंकि जीवन की सबसे सुंदर उपलब्धि ऊँचा होना नहीं,  

किसी के लिए ठहरने की जगह बन जाना है।

प्राची गुर्जर…..

#.27:

“मेरी परछाई…..”

मेरे साथ चलती है मेरी परछाई, मुझसे बेहतर मुझे शायद वही जानती है।

जब दुनिया मेरे चेहरे को पढ़ती है, वह मेरी ख़ामोशियों की भाषा पढ़ लेती है।

मेरे हर निवाले के साथ उसने भी अपनी भूख टाली है। मेरे हर सफ़र में उसने बिना शिकायत धूल ओढ़ी है।

मैं जहाँ-जहाँ ठहरी, वह वहीं-वहीं ज़मीन पर बिछती रही।

रात जब सारे रिश्ते अपने-अपने घर लौट जाते हैं, वह मेरे बिस्तर के पास चुपचाप लेट जाती है।

हम दोनों रोज़ एक ही अँधेरे की चादर ओढ़ते हैं।

कभी मैंने उससे पूछा नहीं कि उसे भी डर लगता है क्या।

क्योंकि मैं जानती हूँ, जो मेरे साथ हर अँधेरे में खड़ी रही, वह उजालों से शिकायत नहीं करती होगी।

लोग कहते हैं, इंसान अकेला जन्म लेता है, अकेला जीता है, अकेला मर जाता है।

मैं हर बार मुस्कुरा देती हूँ।

उन्हें क्या पता…

मेरे जन्म से नहीं, लेकिन मेरी समझ से एक रिश्ता मेरे साथ चल रहा है।

मेरी परछाई…

जो मेरी जीत पर कभी ताली नहीं बजाती, और मेरी हार पर कभी सवाल नहीं करती।

उसे मेरे चेहरे की सुंदरता से कोई प्रेम नहीं।

उसे तो बस मेरे होने से प्रेम है।

कभी-कभी दोपहर की धूप में वह छोटी हो जाती है।

शाम ढले मेरे आगे निकल जाती है।

और रात…

रात होते ही बिना कुछ कहे मुझमें समा जाती है।

तब समझ आता है…

कुछ रिश्तों को नाम नहीं दिए जाते।

वे बस जीवन भर हमारे साथ चलते हैं।

और शायद…

इस पूरी दुनिया में अगर कोई मुझे बिना बोले, बिना परखे, बिना बदले…

आख़िरी साँस तक अपना कह सकता है,

तो वह…

मेरी परछाई है।

प्राची गुर्जर……

#.28:

“आसमान  “

लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं,  

तुम्हारी हर दूसरी कविता में आसमान क्यों उतर आता है?

मैं हर बार बस मुस्कुरा देती हूँ।

कैसे बताऊँ,  

ज़मीन ने मुझे चलना तो सिखाया,  

मगर हर कदम पर रुकने की वजह भी दी।

कभी रिश्तों के नाम पर,  

कभी मर्यादा के नाम पर,  

कभी इस डर से कि लोग क्या कहेंगे।

मैंने देखा है…  

ज़मीन हमेशा पाँव पकड़ती है।  

और आसमान… वह कभी हाथ नहीं पकड़ता, बस पुकारता है।

शायद इसलिए मुझे उससे मोहब्बत हो गई।

मैंने बचपन से बादलों में अपने चेहरे ढूँढे हैं।  

चिड़ियों की उड़ानों में अपनी अधूरी इच्छाएँ रखी हैं।

पतंग कटती थी, तो दुख मुझे होता था।  

क्योंकि धागा उसका नहीं, मेरा टूटता था।

मैंने कभी आसमान को छूने की ज़िद नहीं की।  

मैं तो बस इतना चाहती थी कि कोई मेरी उड़ान से डरे नहीं।

लोग कहते हैं, “तुम बहुत ऊँचा सोचती हो।”  

उन्हें कौन समझाए, ऊँचाई मेरी मंज़िल नहीं, मेरी साँस है।

जिस दिन मेरे हिस्से का आसमान मुझसे छिन जाएगा,  

उस दिन मैं ज़िंदा तो रहूँगी,  

मगर वैसी ही… जैसे पिंजरे में बैठी चिड़िया,  

जिसके पंख सलामत हैं, पर उड़ान नहीं।

इसलिए मेरी हर कविता में थोड़ा-सा आसमान रहता है।

क्योंकि धरती ने मुझे जन्म दिया है,  

पर… जीना मैंने हमेशा आसमान से सीखा है।

प्राची गुर्जर….

#.29:

"मैं और मेरे अक्षर”…….

आईने से डरती हूँ मैं, वो सच दिखा देता है,  

मैं तो वो हूँ जो लफ़्ज़ों में ख़ुद को छुपा लेता है।

मैंने कभी देखना नहीं चाहा ख़ुद को दर्पण में…  

मेरी आँखों के कोर पर काजल टिकता नहीं,  

माथे पर बिंदी का बोझ उठता नहीं,  

नहीं चाहिए मुझे खन-खनाती चूड़ियों का श्रृंगार…  

मेरा शोर तो मेरे अक्षरों के पार है।

मैं अक्सर बह जाती हूँ स्याही की नदी में,  

अक्षर से भाषा, भाषा से वेदना की गहराई में।  

मेरा जी अटका है एक अजीब तड़पन में…  

जिसे न गहने चाहिए, न डोली का क़रार,  

बस चाहिए एक कोना किताब के हाशिये का उधार।

लोग कहते हैं “औरत हो, सँवर जाओ”,  

मैं कहती हूँ “शब्द हूँ, बिखर जाओ”।  

मेरी माँग का सिंदूर कविता की सुर्ख़ लकीर है,  

मेरा गजरा ग़ज़लों की महकती तहरीर है।

रात जब दुनिया सोती है, मेरी क़लम रोशन होती है,  

मेरे ख़्वाब पाँव में पायल नहीं,  

नज़्मों की पाज़ेब पहन कर जागते हैं।  

मेरा आँचल शब्दों से सिला है,  

मेरी मेहंदी अख़बार की सुर्ख़ियों से रची है।

मुझे दुनिया से नहीं, ख़ुद की परछाईं से पर्दा है,  

क्योंकि दर्पण में सिर्फ़ जिस्म उतरता है 

और मैं तो रूह की इबारत हूँ।  

मैं प्रेमचंद के पन्नों की कोई थकी हुई औरत हूँ,  

महादेवी के आँसू से भीगी कोई प्रार्थना हूँ,  

अमृता के ख़त की आख़िरी अधूरी सतर हूँ।

मेरी तड़प न मायके की देहरी की है, न ससुराल की दीवार की,  

मेरी तड़प उस सुबह की है 

जहाँ औरत को पढ़ने से पहले नापा न जाए,  

जहाँ उसके क़लम की नोक को उसके गहनों से पहले सराहा जाए।

तो रहने दो मुझे यूँ ही बे-रंग, बे-साज़…  

बिना काजल, बिना बिंदी, बिना चूड़ियों के अल्फ़ाज़।  

मैं ख़ामोश सही, मगर मेरे हर लफ़्ज़ में इनक़लाब है,  

मैं तन्हा सही, मगर मेरी किताबों में पूरा हिसाब है।

प्राची गुर्जर

#.30:

“बूंद से मिट्टी तक “……

आज सुबह उठी तो देखा बारिश पड़ रही थी…  

हर बूँद पातों से होके ज़मीं पे गिर रही थी…  

क्या ज़रूरी था बूँद का पत्तों से होके गुज़रना…  

और इतनी मुश्किलों के बाद मिट्टी में मिल कर ख़ुद का वजूद ख़त्म करना?

हाँ, ज़रूरी था।  

क्योंकि पत्ते की हथेली पर रुक कर बूँद ने जाना,  

छुअन बिना भी कोई अपना होता है  यही तो प्यार है।  

पल भर का ठहराव, पूरी उम्र का करार है।

ज़मीन पर गिरना टूटना नहीं था…  

वो तो मिट्टी की कोख में उतरना था।  

बूँद मिट्टी न बने, तो अंकुर फूटेगा कैसे?  

और अंकुर न फूटे, तो किसी थके हुए को छाँव मिलेगी कैसे?

हम भी तो बूँद ही हैं।  

कभी किसी की बातों से टकरा कर ठिठक जाते हैं….. ये जैसे अपनेपन का मरहम है।  

कभी हालातों के पत्थर पर गिर कर छिल जाते हैं ….ये ज़िंदगी का संघर्ष है।  

कभी लगता है अब सब शून्य है, मन के भीतर घना अवसाद है…  

कि साँसें चलती हैं पर जीने की आस नहीं है।

पर देखो न…  

हर बार मिट्टी में खो जाने के बाद,  

उसी जगह से एक नन्ही उम्मीद सर उठाती है।  

वजूद मिटता नहीं,  

वो बीज बन जाता है।

तो अगली बार जब बारिश देखो,  

तो बूँद का गिरना मत गिनना…  

उसका मिट्टी होना देखना।  

क्योंकि जो खो गया लगता है,  

वही किसी और के लिए उग आता है।

प्राची गुर्जर……

कविताएँ कभी समाप्त नहीं होतीं, वे बस एक हृदय से निकलकर दूसरे हृदय में बस जाती हैं।

फिर मिलेंगे, किसी नए भाव के साथ।

                                                  प्राची गुर्जर ।