तो इस जनवरी हम कुछ दोस्तों ने प्लान किया कहीं घूमने जाने का। प्लान सिंपल था कि बस कहीं जाना है जहाँ सब साथ हों, क्योंकि हममें से ही एक दोस्त जो बाहर रहता है, वो आ रहा था। तो बस यही प्लान था कि हमें जाना है।
असल में, जैसे बाकी सभी सो-कॉल्ड दोस्तों की तरह हज़ार प्लान कैंसिल होने के बाद कहीं कुछ होता है, ये भी वैसा ही कुछ था। तो कोई खास एक्सपेक्टेशन नहीं थी इस ट्रिप से, बस यही था कि देखते हैं। पर luckily इस बार उसके आने के साथ फाइनल हुआ और हमारा प्लान भी on था।
तो जनवरी में ही एक दिन हमारी ट्रेन थी, तो उसी के हिसाब से हमने स्टेशन पर ही मिलना तय किया। हम टोटल 6 लोग थे। बाकी पाँच हमारे होमटाउन में रहते थे, तो उन्हें पहले लखनऊ आना था, फिर यहीं से हमारी ट्रेन थी और मुझे यहीं मिलना था सबसे । मैंने भी ऑफिस खत्म किया, घर आई। बैग एक दिन पहले पैक कर लिया था। तो ले जाने के लिए बनाना था, तो मैंने पाव भाजी बनाई और फिर + बजे घर से निकल गई।
वहाँ पहुँचकर, क्योंकि ये लोग पहले निकले थे तो भूखे भी थे, तो सबने खाना खाया। सब कुछ न कुछ लाए थे। खाने के बाद हमारी ट्रेन भी आ गई और हम सब बैठ गए अपनी-अपनी सीट पर।
अब जैसे टिपिकल दोस्तों की ट्रिप होती है, वैसे हमने भी बहुत सारे प्लान बनाए थे - जो वैसे भी कभी पूरे नहीं होते। सबके मिलते ही बस शुरू हो जाती हैं बातें...
बहुत सारी बातें।
तो ट्रेन में बैठते ही हम सबका भी यही सेशन रहा – खूब सारी बातों का। पुरानी, स्कूल के दिनों की... इतने समय बाद मिलने के बाद भी एक मिनट के लिए भी नहीं लगा कि सालों बाद सब साथ मिल रहे थे।
और स्कूल साथ जाने से लेकर कभी एक साथ कहीं ट्रिप पर भी जाएंगे- ये तो wildest dreams में भी नहीं सोचा था... पर अब वो सब हो रहा था।
ऐसे ही हँसते-खेलते, बातें करते अगली सुबह हम पहुँच गए काठगोदाम स्टेशन।
जी हाँ, शुरुआत में हमारा प्लान था नैनीताल जाने का, पर फिर होते-होते आखिरकार हमने तय किया कि हम मुक्तेश्वर में रुकेंगे और वहीं से आखिरी दिन नैनीताल कवर करेंगे।
तो काठगोदाम स्टेशन पहुँचते ही हमने स्कूटी किराए पर ली और हम निकल गए मुक्तेश्वर के लिए मुक्तेश्वर वहाँ से काफी दूर था... और मेरा पहल् + का सफर।
ऐसे रास्ते, ऐसे नज़ारे - मैंने बस मूवीज में ही देखे थे। हालाँकि मैंने पहाड़ पहले भी देखे थे, पर वो टिपिकल हिल स्टेशन वाला फील कहीं नहीं था।
तो हम सब जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे थे, वहाँ के नज़ारे हमारे दिल को रोमांच से भरते जा रहे थे। वहाँ के रास्तों में चढ़ाई साफ पता चलती थी- एक तरफ ऊँचे पहाड़ और दूसरी तरफ गहरी खाई...
हमारा मन हर एक मोड़ पर एक्साइटमेंट और नर्वसनेस से भर जा रहा था कि कितना सुंदर हो सकता है ये सब।
वहीं काफी दूर जाने के बाद हमने एक जगह रुककर चाय पी, थोड़ा सा फोटो सेशन किया, फिर वापस आगे बढ़ गए क्योंकि मंज़िल अभी भी काफी दूर थी। तो ऐसे ही नज़ारों के मज़े लेते, गाने गाते आखिरकार एक-डेढ़ घंटे बाद हम अपने रिसॉर्ट पर थे।
वहाँ पहुँचकर जैसे ही देखा तो वही चेन्नई एक्सप्रेस
वाला डायलॉग याद आया -
"मीनम्मा, where is the temple?"
हमें लगा - "Meenamma, where is the hotel?"
क्योंकि होटल तक पहुँचकर भी हम पहुँचे नहीं थे- वो बस पार्किंग थी। होटल एक पहाड़ पर था और हमें वहाँ भी चढ़कर जाना था।
खैर, हम सबने हिम्मत की और चल पड़े। lur' luggage भी वो लोग रूम तक खुद पहुँचा + हालांकि वो पहाड़ ऐसा कुछ नहीं था, पर हम उत्तर
भारत के मैदानों में रहने वालों के लिए वो काफी था थकाने और साँस फूलाने के लिए
हम सब एक-दूसरे का हाथ पकड़-पकड़ कर किसी तरह ऊपर खींच रहे थे, क्योंकि वहाँ से अगर फिसले तो सीधा नीचे... कोई रेलिंग जैसा कुछ नहीं था। कैसे भी गिरते-पड़ते आखिरकार हम अपने रिसॉर्ट तक पहुँच गए।
वहाँ पहुँचते ही एक लकड़ी का झूला था, जिस पर मैं तो फटाक से जाकर बैठ गई। बाकी सब भी... होटल वालों ने पहले से पानी का इंतज़ाम कर रखा था-शायद उन्हें अंदाजा होता है कि लोग किस हालत में ऊपर पहुँचेंगे।
पानी पीकर मैं तो वहीं झूले पर बैठ गई।
बाकी कुछ लोग कमरे में निकल गए, कुछ वहीं थे। क्योंकि हमें घूमने के लिए भी जाना था और पहले से ही पहुँचने में काफी देर हो चुकी थी।
मेरा एक नियम है अब तक का — कि किसी भी trip पर सब लोग पहले तैयार हो जाएँ, मैं आखिर में जाती हूँ। तब तक का समय मैं उस पूरी जगह को एक्सप्लोर करने में, उसकी vibes को महसूस करने में बिताती हूँ, और इसमें मुझे कोई disturbance नहीं चाहिए।
तो मेरे साफ निर्देश रहते हैं- सब तैयार हो लो, जब सबका हो जाए, अंत में मुझे बुला लेना।
खैर, मैं उसी झूले पर बैठी थी... और सामने इत् + वादी थी कि उसे देखकर इतने समय के सफर का
थकान धीरे-धीरे उसमें घुलने लगी।
हल्की धूप, ठंडी हवा, पीछे से आती wind chime की मीठी आवाज़... और सामने पहाड़ों के ऊपर फैली इतनी खूबसूरत वादी...
वहाँ उस समय जो सुकून था ना... वो शायद बयान करने का मोहताज नहीं था।
एक अलग ही सुखद गर्मियों की छुट्टियों का सा अहसास हुआ... जैसे इतना सुखद अनुभव शायद ही मैं अपनी जिंदगी में दोबारा महसूस कर पाऊँ।
धीरे-धीरे सब लोग कमरे में चले गए, पर मैं जैसे उस माहौल में खो जाना चाहती थी।
पर अब मुझे लगा शायद काफी समय हो गया है, तो जाकर देखती हूँ। मैं कमरे में गई तो कमरा बहुत सुंदर था। हमने बड़ा सा फैमिली रूम बुक किया था, जहाँ से सीधा पूरी वादी का खूबसूरत नज़ारा दिखता था। खैर, अभी ये लोग फ्रेश हो रहे थे। तब तक मैंने सोचा कि रिसॉर्ट एक्सप्लोर करती हूँ। मैंने पहले ही वीडियो में देख रखा था कि वहाँ इन्होंने एक छोटी सी लाइब्रेरी भी बना रखी है।
मैं भागकर ऊपर गई, और वहाँ का नज़ारा देखकर तो जैसे मुझे कोई खजाना मिल गया हो। किताबें भी ऐसी ही नहीं-fictional, जो कब से मैं पढ़ना चाहती थी। हालाँकि दो दिन में पढ़ तो नहीं पाऊँगी, पर पता उस छोटी सी लाइब्रेरी और वहाँ के विंटेज रेट्र + को देखकर एक अलग ही खुशी हुई।
मैंने उसमें से अपनी पसंद की एक किताब उठाई और वहीं लगे एक बहुत सुंदर और आरामदायक गोलाकार झूले में बैठ गई। झूला क्या- ये तो मेरा सपनों का झूला है, कि जब मैं अपना घर बनाऊँगी, मुझे मेरी बालकनी में यही चाहिए। एक स्टैंड पर एक गोल सा शेल के आकार का लगा हुआ झूला, जिसमें बहुत ही आरामदायक कुशनिंग हो।
मैंने किताब उठाई और बैठ गई। वहाँ इतनी प्यारी ठंडी-ठंडी हवा और साथ ही चेहरे पर पड़ती हुई धूप की गर्माहट - एक अलग ही सुखद एहसास दे रही थी। कुछ तो अलग होता है पहाड़ों की धूप में... तेज़ इतनी होती है कि उसकी गर्माहट अलग से महसूस हो, और साथ में ठंडी हवा-एकदम रूहानी माहौल।
Wind chime की आवाज़ के साथ मैं करीब आधा-एक घंटा वहीं बैठकर किताब पढ़ती रही। मुझे लग रहा था जैसे समय यहीं रुक जाए।
अब तक की मेरी सबसे dreamy, सबसे poetic दोपहरों में से एक थी वो... जो आज तक मुझे याद है। वहाँ का सारा लकड़ी का बना हुआ फर्नीचर, पुराने समय के रखे हुए सामान - जैसे टेप रिकॉर्डर, विंटेज घड़ी, और एक पुराने समय की झूलने वाली कुर्सी... और सामने इतने खूबसूरत पहाड़, जिन पर बने छोटे-छोटे घर...
खैर, तब तक ये लोग भी तैयार हो गए थे। मुझे आवाज़ दी गई। मैं भी अपने ख्वाबों की दुनिया से बाहर आई और जल्दी से जाकर तैयार हुई।
हमें मुक्तेश्वर महादेव मंदिर जाना था, जहाँ अक्सर लोग घूमकर 5-6 बजे तक रिसॉर्ट पर वापस आ जाते हैं। लेकिन हम तो हम है... हम निकल ही 5:30 बजे रहे थे
अब क्योंकि सबका पहला अनुभव था, तो किसी को समय और मौसम का अंदाजा नहीं था। हम जल्दी-जल्दी नीचे उतरे और निकल गए।
वहाँ पहुँचते-पहुँचते हमें एक चीज़ समझ आई-पहाड़ों पर वक्त का अंदाज़ा लगाना आसान नहीं होता। जहाँ दोपहर में इतनी गर्मी थी कि लग रहा था जैसे जून-जुलाई चल रहा हो, वहीं शाम होते-होते पता नहीं कैसे मौसम नवंबर जैसा हो गया।
और हम... लड़कियाँ कम से कम... जुलाई-अगस्त वाले कपड़ों में ही थे। लेयरिंग थी, पर इतनी नहीं कि वहाँ की ठंडी हवाओं को सह सकें।
मंदिर पहुँचते-पहुँचते अंधेरा होने लगा था। रास्ते में बहुत सुंदर सा सनसेट देखते हुए हम पहुँचे।
पर एक्साइटमेंट में हम इतनी जल्दी-जल्दी चढ़ने लगे कि भूल ही गए कि ये पहाड़ है... महादेव तक पहुँचने के लिए कई परीक्षाओं से गुजरना पड़ेगा।
सबसे पहले मेरी नज़र पड़ी एक बोर्ड पर + जानवरों से सावधान।”अब आने से पहले भी मैंने कई बार इंटरनेट पर देखा था जंगली जानवरों को बीच रास्ते पर चलते और लोगो पर हमला करते ...
लेकिन वहाँ उस हल्के अंधेरे में उस बात का असर थोड़ा ज़्यादा ही महसूस हुआ।
दूसरा - हमारे यहाँ के मंदिरों की तरह वहाँ दौड़कर नहीं पहुँचा जा सकता।
शुरुआत में तो हमने दौड़ना शुरू किया, पर आधे रास्ते में ही साँस जवाब देने लगी।
एक्साइटमेंट में हम जल्दी पहुँचने की होड़ में थे, लेकिन जब ऊपर पहुँचे तो समझ आया कि मंदिर अभी भी दूर है... और आगे सीढ़ियाँ चढ़नी हैं।
फिर धीरे-धीरे, साँस सँभालते हुए हम ऊपर पहुँचे।
और तीसरी चीज़ - ये जो हल्का गर्म मौसम था, वो कब बर्फीली ठंडी हवाओं में बदल जाएगा, इसका अंदाज़ा ही नहीं लगता।
अब एक तो हम पहले से थके हुए, ऊपर से कई लोगों को सांस लेने में दिक्कत, और उसमें ये बर्फीली हवाएँ...
किसी तरह हम ऊपर पहुँचे, दर्शन किए। किस्मत से, हम लेट ज़रूर थे, लेकिन आरती का समय था।
मुक्तेश्वर महादेव के बारे में कहा जाता है कि ये मंदिर बहुत प्राचीन है, पहाड़ों और जंगलों के बीच स्ि और यहाँ माँगी गई हर इच्छा पूरी होती +
इसलिए लोग मंदिर के पीछे चुनरी या धागा बोधार
अपनी मनोकामनाएँ माँगते हैं।
मंदिर के पीछे से sunset का बहुत ही सुंदर दृश्य दिखता है।
हम भी आरती में शामिल हो गए... पर जैसे-जैसे रात हो रही थी, हवाएँ और ठंडी होती जा रही थीं। और क्योंकि हमने जूते नीचे ही उतार दिए थे, वहाँ की ज़मीन तो बर्फ जैसी ठंडी हो चुकी थी... जिस पर खड़ा होना मुश्किल था।
हमारे पास एक ही शॉल थी, जिसे तीन लोग ओढ़े हुए थे
आरती खत्म होने तक तो हम किसी तरह खड़े रहे, पर जब परिक्रमा करनी थी, तब तो पैरों ने जवाब दे दिया। किसी तरह जल्दी-जल्दी आरती ली, महादेव का आशीर्वाद लिया, और कुछ देर सनसेट के दृश्यों को देखकर जल्दी करके हम भागते हुए नीचे उतरे। जब तक हम नीचे पहुँचे, मंदिर पूरा खाली हो चुका था। पंडित जी जा चुके थे, लोकल लोग अपने घर जा चुके थे... और अब बस हम थे।
चारों तरफ अंधेरा, सन्नाटा... और जंगल। और अब हमें उसी रास्ते से वापस जाना था।
पहाड़ों पर एक और चीज़ होती है- अगर आसपास कोई दुकान या बस्ती नहीं है, तो ना कोई रोशनी दिखती है, ना कोई इंसान।
बस आप, आपके साथ के लोग... और आपर्व + की हैडलाइट।
सच में, उस समय एक अजीब सा डर था। थोड़ा आगे जाकर एक छोटी सी चाय की दुकान मिली। वहाँ सिर्फ एक अंकल थे जिनकी दुकान थी। भगवान का नाम लेते, गाने गाते... हम किसी तरह अपने रिसॉर्ट तक पहुँच गए।
हमने चाय पी... और जल्दी से निकल पड़े।
कहीं न कहीं थोड़ा डर तो सबको था ही।
वहाँ पहुँचकर सच में राहत की साँस ली - कि अब सुरक्षित हैं।
रूम में जाकर सबने चेंज किया, खाना मंगाया। खाना खाकर फिर वही - बातें।
थोड़ी देर बाद हम फिर ऊपर लाइब्रेरी में गए। रात में वो जगह और भी सुंदर लग रही थी - वॉर्म लाइट्स, शांति, और दूर पहाड़ों पर छोटे-छोटे घरों की टिमटिमाती रोशनी...
फिर हम गेम जोन में गए - स्नूकर, कैरम, टेबल टेनिस, वीडियो गेम्स... सब खेला।
कितना अजीब है ना - इतनी ऊँचाई पर, इतनी दूर... फिर भी सारी सुविधाएँ थी।
जहाँ एक छोटी सी दुकान के लिए भी नीचे उतरना पड़े... वहीं उस रिसॉर्ट में सब कुछ था।
एक परफेक्ट वेकेशन।
खैर, हम वापस कमरे में आए और बैठकर बातेंने लगे।
सब यही सोच रहे थे - आज का दिन कितना रोमांचक था।
शुक्र है सब सही रहा... हम सब सुरक्षित वापस आ गए।
और ये भी निश्चय किया कि कल से पूरी तरह तैयार होकर निकलेंगे - ढेर सारे कपड़े पहनकर
पर...
आज जो हुआ, उसमें इतना रोमांचित और थ्रिल महसूस करने वाले हम लोगों को ज़रा सा भी अंदाज़ा नहीं था कि कल हमारे साथ क्या होने वाला है... कि जिसे हम इतना क्रेजी और थ्रिलिंग अनुभव समझ रहे थे...
वो तो बस शुरुआत थी... इस कभी न भूल पाने वाली ट्रिप की।