अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे
शाम की जाती हुई रोशनी के साथ अब स्ट्रीट लाइट की हल्की पीली रौशनी रास्तों पर अपनी जगह बनाने लगी थी, आती जाती गाड़ियां और किनारे चलते हुए लोगों की भीड़ अब पहले से थोड़ी ज्यादा थी, हल्की हवा चलने लगी थी और कुछ पेड़ो से सूखे पत्ते कुछ देर में ज़मीन की तरफ गिरते हुए दिखाई दे रहे थे।
आशीष आज सड़क पर चलता हुआ कान से फोन लगाए खुश नजर आ रहा था, मन में एक तस्वीर थी और आज उस तस्वीर से उसकी मुलाकात होने जा रही थी।
“क्या तुम आ गई हो?,, बताओ न कहां हो?, मैं तो बस ठीक उसी जगह पर हूं, तिकोने पार्क के पास, एक ढाबा है न उसके सामने” आशीष अपनी मौजूदगी साफ साफ बता रहा था ताकि जो उसे ढूंढ रही है उसे कोई भी परेशानी न हो।
फोन रखा नहीं था उसने और न ही उस दूसरे ने, दोनों एक दूसरे को ढूंढने जो निकले थे।
आशीष ने सामने कुछ लोगो की दीवार के उस पार किसी की लहराती ज़ुल्फ़ों को देखा तो दिल की धड़कन उसकी खूबसूरती से बढ़ गई, आखिर उसकी वो खास जिसका नाम अनुराधा था, वो नज़र आती हुई लगने लगी थी।
आशीष ने फोन पर कहा “ये तुम्हीं हो न” और कहता हुआ तेजी से चलकर वो उस लड़की के पास गया और उसके पीछे आकर उसे बोल पड़ा “अनु,,,,ये तुम हो न,,,”।
वो लड़की मुड़ी जो अपने फोन पर कहीं बात कर रही थी, आशीष ने उससे पूछा “अनुराधा,,,”
लड़की ने मना कर दिया और वो चली गई, इधर आशीष ने फोन पर देखा कॉल तो अब भी जारी था, आशीष मुस्कुरा दिया और उसे अनुराधा का चेहरा याद आया जो उसे याद था
कई साल पहले जब स्कूल में उसका पहला दिन था, कितना नर्वस था वो, अपनी उम्र से बड़ा दिखता था, वजन भी ज्यादा था, शायद टीचर के जाने के तुरंत बाद ही तो उसे अक्सर स्कूल में सभी मोटू कहकर चिढ़ाते थे, मोटा सा एक चश्मा था जिसके बिना साफ दिखता नहीं था, तेल से चिपके बाल, ऐसा कुछ तो था नहीं जो वहां मौजूद अनुराधा जिसकी खुसबूरती आस्मान पर थी, उसका ध्यान आशीष पर जाता।
मगर आशीष के साथी के रूप में उसे अनुराधा ही तो मिली थी, बाकी बच्चों की चिड़ के बाद, मन को शांत कर देने वाली उसकी बोली थी, रोते हुए मन को हंसा देने वाली वो अनु ही तो थी।
“आज तुम बहुत याद आ रही हो जब फाइनली इतने साल के बाद मैं इस शहर वापस आया हूं, तुमसे मिलने अनु,” आशीष ने फोन पर कहा और मुस्कुरा दिया।
उधर से खिलखिलाती हुई एक हंसने की आवाज आई अनुराधा की, “इतनी बेकरारी क्यों है”।
आशीष मुस्कुरा दिया और बोला “मुझे याद है तुम्हारा होना अनुराधा, आसपास मेरे, मेरी ढाल बनकर मुझे खुशी देना, बदले में मांगा ही क्या था तुमने, मगर मैं तुम्हारे साथ खड़ा होने के काबिल नहीं था, में तो बहुत बदसूरत था, मोटा था, इसलिये तो मुझे इतना वक्त लग गया तुम्हारे पास आने में, खैर अब मैं आगे बढ़ गया हूं और मैं रानी झांसी मूर्ति के पास हूं,,”।
ये सुनकर फोन के दूसरी तरफ मौजूद अनुराधा मुस्कुराई और मन ही मन कहने लगी “क्या बदल गया होगा आशीष, उसे क्या पता मुझे तो उसकी मासूम आंखे ही बहुत पसंद थी, मोटे फ्रेम के उस चश्मे के पीछे से झांकती कंचे सी दो काली आँखें, मन का साफ वो आशीष आज कैसा होगा”
मन में गुदगुदी सी हुई थी उस मूर्ति की तरफ जाते हुए, कानो में आशीष की आवाज रह रहकर आती रही मगर मन तो बीते हुए कल में था जब, अक्सर स्कूल की टिफिन ब्रेक में खाली डब्बा लिए अनुराधा के पास अपना टिफिन आशीष सरका देता था, और कुछ कहता भी न था, शायद उसकी यही चुप्पी ये खामोशी से सबकुछ कहना तो अनुराधा को बहुत पसंद था।
“ये तुम्हीं हो न आशीष” कहकर अनु भागी और एक पत्थर की बेंच पर बैठे कानो से फोन लगाए लड़के की पीठ पर हाथ मारा जैसे वो आशीष को अक्सर देखकर ट्यूशन या स्कूल में मारा करती थी।
वो लड़का मुड़ा तो कद काठी से तो वो आशीष ही लग रहा था, थोड़ा सा फैला हुआ, थोड़ा सा हैल्दी, आंखों पर एक चश्मा चढ़ाये बाल को तेल से चिपकाये फोन पर बात करता हुआ।
“ये तुम हो न आशीष,,” अनुराधा के सवाल पर उस लड़के ने उसे कहा “नहीं मैं आशीष नहीं हूं, मेरा नाम तो राहुल है मैं अपने दोस्त का वेट कर रहा हूं”।
अनुराधा ने तुरंत उसे मारने के लिए सोरी कहकर माफी मांगी तो फोन पर आशीष हँस दिया और बोला “मुझसे भी गलती हुई थी अभी थोड़ी देर पहले। और मैने तो तुमसे कहा था कि हमे अपनी आज की तस्वीरें शेयर कर लेनी चाहिएज ऐसे बचपन की याद से कैसे पहचानेंगे मैं तो बहुत बदल गया हूं शायद तुम भी बदल गई हो”
अनुराधा हंसी और उसने आसपास देखा, तभी उसे एक लड़का फोन पर हंसता हुआ दिखाई दिया जो अनुराधा के नज़दीक से गुजरा। और उसकी बात वही बात थी जो वो अपने मुंह से कह रहा था और अनुराधा फोन पर सुन रही थी।
लेकिन अनुराधा की ज़ुबान जैसे बंद हो गई। वो लड़का एक काले सी ब्लेज़र पहने हुए स्लिम था। जिम में बनाई बॉडी, कद काठी पहले से अलग थी, बालों को जैसे किसी सलून में जाकर सेट किए हों और हाथों में एक महंगा मोबाईल था, जूतों की चमक कह रही थी वो किसी शोरूम से आयें हैं और आशीष वो आशीष नहीं लग रहा था जिसे आखरी बार स्कूल से ट्रांसफर के बाद जाते हुए देखा था अनुराधा ने, अपना बस्ता पीठ पर टाँगे वो दौड़ा था। बाकी बच्चे हँसे थे उसकी दौड़ को देखकर मगर अनुराधा को रोना आया था कि उसने सबके सामने आकर उससे अच्छे से अलविदा भी क्यों नहीं कहा था।
आज उन सालों की दीवार के गिरने के बाद सामने आशीष था। हैंडसम ऐसा जिसके बारे में शायद ग्रुप में बातें हो। कूल सा दिखाता हुआ, मगर वहीं एक नज़र खुद को छुपाये अनुराधा ने अपने आप पर डाली।
किसी गाड़ी के पास खड़ी खुदको छिपाये थी वो और उसकी नज़र गाड़ी के शीशे पर गई। रोज अपनी परछाई से मिलती ही थी मगर अभी जिस परछाई को देखा वो आशीष की नजर के बराबर नहीं था।
बचपन में अनुराधा का रंग साफ था। न कोई दाग़ न कोई चोट के निशान, लंबे काले घने बाल, जिनकी चोटी वो बनाती थी तो आशीष उसे देखता ही रह जाता था, आंखों में काजल रहता था और एक लिप बाम तो उसके बैग की जेब में हुआ ही करता था
मगर आज वो सबकुछ जा चुका था, एक बहुत ही मामूली सा चेहरा था अनुराधा का, एक काले फ्रेम का चश्मा तो अब अनुराधा के चेहरे पर था, बाल घुँघराले हो गए थे। अब उनमें वो सिल्कीपन नहीं था, न चमक थी। और अब अनुराधा उतनी खूबसूरत नहीं थी जितनी आशीष की नज़र में वो थी आज, जब वो उसे ढूंढ रहा है।
अनुराधा ने कान पर मोबाईल लगाया तो आशीष ने उसे कई बार आवाज देने के बाद कहा “अरे कहां गई, हेलो , हेलो”।
अनुराधा ने किसी तरह जवाब दिया तो आशीष ने अब परेशान होकर कहा “मैं उसी मूर्ति के पास खड़ा हूं मेरे आसपास कोई है भी नहीं तुम आसानी से ढूंढ लोगी मुझे प्लीज़ कहो कि तुमने देख लिया है, अब इंतजार नहीं होता है,, तुम्हारे लिए एक लाइन भी मेरे पास है कहने के लिए,,, तुम्हारे हुस्न के बराबर नहीं लेकिन उससे बहुत कम भी नहीं हैं हम अब अनुराधा,,,”।
अनुराधा हँसना और मुस्कुराना चाहती थी मगर जैसे उसे लगने लगा कि अब बात वहीं नहीं है जहां थीं कभी। आशीष तब कुछ और था आज कुछ और है और अनुराधा भी कुछ और थी आज कुछ और है।
तो क्या एक जुआ खेलकर देखा जाए कि जिस शख्स को उसने पसंद किया उसकी उस जिंदगी में जब वो किसी की नजरों का केंद्र शायद ही बन पाता जबकि अनुराधा तो हर लड़के की नजर में परियों से कम नहीं हुआ करती थी। तो क्या आज जब बात पलट चुकी है अनुराधा मामूली सी एक लड़की है जिसे शायद ही मुड़कर कोई देखे और वहीं आज आशीष जिसे शायद लोग मुड़ मुड़कर देखे तो क्या आशीष की नजर में वो प्रेम होगा जो उन दिनों अनुराधा के मन में हुआ करता था जब आशीष बस आशीष था भोला सा डरा हुआ सहमा सा, बाकी बच्चों की बातों से घायल आशीष ।
शायद हां या शायद नहीं,,
“तुम,,,बहुत,, तुम बहुत बदल गए हो आशीष” किसी तरह से आशीष से अनुराधा ने फोन पर कहा और अपना कदम उसकी तरफ बढ़ा दिया।
आशीष समझ गया कि उसे अनु ने देख लिया है। वो खुशी से बोला “तुमने मुझे देख लिया है न, तो देर क्यों कर रही हो आकर मुझे वही कहो जो कहा करती थी, “ए मोटू,,,किधर खोए हो” तुम्हें पता है कबसे ये सुनने को बेकरार हूं मैं,,”>
“तुम्हें ये,,ये याद है क्या” अनुराधा ने हल्की सहमी आवाज में कहा था।
“याद क्यों नहीं होगा,,” आशीष ने जवाब दिया।
शायद अनुराधा गलत ही सोच रही थी। उसके दिल ने उसे जवाब दे दिया था कि आशीष का बस बाहरी अक्स बदला है उसका मन तो आज भी वहीं काँच सा होगा जिसे बातों बातों में रोना आ जाता है, कोई उसे चिढ़ाए तो अपने मोटे होने को कोसने लगता है, और अनु को ढूंढ़कर कहता है कि “तुम ही एक हो जो उसे मोटू कहे तो उसे अच्छा लगता है।
,,,,,,
,,,,,,
“हे,,,,,मोटू,,,” मुश्किल से पहले वाली बात आई थी आवाज में, आशीष ने ये सुनकर अपने पीछे देखा। ज़ुबाँ पर अनु का नाम आकर ठहर गया था।
नज़र अनुराधा पर गई, सावली सी एक लड़कीज सूट पहने हुई, न ही हिल जिनके बीच से निकलकर आशीष आता था। ढीले ढाले से कपड़े, न ही वो टाइट लिबास जिनमें वो फिल्मों की हैरोइन जैसी लड़की जिनके बीच उसके काम की जिन्दगी थी अब।
न ही आकर्षित करने की कोई वजह, एक मोटा फ्रेम लिए चश्मा अचानक से खटका था आशीष को। जैसे मन चीखकर कहने लगा हो “ये नहीं,, नहीं ये नहीं है वो, वो तो बहुत,,,बहुत खूबसूरत थी”।
आशीष की आवाज को अबतक सुन नहीं पाई थी अनुराधा, और ये चुप्पी उसे डरा रही थी,
मन में कहती रही कि “ये क्यों नहीं कुछ कह रहा क्या मैं इसके मन की तस्वीर से इतनी अलग हूं”।
आशीष मुस्कुराना चाहता था। उस शख्स से मिलकर जिसे मिलने के लिए वो अपने लेवल की हर बात छोड़कर वापस आया था।
मल्टीनेशनल कंपनी के एच आर हेड की पोस्ट संभालने वाला आशीष। हर हफ्ते एक से बढ़कर एक टॉप की मॉडल जैसी खूबसूरत लड़कियों का इंटरव्यू लेने वाले आशीष के लिए हमेशा अनुराधा की खूबसूरती सबसे ऊपर रही थी। मगर आज जब अनुराधा सामने आई है तो एक बहुत बड़ा भ्रम उसका टूट रहा था, उसे ये मंजूर नहीं हो पा रहा है, वो इस बात को कुबूल नहीं कर पा रहा है, की ये वो लड़की है जिसे सोचकर उसने आजतक अपने कदमों को रोक लिया था, किसी और की खूबसूरती में डूब जाने से।
चाहकर भी वो अनुराधा को अब उस ख्वाब की तह नहीं देख पा रहा है जिस तरह से उसने देखना शुरू किया था कुछ साल पहले जब दोनों की बाते ओनलाइन होने लगी थी, और एक शर्त रखी थी कि वो दोनों एक दूसरे को अपनी तस्वीरें नहीं भेजेंगे, ताकि वो एक ऐसी मुलाकात कर सकें जो उन्हें हमेशा याद रह जाएगी।
,,,,,
साफ था कि आशीष के चेहरे पर एक डिस्पॉइंटमेंट का दाग नजर आ रहा था। अनुराधा बोलना चाहती थी मगर खामोशी आज जुबान बनकर सामने थी और आशीष पूछना चाहता था कि “ये क्या सच में तुम हो अनु” मगर जवाब सामने था। सामने मौजूद लड़की में अनुराधा की खूबसूरती छोड़कर बाकी सबकुछ था।
“क्या हुआ,,,,तुम ऐसे चुप क्यों हो आशीष” अनुराधा की आवाज़ सुनकर आशीष मुस्कुराने की एक कोशिश करने लगा और उसने कहा “हाँ,,,अरे तुम्हें बहुत वक्त बाद देखा न इसलिए,,,कैसी हो तुम, सब घर में कैसे हैं,,,,यहां इसी शहर में रही या कहीं बाहर भी निकली हो,,”।
अचानक ही जैसे दो पुराने प्रेमी जोड़े आपस में वो दो लोग हो गए थे जो सालों पहले बिछड़े थे और आज यूही चार सवालों से सबकुछ जान लेना चाहते हो।
वैसा ही जवाब अनुराधा ने भी दिया था “हाँ कहीं नहीं गई, यहीं थीं,, माँ की तबियत खराब रहती है, पापा अपने काम में, मैं तो बस एक ट्यूशन चलाती हूं, और तुम आशीष?”।
आशीष शायद अब बातों को बढ़ाने से कतरा रहा था, इसलिए ऑनलाइन होती बातों की तरह उसने सवाल पर सवाल नहीं किये अनुराधा के सीधे जवाबो पर अपने सवाल नहीं उठाए, और मान लिया जो उसने कहा था।
बोला “कुछ खाओगी क्या,,मुझे तो वैसे भूख नहीं है,,,”।
आशीष को समझ रही थी अनुराधा, वो बस बात को खत्म करना चाहता था। या कोई गलतफहमी नहीं बरकरार रखना चाहता था, इसलिये उसकी कैफियत को समझ रही थी अनुराधा जैसे पहले समझा करती थी जब वो कुछ कहता नहीं था।
आशीष की कशमकश को खत्म करते हुए अनुराधा ने उसे कहा “अभी चार महीने पहले ही हुई है मेरी शादी,,घर नहीं चलोगे,”।
हैरान सा आशीष उसे देखने लगा और लड़खड़ाई सी ज़ुबां में बोला “शादी,, तुम्हारी शादी हो चुकी है ,,,,कभी बताया नहीं तुमने ,,,”।
अनुराधा मुस्कुराई थी, जैसे दर्द के बीच में मुस्करा दी हो। बोली “आज बताने को रखा था। इसलिए आज बता रहीं हूं,,”।
मुलाकात शुरू होते ही खत्म हो गई थी। दोनों के ही फोन बजे नहीं थे मगर दोनों ने एक दूसरे से कहा कि घर से कॉल आ रहा है, फिर बात करते हैं,,,
मगर शायद ये बात अब कभी होने को नहीं थी, आशीष अपनी गाड़ी तक तेजी से गया, बढ़ी हुई दिल की धड़कने लिए। उसके मन का मंदिर टूटा था। उसमें जमी एक सुंदर मूरत का वजूद कहीं भी नहीं था अब।
और अनुराधा के लिए एक हकीकत थी, इस दुनिया में पिये कई कड़वे घूंट में से एक और घूँट पीती एक आम सी लड़की।
पार्क से बाहर आते हुए उसका मन विचलित था। तभी कानो में किसी ऑटो से बजते गाने के दो बोल सुनाई दिये,
(“लौट जाती है उधर को भी नजर क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर, क्या कीजे,
और भी दुख है ज़माने में मोहब्बत के सिवा,
राहते और भी वसल की राहत के सिवा,,””)
—"दुनिया में सिर्फ प्रेम-वियोग का ही दुख नहीं है, और भी बहुत से दुख हैं। इसी तरह प्रिय से मिलने (वसल) की खुशी के अलावा भी जीवन में और तरह की राहतें और खुशियाँ मौजूद हैं।”-------
,,,,,,,,,साजिद अहमद)